यह जोगी जोगड़ा नहीं !

कनक तिवारी

अजीत जोगी सुर्खियों में हैं. अब तक उनका राजनीतिक कौशल विपक्ष या सत्ता प्रतिष्ठान के प्रतिनिधि के रूप में दिखाई पड़ा था. जोगी जनता की ओर मुखातिब होकर कुछ व्यक्तियों के लिए दलीय अनुशासन की बंदिशों के चलते चुनौती की मुद्रा में हैं.


क्षेत्रीय असंतुलन, उपेक्षितों और अकिंचनों के प्रति प्रशासनिक दुर्लक्ष्य और कुलीन कुलों की नेताशाही के खिलाफ विद्रोह के चलते दोनों बड़ी राजनीतिक पार्टियों को छत्तीसगढ़ राज्य बनाना पड़ा. संस्थापक मुख्यमंत्री के रूप में अजीत जोगी का चयन खुद सोनिया गांधी ने किया था.

तीन वर्षों बाद हुए चुनाव में भाजपा ने मामूली अंतर से बढ़त लेकर अपनी सत्ता स्थापित की. 2008 के चुनाव में पुनरावृत्ति हुर्ई. गुटों में बंटी कांग्रेस विद्याचरण शुक्ल, मोतीलाल वोरा, श्यामाचरण शुक्ल और अजीत जोगी के रहते हुए भी सत्ता में वापसी नहीं कर पाई.

शुक्ल बंधु अब नहीं हैं. बूढ़े वोरा ने दिल्ली में राजनीतिक कारोबार जमा लिया है. बड़े नेताओं में जोगी अकेले हैं, जो मैदान में हैं. बाकी छोटे भाइयों की भूमिका में हैं.

युवा राहुल गांधी की अगुवाई में कांग्रेस के कुछ नए सपने हैं. कुछ घटनाओं के कारण बाकी नेता जोगी के खिलाफ लामबंद होते गए. दिग्विजय सिंह और मोतीलाल वोरा की युति को छत्तीसगढ़ में नए विकल्प सुझाने का श्रेय बताया जाता है. नंदकुमार पटेल की प्रदेश अध्यक्ष पद पर ताजपोशी एक उदाहरण है.

नक्सलियों के बर्बर हमले के कारण पटेल, विद्याचरण शुक्ल और महेन्द्र कर्मा जैसे नेता छिन गए. अकेले कांग्रेसी लोकसभा सदस्य चरणदास महंत को केन्द्रीय मंत्रिपरिषद सहित प्रदेश अध्यक्ष पद पर बिठाया गया. जोगी की अनदेखी बल्कि उपेक्षा का सिलसिला भी है. जोगी को दीवार पर लिखी इबारत तो पढ़ना आता है.

राजनीति संभावनाओं, भविष्यदृष्टि, तिकड़म बुद्धि और अभिव्यक्ति का मिलाजुला खेल है. इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद पहले आई. पी. एस. और फिर आई. ए. एस. में अपने ही राज्य की सूची में चुने जाने की कहानी जोगी की है. हालात और महत्वाकांक्षाओं ने उन्हें राजनीति में नया आसमान ढूंढ़ने का मौसम उपलब्ध कराया.

जोगी के सूचना तंत्र के प्रशासनिक, पत्रकारिक और राजनीतिक स्त्रोत हैं. हमलावर वृत्ति उन्हें बहुत प्रतीक्षा नहीं करने देती. अन्य नेताओं के मुकाबले अंगेज़ी और हिन्दी पर उनका भाषायी अधिकार है. उत्तेजित जोगी भी अपने शब्द विन्यास में चतुर आलोचक की तरह श्लेष, यमक, ब्याजनिन्दा, ब्याजस्तुति, वक्रोक्ति और अन्योक्ति अलंकारों वगैरह का सोचा समझा उपयोग करते हैं. उन्हें शब्द-छल में पकड़ पाना सरल नहीं होता.

छत्तीसगढ़ की राजनीति में लोक-संस्कृति के प्रतीकों, बोलियों, आदतों और लोकनायकों का इस्तेमाल होता है. आदिवासी, दलित तथा पिछड़े वर्ग बहुल प्रदेश में गुरु घासीदास, वीर नारायण सिंह, रानी दुर्गावती, अवंती बाई, गुंडाधूर सहित पौराणिक कथाओं तक कौशल्या, लोकतंत्र के नायक राम तथा राजा दिलीप आदि का लोकव्यापीकरण होता रहता है.

उनका प्रचार करने से ज़्यादा इन नामों की तलवार से राजनीतिक शत्रु के सर कलम करने का मकसद होता है. पता नहीं जोगी ने कभी कबीर को सबसे बड़ा प्रेरणा पुरुष कहा भी होगा. फिलहाल कबीरपंथी चरणदास महंत के चलते यह घोषणा उन्होंने की है. वाक्पटु, वाचाल और वाक्विदग्ध जोगी छत्तीसगढ़ी संबोधनों के नए शिल्पी तो हो रहे हैं.

बिसाहूदास महंत, चन्दूलाल चन्द्राकर, रेशमलाल जांगड़े, खूबचंद बघेल, गणेशराम अनंत, झुमुकलाल भेड़िया, मथुरा प्रसाद दुबे, अरविन्द नेताम आदि छत्तीसगढ़ी में पारंगत रहने के बावजूद उसकी मारक शक्ति का इस्तेमाल नहीं कर पाए. शहरी भाषणों में भी जोगी ने स्थानीय बोली के लगभग आविष्कार के जरिए छत्तीसगढ़ी राजनीतिक अस्मिता को विकसित और पुष्ट करने का श्रेय लिया है.

जोगी के अर्थमय कटाक्ष दुधारी तलवार होते हैं. ‘छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया‘ वाला नारा जबान पर चढ़ जाए तो वह ‘आमची मुम्बई‘ की तरह संकुचित नहीं बल्कि ‘आमार सोनार बांग्लादेश‘ की शैली का बनता है. ‘छत्तीसगढ़ को किसी बाहरी गढ़ की ज़रूरत नहीं है‘ राजकुलीन श्रेष्ठि वर्ग को चुनौती है जिनके मूल भौगोलिक स्थान में ‘गढ़‘ जुड़ा हुआ है. जोगी का निहितार्थ शायद दिग्विजय सिंह और डा. रमन सिंह की तरफ रहा होगा.

फिलहाल जोगी ने सतनामी समाज और कांग्रेस की अजातशत्रु नेता मिनी माता के नाम पर आयोजित सभाओं में नए करतब दिखाए हैं. कांग्रेस के नेताओं और नारों से परहेज़ दिखाने से उन गैर कांग्रेसी वर्गों तक भी घुसपैठ बनी जो शायद कांग्रेस को समर्थन देने पर विचार करें. जोगी ने साहित्य के अलंकारों का सहारा लेकर कई तरह के द्विअर्थी प्रयोग किए, जिससे चाहकर भी उनके खिलाफ अनुशासहीनता का मामला नहीं बनाया जा सके.

छत्तीसगढ़ की दलीय राजनीति दिमागी जड़ता का शिकार भी रही है़. राजनीतिक दल जनमत को शिक्षित करने के बदले उसे हकालने में सिद्धहस्त हैं. क्षेत्रीय अस्मिता और स्वाभिमान के तेवर बहुत विपरीत परिस्थितियों में ही उगते हैं.

मसलन तमिलनाडु, ओडिसा, पश्चिम बंगाल या तेलंगाना. बस्तर, सरगुजा, रायगढ़, जशपुर, कोरबा वगैरह आदिवासी इलाकों में औद्योगिक घरानों की लूटखसोट को लेकर राजनीतिक दल चुप हैं. यह कुचक्र उनकी ही नीतियों के कारण है.

सब्र का एक बिन्दु आता है जिसके टूट जाने पर ही नेता सच बोल पाता है. जोगी के भाषणों में भी अभी वह परिपाक नहीं आया है. संविधान की पांचवीं अनुसूची और पेसा जैसे कानून पर अमल, अनावश्यक औद्योगीकरण, जंगलों, भूमियों, लोहा और कोयला वगैरह की लूटखसोट, बेरोज़गारी, बढ़ते अपराध, बाहरी लोगों का संसाधनों पर कब्ज़ा जैसे ढेरों मुद्दे हैं जिनको लेकर कांग्रेस और भाजपा के नेताओं की सच का बयान करने में घिग्गी बंध जाती है.

अमेरिकापरस्त वैश्वीकरण की नीतियां भारतीय अवाम के दिमाग की उपज नहीं हैं. जोगी को अपनी तीक्ष्ण बुद्धि के चलते वह मर्यादा रेखा मालूम है जिसके कारण उनकी नई विद्रोही मुद्रा उन्हें गैरचुनौतीपूर्ण जननेता नहीं बना पा रही है.

अजीत जोगी को लेकर यह बात प्रचारित की गई है कि उनके प्रशासन में सुरक्षा नहीं है. शासकीय कर्मचारियों, पत्रकारों, सेवानिवृत्त लोगों, छोटे दूकानदारों और निठल्ले बुद्धिजीवियों का भी अफवाहतंत्र होता है. मिथक रचा जाता है कि अमुक नेता अलोकतांत्रिक है. अमुक सरकार से मंथली ले रहा है. अमुक की नौकरशाहों पर पकड़ ढीली है. अमुक केवल अपने दरबारियों से घिरा होता है. अमुक उच्च कमान के द्वारा जबरिया जनता पर थोपा जा रहा है. नरेन्द्र मोदी बनाम सब जैसी स्थिति यदि बनाई जाए तो वह मोदी को कहां नुकसान पहुंचाएगी.

छत्तीसगढ़ में सब अजीत जोगी के पीछे पड़े दिखाए जाएंगे तो जोगी को ही संभावना मिलेगी कि हर क्षण अपनी लोकप्रियता के सेंसेक्स को नापते हुए अपना राजनीतिक ग्राफ तय करें. राजनीति के ठहरे हुए तालाब में जोगी ने एक पत्थर फेंककर हलचल तो मचा दी है.

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