एक वर्ष का आध्यात्म !

कनक तिवारी: हर मनुष्य क्षणभंगुर है. जीवन लम्बा या उपलब्धियों भरा हो, उसका कभी न कभी तो अंत होना है. मनुष्य को जीवन से मोह होता है और मौत से भय. धर्म, आध्यात्म और परोपकार को समझने वाले लोग मौत के बाद प्रसिद्धि का कालजयी जीवन जीते हैं. कबीर छह सौ वर्षों पहले हुए थे. तुलसीदास करीब पांच सौ वर्ष पहले. यही किस्सा नानक, दादू, चैतन्य, तुकड़ोजी, ग़ालिब, इकबाल, सरोजिनी नायडू वगैरह किसी के लिए भी हो सकता है. अपना भौतिक जीवन पूरा हो जाने के बाद ये सभी चरित्र नया जीवन जी रहे हैं. हजारों वर्ष बाद भी मनुष्यता के इतिहास में ये जीवित ही कहलाएंगे. जिसे नैतिक ऊंचाई हासिल हो जाती है, वही कालजयी होता है.

छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री, विवादग्रस्त लेकिन जीवट के नेता अजीत जोगी ने एक वर्ष के लिए आध्यात्म का लिहाफ ओढ़ लिया है. उन्होंने घोषणा की है कि एक वर्ष तक आध्यात्मिक सत्संग और अनुभूति करेंगे. साधुओं की जमात नहीं होती. वे बहते पानी की तरह होते हैं, तालाब की संड़ांध नहीं. राजनीति वह कंबल है जिसे नेता नाम का साधु छोड़ना भी चाहें तो कंबल उसे नहीं छोड़ता. एक वर्ष तक आध्यात्म में दाखिला लेने का क्या मतलब है. यह जोगी ने स्पष्ट नहीं किया.


सरकारी बंगले में निवास किया जाए. मांसाहारी भोजन भी किया जाए. राजनीतिक क्रियाकर्म में संलग्न रहा जाए. जनसभाओं को संबोधित किया जाए. व्यक्तित्व को धारदार बनाने की कोशिशें की जाएं. पार्टी के उच्च कमान को संदेश दिया जाए कि मेरे बिना पार्टी को चलाना संभव नहीं है. विरोधियों की प्रकृति का सरकलम करने की कोशिशें की जाएं. कार्यकर्ताओं के हुजूम को लगातार आकर्षित और प्रेरित किया जाए. मीडिया का चतुर शोषण किया जाए. लेखकों, बुद्धिजीवियों, विचारकों, संस्कृतिकर्मियों वगैरह से ज्यादा राजनीतिज्ञों, उद्योगपतियों, नौकरशाहों, आरोपित अपराधियों वगैरह से संपर्क रखा जाए. तो इन सब गतिविधियों के चलते बेचारा आध्यात्म ‘अनुग्रह‘ के दरवाजे पर सहमता हुआ खड़ा रहेगा.

आध्यात्म का पहला पाठ भारती-बंधुओं के कबीर गायन से शुरू होगा. कबीर असली आध्यात्मिक थे. हिन्दू-मुसलमान, ऊंच-नीच, सवर्ण-दलित, गरीब-अमीर, हर तरह के सामाजिक व्यक्ति के लिए कबीर सूरज बनकर चमकते रहते हैं. उनका राजनीति से कुछ लेना देना नहीं था. वे राजनीति में पराजित होने के बाद आध्यात्मिक नहीं बने थे. तुलसीदास को पत्नी ने झिड़का. वे महान कवि और आध्यात्मिक बन गए. गौतम बुद्ध इतने वैभव में जी रहे थे कि अमीरी के कारण मितली आने लगी. अपने शरीर की हड्डियों को सुखा दिया लेकिन आध्यात्मिक बन ही गए.

गांधी राजनीति के समुद्र में डूबने के लिए कूदे थे, लेकिन लड़ाई के मैदान में भी आध्यात्मिक बनकर ही उभरे. यह शिक्षा उन्होंने कृष्ण से ली थी. कुरुक्षेत्र के मैदान में नपुंसकता से पीड़ित योद्धा अर्जुन में गीता के उपदेश के जरिए कृष्ण ने पौरुष भर दिया था. डॉ. लोहिया जब राजनीति से पराजित और निराश हो जाते तब विचारों को आध्यात्मिकता की स्याही बनाकर दुर्लभ लेखन करते. उन्हें गांधी के बाद सबसे बड़ा विचारक कहा जाता है. आध्यात्म का जीवन जोगी राजनीति में सक्रिय रहकर भी कायम रख सकते हैं. उसके लिए घोषणा नहीं आचरण की जरूरत है.

छत्तीसगढ़ के कांग्रेसी नेताओं में अजीत जोगी का व्यक्तित्व सबसे अनोखा है. उन्होंने अपनी क्षमताओं को न तो ठीक से पहचाना और न ही मूल्यांकन किया. अपनी क्षमताओं का परिष्कार भी नहीं किया. महत्वाकांक्षाओं को योजना बनाकर उन्होंने साकार तो किया. जब असली सत्ता की चाबी मुख्यमंत्री के रूप में मिली, तब जोगी के विवेक का संतुलन डगमगा गया. उन्हें कुटिल सलाहकारों के नवरत्नों ने घेर लिया. वे मुगल बादशाह अकबर से सीखना भूल गए कि लोकतंत्र में शासक का आतंक नहीं होना चाहिए. जोगी विरोधियों ने उनके खिलाफ सफल प्रचार किया. उनका अतिआत्मविश्वास ठीक नहीं था. प्रशासन पर उनकी अच्छी पकड़ थी. लेकिन उसमें मानवीयता का स्पर्श दिखाई नहीं पड़ता था.

छत्तीसगढ़ी बोली और भाषा का उन्होंने जनवादी उपयोग बखूबी किया लेकिन उससे समाज को बांटने की प्रवृत्ति झरती थी. लोकतंत्र में राजनीतिक विरोधियों को गांधी, नेहरू से लेकर रविशंकर शुक्ल तक ने लगातार सहायता और पनाह दी है. यह गुण जोगी को दिखाना चाहिए था. उन्हें जातिवाद जैसे जहर से मुक्त दीखना चाहिए था. दुर्भाग्य है कि उनके साथ बड़ी शारीरिक दुर्घटना हो गई. वे चाहकर भी बहुत सक्रिय नहीं हो सकते. फिर भी सक्रिय हैं. यदि दुर्घटना नहीं हुई होती तो आज छत्तीसगढ़ की राजनीति कहीं और खड़ी होती.

राजनीति में नकली आध्यात्मवादी ठुंसे हुए हैं. संत कहलाते आसाराम, बाबा रामदेव, श्री श्री रविशंकर, रामविलास वेदांती, योगी आदित्यनाथ, रामसुंदर दास, सतपाल महाराज वगैरह धार्मिक किस्म की उपलब्धियों के लिए जाने जाते हैं. उनको लेकर विचारशील लोग संदेह भी करते हैं. इन्हें राजनीतिज्ञों की जरूरत क्यों होती है?

दिग्विजय सिंह तो शहर, मोहल्ला और गांव स्तर के शंकराचार्यों के चरणों में झुकते रहते हैं. पहले भी धीरेन्द्र ब्रह्मचारी और चंद्रास्वामी आदि ने बहुत गुलगपाड़े किए हैं. जगतगुरु शंकराचार्य के नाम के इस्तेमाल से लोगों ने राजनीति और व्यवसाय में खूब रोटियां सेकीं हैं. अब भी सेंक रहे हैं. अरविन्द केजरीवाल भी विवादित मुल्ला से मिल ही चुके. धर्म का राजनीति से वैसे तो बहुत महत्वपूर्ण संबंध होता है.

लोहिया ने कहा था कि धर्म दीर्घकालीन राजनीति है और राजनीति अल्पकालीन धर्म. जोगी जैसा ज़हीन व्यक्ति कहीं आध्यात्म को अल्पकालीन राजनीति तो नहीं बना रहा होगा. राजनीति में कई बार सत्ता नहीं मिलती. भाजपा और डॉ. रमन सिंह का भाग्य और कर्म चाहे जैसे रहे हों. यह तो कांग्रेसियों का छत्तीसगढ़ में कर्म रहा है जिसके कारण उनकी सरकार नहीं बनी. बेचारे कांग्रेसी विधायक मुख्यमंत्री के साथ उड़नखटोले पर बैठकर हरिद्वार में गंगा में डुबकी लगा आए थे. फिर भी पुण्य नहीं मिला. तब के संस्कृति मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने तो शास्त्रों के आदेश के बिना राजिम में कुंभ आयोजित करने का ऐसा सिलसिला शुरू कर दिया कि पुण्य भाजपा के खाते में ही रुक गया.

कृष्ण जब तक युद्ध के नायक थे, गीता का आध्यात्म उनके साथ था. उन्होंने युद्ध छोड़ा, तो उनका नाम रणछोड़दास कहलाया. वे भागकर गुजरात पहुंचे थे. वहीं के नरेन्द्र मोदी रणछोड़दास के इतिहास को पलटने की कोशिश कर रहे हैं. वे कुरुक्षेत्र में लौटकर राजनीति के माध्यम से आध्यात्म को समझना चाह रहे हैं. यह वक्त है जब जोगी को राजनीति में अपना पौरुष दिखाकर आध्यात्म के मर्म की लोकसभा में प्रवचन करना चाहिए.

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