खेतों को नहीं उद्योग को पानी

रायपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ में खेतों के सिंचित होने के दावे खोखले साबित हो रहे हैं. सिंचाई क्षमता में वृद्धि और सिंचित क्षेत्र जैसे शब्दों में उलझा कर सरकार जो दावा कर रही है, वह सरकारी फाइलों में ही झूठा साबित हो रहा है. एक तरफ तो सरकार हर साल सिंचाई क्षमता में वृद्धि का दावा कर रही है लेकिन इसकी असलियत ये है कि सिंचाई क्षमता की वृद्धि का लाभ खेतों को नहीं, उद्योगों को मिल रहा है.

2009 से जनवरी 2013 तक के पांच सालों में जल संसाधन विभाग ने 8561.09 करोड़ रुपये खर्च कर डाले और दावा किया गया कि सिंचाई के रकबे में कुल 2.48 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. सरकारी आंकड़े बताते हैं कि असिंचित खेतों में से केवल 0.911 लाख हेक्टेयर खेतों को ही सिंचित बनाया जा सका है.

2011-12 में 0.350 लाख हेक्टेयर असिंचित भूमि को सिंचित बनाया गया था, जिसके तुलना में वर्तमान वित्त वर्ष के 9 माह में कुल जमा 0.050 लाख हेक्टेयर असिंचित भूमि को ही सिंचित बनाया जा सका है. जाहिर है, इन तीन माह में जल संसाधन विभाग पिछले साल के आंकड़ों को भी छू नहीं पायेगा.

जल संसाधन विभाग के आंकड़े बताते हैं कि छत्तीसगढ़ सरकार का जल संसाधन विभाग करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी पिछले पांच वर्षों में रायपुर, बलौदा बाजार और बीजापुर जिले में सिंचाई के रकबे में वृद्धि नहीं कर सका है. 2009 से 31 जनवरी 2013 तक रायपुर जिले में 423 करोड़ 23.40 लाख रुपये, बलौदा बाजार में 36 करोड़ तथा बीजापुर में 43.62 लाख रुपये खर्च करने के बाद भी सिंचाई के रकबे में कोई फर्क नहीं पड़ा.

इसी तरह जांजगीर-चांपा जिले में 499 करोड़ 65.37 लाख रुपये का खर्च कर के भी केवल 245 हेक्टेयर जमीन को ही सिंचित किया जा सका है. प्रति हेक्टेयर 2 करोड़ रुपये से भी अधिक की रकम इस जिले में सिंचाई के लिये खर्च की गई है.

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