ललित गेट: प्रधानमंत्री का चुप्पासन

बादल सरोज
धमाधम शोरशराबे के बीच चुप्पासन लगाकर बैठना कोई आसान बात नहीं है. इसके लिए बड़ा ध्यानी-ज्ञानी होना होता है.

भ्रष्टाचार के दनादन सामने आ रहे मामलों में अपनी मुकम्मिल खामोशी से प्रधानमंत्री मोदी ने इतना तो साबित कर ही दिया है कि भले वे अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर सही तरीके से पद्मासन नहीं लगा पाये थे, मगर चुप्पी-आसन में वे अपने पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री “मौनी बाबा” से ज्यादा सिद्धहस्त हैं. हालांकि मौनीमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी में एक मुखर अंतर है ; वे बोलते ही नहीं थे. ये बोलने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ते हैं मगर जहां एकदम जरूरी हो वहां बिलकुल भी नहीं बोलते हैं.


ललित मोदी के पिटारे का खुलना, जिसे अमरीकी मुहावरे में ललित गेट के नाम से जाना जा रहा है, भ्रष्टाचार के सड़ांध भरे सिर्फ एक दरवाजे का खुलना नहीं है. यह उस आभासीय किले की दीवारों का पूरी तरह से टूट-बिखर जाना है, जिसे भ्रष्टाचार की समूल समाप्ति के नारे को भावनात्मक ऊंचाइयों तक पहुंचा देने वाली ईंटों से निर्मित किया गया था. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज अपनी ही सरकार द्वारा जब्त किये गए पासपोर्ट वाले एक भगोड़े को यात्रा दस्तावेज दिलाने के लिए ब्रिटेन की सरकार पर दबाब बनाती हैं.

इन्ही की पार्टी की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे उसे न सिर्फ चरित्र प्रमाणपत्र थमाती हैं बल्कि उसे भारतीय अधिकारियों से छुपा कर रखने के लिए भी कहती हैं. दसियों हजार करोड़ रुपयों के टैक्स अदायगी मामले में वोडाफोन के वकील रहे जेटली वित्तमंत्री बनते ही सारा बकाया माफ़ कर देते हैं. शिक्षा मंत्री स्मृति ईरानी खुद अपनी शिक्षा के बारे में झूठा शपथपत्र देने के लिए अदालत में बुलाई जाती हैं. अगर यह भ्रष्ट आचरण और कदाचरण नहीं है तो क्या है?

फिलहाल के लिए महाराष्ट्र की पंकजा मुंडे या दूसरे मंत्री या मप्र के व्यापमं और छत्तीसगढ़ के दवा घोटाले जैसे राज्यों के मसलों को छोड़ भी दें, तो अपनी कैबिनेट के इन कर्मों के बारे में बोलना और कुछ करना प्रधानमंत्री का संवैधानिक दायित्व है. मगर नरेंद्र मोदी हैं कि खामोश बने हुए हैं. यह संसदीय लोकतांत्रिक शासन प्रणाली की नींव को कमजोर करने के सिवाय कुछ नहीं है. मार्टिनलूथर किंग जूनियर ने एक बार कहा था कि “बड़ी त्रासदी गैरजिम्मेदार लोगों द्वारा ज़ुल्म, अपराध या कदाचरण किया जाना नहीं हैं बल्कि उस पर ज़िम्मेदार लोगों की चुप्पी है. ”

खूब बोलने के लिए मशहूर प्रधानमंत्री की यह खामोशी अनायास या अकारण नहीं है. इसके पीछे दो बड़े कारण हैं ; एक तो यह कि ललित मोदी के पिटारे में अभी बहुत कुछ बाकी है. और वह क्या और कितना सांघातिक है यह बात उसी ललित मोदी के कार्यकाल में, उसी की मदद से गुजरात क्रिकेट बोर्ड के अध्यक्ष बनने वाले बखूबी जानते हैं. दूसरा पहलू उस पूरी आर्थिक दिशा को निर्वस्त्र करने वाला है, जिसे रामबाण बता कर इन दिनों हुकूमतें चल रही हैं. यह पूंजी के वैश्वीकरण और बड़ी पूंजी को अभयदान देने का दुस्समय है. ललित मोदी की यह बात कि उन्होंने देश और आईपीएल को 47 हजार करोड़ रुपये का लाभ पहुंचाया है, इसी “वैदिकी हिंसा-हिंसा न भवति” भाव की अभिव्यक्ति है. ललित मोदी उदारीकरण के आइकॉन हैं. वे बाजार के मूल्य भी हैं- कलदार भी हैं.

जो भी हो, प्रधानमंत्री मोदी की खामोशी राजनीति के मूल्यों, आचरणों की नियमावली और शुचिता की परम्पराओं को क्षत-आहत कर रही है. उन्हें याद रखना चाहिए कि उनके आदर्श “यह यूपीए नहीं कि जिस के मंत्री इस्तीफा दें” कहने वाले राजनाथ सिंह नहीं हो सकते. यदि उन्हें अपने ही कुटुंब में आदर्श चुनना है तो बेहतर होगा कि वे लालकृष्ण आडवाणी के ताजे हवाला पुनर्स्मरण बयान को पढ़ लें. बहरहाल, वे ऐसा कुछ नहीं करने वाले हैं, आडवाणी को तो कतई माहि पढ़ने वाले हैं. वे ऐसा कोई भी उदाहरण प्रस्तुत नहीं करेंगे, जिसपर चलने की जोखिम बाद में कभी खुद उन्हें उठाना पड़े. वे जानते हैं कि बात निकलेगी तो बहुत दूर तलक जाएगी.

सरकार के इस हठयोग और अपराधों के सार्वजनिक होने के बाद भी कुछ न करने की दीदादिलेरी दिखाने का खामियाजा निर्वाचित संसद और देश की जनता को भुगतना होगा. साफ़ दिखाई दे रहा है कि संसद का पावस सत्र इसी सवाल पर जायज हंगामे की भेंट चढ़ने जा रहा है. न कानूनों पर चर्चा होनी है- न मंहगाई को एजेंडे पर आना है. कितनी विराट विडम्बना है कि जो सरकार भ्रष्टाचार समाप्ति के धूमधड़ाक नारे की दम पर सत्तासीन हुयी है वही भ्रष्टाचारके आरोपों से घिरे कुछ मंत्रियों को बचाने की ज़िद में संसद को नहीं चलवा पाएगी. प्रधानमंत्री को समझना चाहिए कि राजनीति में ज्वार चिरस्थायी नहीं होते. जनता को एक बार छला जा सकता है, हर बार नहीं.

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