आशाराम बापू की होली

जब फ्रांस की महारानी से कहा गया था कि जनता के पास खाने के लिये ब्रेड नही है तो उसने बड़ी ही मासूमियत से जवाब दिया था कि उन्हें केक खाने के लिये कहो. वैसा ही नवी मुंबई मे आशाराम बापू ने कहा कि फूलो से बने रंग को पानी मे मिलाकर श्रध्दालुओं पर बरसाने से उनके रोग दूर हो जाते हैं तथा उन्हें मानसिक तनाव से मुक्ति मिलती है.

सारा महाराष्ट्र जब सूखे से जूझ रहा है, उस समय लाखों लीटर पानी से भक्तों पर रंग वर्षा कहां तक उचित माना जा सकता है. सोमवार को नवी मुंबई के एरोली इलाके में आशाराम बापू ने यही किया और फ्रांस की महारानी के समान तर्क परोस रहे हैं. इससे एक दिन पहले नागपुर के कस्तूरचंद पार्क में भी बापू ने होली खेली थी. यह मामला विधानसभा एवं विधान परिषद में उठाया गया. उन्हें पानी सप्लाई की अनुमति देना वाला सब इंजीनियर इस चक्कर में निलंबित हो गया.


आज की समाज व्यवस्था अपने बाशिन्दों की जरुरतें पूरी करने मे असमर्थ है. इस कारण इन बाबाओं की खूब पूछ परख बढ़ गई है. लोग जिस चीज को वास्तविक जीवन में नही पा सकते, उसे इन बाबाओं के पास आकर ढूढ़ते हैं. बाबाओं के पास आने से उन्हें मानसिक शान्ति मिलती है क्योंकि लच्छेदार भाषण लोगों को मन्त्र मुग्ध कर देती है, एक ऐसी भाषा, जिसमें अनुपस्थित को लेकर आप अपनी सुविधा से तथ्य, सत्य और झूठ को गढ़ सकते हैं. इन्हीं गढ़े हुये दिलासे में लोग अपनी तकलीफों का अंत तलाशते हैं.

कार्ल मार्क्स ने इसी कारण धर्म को अफीम बताया था. यह लोगों को सुला देने की क्षमता रखती है. उनका आशय धर्म का विरोध करने से नही वरन शासक वर्गों द्वारा इसका अपने पक्ष में उपयोग करने से था. सारी दुनिया में चाहे वो कोई भी धर्म हो, उसने हमेशा से ही सत्ताधारी वर्गों की सहायता की है. आम जनता तो केवल भक्ति भाव से खड़ी रह जाती है.

आशाराम बापू जब होली के साथ सारे कष्टों से मुक्ति दिलाने की बात करते हैं तो धर्म को लेकर एक बार फिर से वही सवाल खड़ा होता है. आशाराम बापू अपने भक्तों को इस बात के लिये क्यों नहीं प्रेरित करते कि वे भक्त भय, भूख, पूंजीवाद के आतंक और दूसरे भ्रष्टाचार से लड़ें ?

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