ए फॉर आम आदमी पार्टी

रायपुर | विचार डेस्क: आम आदमी पार्टी ने भारतीय राजनीति का ककहरा बदल दिया है. अब ए से ऑल इंडिया या अखिल भारतीय नहीं आम आदमी पार्टी होता है. किसने सोचा था कि एक साल पहले बनी पार्टी वह भी जिसे एनजीओ में काम करने वालों ने बनाया है ऐसा कारनामा कर सकती है. आम आदमी पार्टी ने लीक से अलग हटकर चलने की शुरुआत की है. इसके नेता सीना तानकर शक्तिशाली नेताओं के सामने खड़े होने का साहस दिखाते हैं.

ताजुब्ब की बात है कि आम आदमी पार्टी के दिल्ली के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार अरविंद केजरीवाल स्वयं दिल्ली के मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के खिलाफ मैदान में उतरे थे. अन्यथा पारंपारिक राजनीतिक दलों में तो प्रमुख उम्मीदवारों के लिये सुरक्षित सीटों को तव्वजो दी जाती है. ऐसा भी आरोप सुनने में आता है कि फलां पार्टी ने अपने प्रतिद्वंदी पार्टी के प्रमुख के खिलाफ कमजोर उम्मीदवार मैदान में उतारा था. पार्टियां जीते न जीते परन्तु नेताओं को तो जीतना ही चाहिये.

आम आदमी पार्टी के इस साहस को दिल्ली की जनता ने सर आखों पर लिया. जनता अपने नेता में साहस है कि नहीं यह पहले देखती है, उसके बाद नीतियों की बात आती है. जिसमें साहस न हो वह कौन सी नीतियां लागू करवा पायेगा. जिसमें व्यवस्था के खिलाफ उठ खड़े होने का दम न हो वह खाक व्यवस्था से लड़ेगा. अब जाकर मालूम हो रहा है कि दिल्ली की जनता ने कितना सही फैसला लिया था. तभी तो उन्हें माह में 20 हजार लीटर पानी मुफ्त में तथा 400 यूनिट तक की बिजली आधे दाम पर मिलने का रास्ता खुला है.

दिल्ली का नतीजा आने तक तो आम आदमी पार्टी का सफर अन्यों के लिये चुनौती नहीं बन पाया था परन्तु दिल्ली में सरकार बना लेने के बाद इसने राष्ट्रीय स्तर पर युवाओं तथा मध्यम वर्ग को अपनी ओर आकर्षित किया है. आम आदमी पार्टी इस प्रकार खबरों में छा गयी है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने भी भाजपा को आम आदमी पार्टी से सीख लेने को कहा है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मोहन भागवत ने हैदराबाद में भाजपा को आगाह किया कि उसके लिये असली खतरा आम आदमी पार्टी है. आम आदमी पार्टी द्वारा 10 दिसंबर को शुरु किये गये सदस्यता अभियान को जिस प्रकार से युवाओं का समर्थन मिल रहा है उससे कई राजनीतिक दलों के कान खड़े हो गये हैं.

दिल्ली विधानसभा में आम आदमी पार्टी से ज्यादा सीट पाने वाली भाजपा के बारे में यह कहा जा रहा है कि उसे इसी पार्टी के चलते विपक्ष में बैठना पड़ रहा है. कई राजनीतिक विश्लेषक सवाल उठा रहें हैं कि दिल्ली में भाजपा जीती है या हारी है. पिछले करीब एक वर्ष से भारतीय राजनीति में नरेन्द्र मोदी का सितारा अपने शिखर पर था. जिसे आम आदमी पार्टी के पदार्पण ने दूसरे स्थान पर ढ़केल दिया है. अब खबरों में मोदी नहीं अरविंद केजरीवाल सरकार के काम काज की समीक्षा हो रही है.

हालात यह है कि गूगल सर्च में दो बार ए टाइप करने से आम आदमी पार्टी का नाम चला आता है. जिसका अर्थ यह है कि गूगल के स्मृति में भी आम आदमी पार्टी बस गया है. और हो भी क्यों न, लोग सबसे ज्यादा इसी की खोज-बीन जो करते हैं. एक और तथ्य पर गौर कर लेना चाहिये जोकि आकड़ो के रूप में अपनी कहानी स्वयं बया कर देते है. गूगल में राहुल गांधी के नाम 4.92 करोड़ पन्ने हैं, नरेन्द्र मोदी के नाम 8.55 करोड़ पन्ने हैं वहीं अरविंद केजरीवाल के नाम से 11 करोड़ पन्ने हैं. जिसका अर्थ यह होता है कि गूगल में उनके नाम की इतने पन्नों की सामग्री उपलब्ध है.

गौरतलब है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में करीब 12 करोड़ नये मतदाता वोट डालेंगें. जिनमें से करीब 9 करोड़ सोशल मीडिया में सक्रिय हैं. इन 9 करोड़ में से 7 करोड़ फेसबुक पर तथा 2 करोड़ ट्वीटर पर सक्रिय हैं. यह सक्रियता आने वाले समय में भाजपा के ‘मिशन 272+’ तथा कांग्रेस के अघोषित ‘मिशन शहजादा’ की मिट्टी पलीद करने की क्षमता रखता है.

इसीलिये तो कहा जा रहा है कि आम आदमी पार्टी ने भारतीय राजनीति के ककहरे को बदल दिया है. अब ए फॉर आम आदमी पार्टी हो गया है.

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