‘आप’ बिगाड़ेगी भाजपा-कांग्रेस का खेल

नई दिल्ली | समाचार डेस्क: ‘आप’ अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा,कांग्रेस के बाद तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी, उसे 50-100 सीटें मिल सकती है. टाइम्स ऑफ इंडिया के लिये आईपीएसओएस नामक कंपनी द्वारा किये गये सर्वे के नतीजे यही बयां करते हैं. सर्वे में शामिल लोगों का मानना है कि अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी देश में बड़ा उलट फेर कर सकती है.

सर्वे में शामिल 33 फीसदी लोगों का मानना है कि आम आदमी पार्टी को 26-50 सीटें, 26 फीसदी लोगों के अनुसार 51-100 सीटें और 11 फीसदी लोगों का मानना है कि आम आदमी पार्टी को 100 से ज्यादा सीटें मिल सकती है.


सर्वे में शामिल 44 फीसदी का कहना है कि यदि उनके क्षेत्र से आम आदमी पार्टी का उम्मीदवार खड़ा होता है तो वे उसे ही वोट देंगे जबकि 27 फीसदी लोगों का कहना है कि वे भी आम आदमी पार्टी को वोट दे सकते हैं यदि उनका उम्मीदवार अच्छा हो तब. इस प्रकार से आम आदमी पार्टी यदि अच्छे उम्मीदवार उतारती है तो उसे 71 फीसदी तक वोट मिलने की संभावना है.

देश के आठ महानगरों में कराये गये इस सर्वे से यह बात ऊभर कर आयी है कि प्रधानमंत्री के लिये मोदी को पसंद करने वालों की संख्या 58 फीसदी, अरविंद केजरीवाल को पसंद करने वालों की संख्या 25 फीसदी तथा 14 फीसदी लोग राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनते देखना चाहते हैं. हैरत की बात यह है कि चेन्नई, मुंबई तथा अहमदाबाद के लोगों ने प्रधानमंत्री पद के लिये नरेन्द्र मोदी के स्थान पर अरविंद केजरीवाल को पसंद किया है.

सर्वे के दौरान जब उसमें शामिल लोगों से पूछा गया कि आप के आने से किसे नुकसान होगा तो सबसे ज्यादा लोगों का मानना था कि आम आदमी पार्टी से सबसे ज्यादा नुकसान भारतीय जनता पार्टी का होने वाला है. इनकी संख्या एक तिहाई से कुछ कम है. इसी प्रकार एक चौथाई लोगों का मानना है कि आम आदमी पार्टी से कांग्रेस को सबसे ज्यादा नुकसान होगा. कीब एक चौथाई लोगों का मानना है कि कांग्रेस तथा भजपा दोनों का नुकसान होगा.

यदि इस सर्वे की माने तो आम आदमी पार्टी देश के स्तर पर दिल्ली की कहानी को फिर से दुहराने जा रही है. दिल्ली में आम आदमी पार्टी के कारण कांग्रेस बुरी तरह मात खा गई तथा सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद भी भाजपा को विपक्ष में बैठना पड़ रह है.

अब ऐसा लगने लगा है कि आम आदमी पार्टी, भाजपा-कांग्रेस के खेल को राष्ट्रीय स्तर पर बिगाड़ने की क्षमता रखती है. हालांकि सर्वे केवल महानगरों में किये गयें हैं जिसमें ग्रामीण भारत के प्रतिनिधित्व का अभाव है.

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