आम आदमी के सपनों का क्या होगा?

बिलासपुर | जेके कर: पिछले बार 49 दिनों की सरकार चलाने वाली ‘आप’ ने इस बार 42वें दिन ही दो बड़े नेताओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया. इससे जो राजनीतिक संदेश निकलकर पार्टी से बाहर आता है वह यह है कि ‘आप’ में अरविंद केजरीवाल से दिगर मत रखनेवालों के लिये राष्ट्रीय कार्यकारिणी में कोई जगह नहीं है. पिछले कुछ समय से ही कयास लगाये जा रहे थे कि ‘आप’ के अंदर चलने वाले मतभेद, मनभेद के रूप में सतह पर आने वाले हैं. जिसका सीधा राजनीतिक फायदा दिल्ली विधानसभा में तीन सीटों पर सिमटी भाजपा को होने जा रहा है. इन सब राजनीतिक बवंडरों के बीच सवाल उठता है कि आम आदमी के उन सपनों का क्या हश्र होगा जो उन्होंने ‘आप’ के ईर्द-गिर्द बुना था.

दिसंबर 2013 में जब दिल्ली विधानसभा में ‘आप’ की अल्पमत वाली सरकार बनी थी तो आम आदमी की उम्मीदें उससे जगी थी. अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में दिल्ली सरकार ने बिजली के बिल आधे किये तथा मुफ्त पानी पहुंचाने के लिये प्रयास किये. वह दौर था जब देश में मोदी का उदय हो रहा था. उसके बीच में ‘आप’ ने उन लोगों को भरोसा दिया था जो भाजपा-कांग्रेस में विश्वास नहीं करते थे. इसे अरविंद केजरीवाल की जल्दबाजी कहें या रणछोड़ भाई वाला कदम कहें कि 49 दिन में ही दिल्ली सरकार ने इस्तीफा दे दिया अन्यथा ‘आप’ चाहती तो भाजपा तथा कांग्रेस दोनों के छाती पर मूंग दल सकती थी.


‘आप’ को अपने इस राजनीतिक फैसले का खामियाजा 2014 के लोकसभा चुनाव में उठाना पड़ा जब वे दिल्ली से एक भी सांसद जीता कर नहीं ला सके. वैसे वह दौर मोदी के उत्थान का था जिसकी आंधी में कई दल धाराशायी हो गये. ‘आप’ को बाहर से मात्र चार सीटों से संतोष करना पड़ा.

‘आप’ की दिल्ली सरकार ने दूसरी बार 14 फऱवरी को रामलीला मैदान में शपथ लिया. लोकसभा चुनाव में भाजपा की आतिशी जीत के बाद किसी राजनीतिक पंडित को यह गुमान नहीं था कि ‘आप’ को दिल्ली विधानसभा के 70 में से 67 सीटों पर विजय मिलेगी. उल्लेखनीय है कि इस विधानसभा चुनाव के पहले ‘आप’ तथा अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की जनता से अपने इस्तीफे के लिये माफी मांगी थी.

दिल्ली विधानसभा में ‘आप’ की जीत वास्तव में उसके पानी-बिजली जैसे जमीनी समस्याओं पर ध्यान केन्द्रित करने से मिली थी. सीधी सी बात है कि जनता अपने पानी की कमी तथा बिजली के बढ़ते बिलों का समाधान पहले चाहती है विदेशों में कौन से झंडे गाड़े गये हैं उस पर बाद में विचार करती है. कहने का तात्पर्य यह है कि दिल्ली की गद्दी पर ‘आप’ को अरविंद केजरीवाल के मुखमंडल की आभा को देखकर नहीं समस्याओं के समाधान के लिये जनता ने बैठाया है.

‘आप’ के वादों की सूची लंबी है जिसे यदि पांच साल में भी पूरा किया जाता है तो मानना पड़ेगा कि इस लोगों की घटती क्रय शक्ति तथा देश-दुनिया में बढ़ते खरबपतियों की संख्या वाले युग में भी जनता के लिये बहुत कुछ किया जा सकता है. जिसका राजनीतिक संदेश देश के बाहर तक जायेगा खासकर उस वक्त जब बड़े घराने पानी-जंगल-जमीन तथा जमीन के नीचे के प्राकृतिक संशाधनों पर कब्जाकर अपनी पूंजी बढ़ाने की फिराक में है.

ठीक उसी वक्त ‘आप’ में मचे घमासान से डर लगता है कि उसकी आपसी कलह कहीं फिर से उसके पतन का कारण न बन जाये. ‘आप’ का अर्थ जनता के सपनों को यथार्थ में बदलने से माना जाता है. सवाल ‘आप’ की टूटन या अरविंद केजरीवाल की बादशाहत कायम होने का नहीं जनता के सपनों का है.

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