आत्मनिर्भर दवा क्षेत्र में FDI क्यों

डॉ. अमित सेनगुप्ता
हाल ही में प्रत्यक्ष विदेशी निवेशों के लिए दरवाजे और चौपट खोलने के जो कदम उठाए गए हैं, उनके क्रम में दवाओं के क्षेत्र में विदेशी निवेश के नियमों को भी और उदार बना दिया गया है. इस क्षेत्र में निवेश के अब तक चले आ रहे नियम, ग्रीन फील्ड परियोजनाओं के मामले में यानी पूरी तरह से नयी उत्पादन सुविधाएं लगाने के लिए ऑटोमैटिक रूट यानी पूर्व-अनुमति की जरूरत के बिना 100 फीसद प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की इजाजत देते थे. दूसरी ओर ब्राउन फील्ड परियोजनाओं के मामले में यानी पहले से मौजूद घरेलू परियोजनाओं के अधिग्रहण के मामले में भी 100 फीसद प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की इजाजत थी, लेकिन सरकार की पूर्वानुमति के बाद ही. लेकिन, अब जो नये नियम बनाए गए हैं उनके तहत पहले से मौजूद कंपनियों का अधिग्रहण करने (ब्राउन फील्ड प्रोजैक्ट) के लिए भी 74 फीसद तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश लाने के लिए, ऑटोमैटिक रास्ता खोल दिया गया है यानी इसके लिए अब सरकार से अनुमति नहीं लेनी पड़ेगी.

हां! संबंधित कंपनी का जो बाजार मूल्य है, उसके 74 फीसद से ज्यादा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश लाने के लिए जरूर सरकार से इजाजत लेने की जरूरत पड़ेगी. जाहिर है कि इसके साथ ही, ग्रीन फील्ड परियोजनाओं में बिना पूर्वानुमति के 100 फीसद प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की इजाजत के पहले के नियम को बनाए रखा गया है. यह सब मिलकर दवाओं के क्षेत्र से संबंधित सार्वजनिक नीति में एक बड़े बदलाव का सूचक है, जिसके मध्यम अवधि में और दीर्घावधि में बहुत भारी दुष्परिणाम होंगे.


भारत का दवा उद्योग और विकासशील दुनिया
भारत का दवा उद्योग एक राष्ट्रीय परिसंपत्ति है, जिसे पिछले जमाने की सार्वजनिक नीतियों के सहारे से खड़ा किया गया था. भारत के दवा उद्योग को आज भी व्यापक रूप से विकासशील दुनिया की एक ‘कामयाबी की कहानी’ के तौर पर देखा जाता है. भारत का दवा उद्योग, दवाओं के उत्पादन के परिमाण के हिसाब से, दुनिया भर में तीसरे नंबर पर आता है. वास्तव में भारत का दवा उद्योग, सस्ती जैनरिक दवाओं का दुनिया का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है. जैनरिक दवाओं से आशय ऐसी दवाओं से है जो पेटेंट संरक्षण के दायरे में नहीं आती हैं और बिना पेटेंट नियंत्रण के भारत में बनायी जा सकती हैं और खुद भारत में बेची जाने के अलावा, अन्य देशों के लिए उनका निर्यात भी किया जा सकता है.

भारत में आत्मनिर्भर दवा उद्योग के विकास के पीछे, जो अल्प तथा मध्यम आय श्रेणी के देशों में सबसे बड़ा दवा उद्योग है, हमारे देश की घरेलू नीति का बड़ा हाथ रहा है. इसे संभव बनाने में जिन अनेक कारकों का हाथ रहा है उनमें 1970 का पेटेंट कानून, 1950 तथा 1960 के दशकों में सार्वजनिक क्षेत्र में बुनियादी दवाओं के निर्माण की पहल और 1978 की दवा नीति की विशेष भूमिका रही. 1978 की दवा नीति में विदेशी दवा कंपनियों के काम-काज पर अनेक पाबंदियां लगायी गयी थीं जबकि भारतीय कंपनियों को वरीयता दी गयी थी. सार्वजनिक क्षेत्र के शोध संस्थानों की सामर्थ्य को ऐसी दवाओं के निर्माण की नयी प्रक्रियाएं विकसित करने के लिए लगाया गया, जिन पर पेटेंट अधिकारों की शर्त लागू नहीं होती थी. इसका नतीजा यह हुआ कि दवा के पेटेंट की अवधि 20 साल की होने के बावजूद, विश्व बाजार में उतारी जाने के दो से पांच वर्ष के अंदर भारत में नयी दवाएं उत्पादन चक्र में आ जाती थीं.

इस तरह, न सिर्फ पेटेंट की अवधि पूरी होने से पहले भारत में इन दवाओं का निर्माण संभव होता था बल्कि ये दवाएं उल्लेखनीय तरीके से सस्ती भी पड़ती थीं.

1970 से लगातार भारत में जेनेरिक दवाओं का जो विकास हुआ, उसका भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया भर पर दूरगामी प्रभाव पड़ा है. मिसाल के तौर पर नयी सहस्राब्दी के मोड़ पर एचआइवी/ एड्स की बीमारी अपने शिखर पर थी. लेकिन, सन 2000 तक आते-आते इस बीमारी के ‘मौत की सजा’ के रूप पर काबू पाया जा चुका था. वास्तव में एंटी-रेट्रोवाइरल दवाओं के योग ने एड्स के रोगियों के लिए सामान्य जीवन जीना संभव बना दिया था. लेकिन, समस्या यह थी कि ये दवाएं ज्यादातर विकासशील देशों में एड्स रोगियों की पहुंच से ही बाहर थीं.

पेंटेंट अधिकार से संरक्षित इन दवाओं से उपचार का सालाना खर्चा 10 से 15 हजार अमरीकी डालर के बराबर बैठता था. भारतीय जैनरिक दवा कंपनी, सिप्ला ने 2001 में एचआइवी/ एड्स के उपचार के परिदृश्य को ही तब पूरी तरह से बदल दिया, जब उसने एंटी-रिट्रोवाइरल दवाओं का वही कंबिनेशन, 350 अमरीकी डॉलर प्रति वर्ष के दाम में पेश कर दिया. जल्द ही दूसरी अनेक भारतीय जेनरिक दवाएं बाजार में आ गयीं और इसके बाद उपचार का खर्चा और नीचे आ गया. इस तरह, भरतीय जेनेरिक एंटी-रिट्रोवाइरल दवाओं के प्रवेश ने एचआइवी/ एड्स के उपचार की सूरत ही बदल कर रख दी और दसियों लाख जिंदगियां बचायीं.

इस तरह 2000 के दशक के मध्य तक भारत को, ‘दक्षिण (विकासशील दुनिया) का दवाखाना’ कहा जाने लगा था. अब भारत की सस्ती जेनरिक दवाएं अफ्रीका, लातीनी अमरीका तथा एशिया के सौ से ज्यादा देशों तक पहुंच रही थीं. वास्तव में आज भी लघु तथा मध्यम आय श्रेणियों के ज्यादातर देशों के 92 फीसद मरीज, जेनेरिक एंटी-रिट्रोवाइरल दवाओं का ही उपयोग कर रहे हैं, जिनमें ज्यादातर भारत में की ही बनी हुई हैं. यूनिसेफ द्वारा विकासशील देशों में वितरित की जाने वाली अति-आवश्यक दवाओं में से 50 फीसद के करीब भारत की ही बनी होती हैं. इसी प्रकार अंतर्राष्ट्रीय डिस्पेंसरी एसोसिएशन द्वारा वितरित की जाने वाली तमाम दवाओं का 75 से 80 फीसद हिस्सा भारत में ही बनता है.

भारतीय जेनरिक दवा कंपनियों से हाथ खींचा
बहरहाल, 1990 के दशक में भारत में नवउदारवादी सुधार शुरू होने के साथ, घरेलू उद्योगों की मदद करने की सार्वजनिक नीति का पलटा जाना शुरू हो गया. दवाओं के क्षेत्र की दो प्रमुख सार्वजनिक कंपनियों–हिंदुस्तान एंटीबायोटिक्स लि. और इंडियन ड्रग्स एंड फर्मास्युटिकल्स लि. को व्यवस्थित तरीके से कमजोर किया गया. यह एक तो उन पर अकुशल प्रबंधन थोपने के जरिए किया गया और दूसरे, उन्हें दी जाने वाली वरीयता को खत्म करने के जरिए. इस तरह, 1978 की दवा नीति के मुख्य बातों को बहुत कमजोर कर दिया गया और क्रमश: 1986, 1974 तथा 2002 की दवा नीतियों में इन बातों को पलट ही दिया गया. इस तरह, 1978 की नीति में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुकाबले में भारत को जो अनेक संरक्षण दिए गए थे, उन्हें नकार ही दिया गया.

इसके बाद, 2005 में भारत के पेटेंट कानून में ही संशोधन कर दिया गया. इसकी, जरूरत इसलिए पड़ी कि भारत ने 1995 में विश्व व्यापार संगठन की संधि को स्वीकार कर लिया था, जिसके तकाजे पर भारत को व्यापार संबंद्ध बौद्धिक संपदा अधिकारों (ट्रिप्स) पर दस्तखत करने पड़े थे. इसका नतीजा यह हुआ कि भारतीय कंपनियों के हाथ से यह स्वयं सिद्घ अधिकार छिन गया कि विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पेटेंट अधिकार के दायरे में आने वाली दवाएं अपनी मर्जी से बनाएं. दूसरी ओर, सार्वजनिक क्षेत्र के शोध संस्थानों का गला फंड की कमी के जरिए घोंटा जा रहा था. इसका नतीजा यह हुआ कि अब वे नवोन्मेषी प्रौद्योगिकियों के सहारे घेरलू दवा उद्योग की पहले की तरह मदद करने की स्थिति में नहीं रह गए थे.

भारत के जेनरिक दवा उद्योग में पिछले दो दशकों में एक और महत्वपूर्ण बदलाव आया था. बहुत थोड़े से निर्यात बाजार से शुरू कर यह उद्योग उस स्थिति में पहुंच गया था, जहां भारत के दवा उद्योग के विनिर्माण उत्पादन के बड़े हिस्से का निर्यात हो रहा था. वास्तव में हो यह रहा था कि भारत के जेनरिक दवा उद्योग की संवृद्धि निर्यात से संचालित थी जबकि उनका घरेलू उपभोग गतिरोध की स्थिति में था. 1995-96 से 2008-09 के बीच, 14 वर्षों में से तीन में इन दवाओं के घरेलू उपभोग में बढ़ोतरी की जगह गिरावट ही दर्ज हुई थी जबकि चार अन्य वर्षों में यह वृद्धि एक अंक से आगे नहीं जा पायी थी.

इस निर्यात संचालित वृद्धि का असर, उन विकल्पों के चुनाव में सामने आ रहा है, जिन पर भारतीय दवा कंपनियां और खासतौर पर बड़ी तथा मंझली कंपनियां, चलने के लिए तैयार हो सकती हैं. जाहिर है कि घरेलू बाजार में खपत में देखने को मिल रहा गतिरोध, इन दवाओं का उपयोग करने में मरीजों को अपनी जेब से करने पर पड़ रहे खर्च के बोझ से जुड़ा हुआ है. चूंकि सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में निवेश लगातार घटाया जा रहा है, भारतीय दवा उपभोक्ताओं के बढ़ते हिस्से को दवाओं के बाजार से ही बाहर धकेला जा रहा है और यह घरेलू मांग में गतिरोध की ओर ले जा रहा है. दवाओं के घरेलू बाजार के इस गतिरोध का कोई दीर्घावधि समाधान तब तक नहीं निकल सकता है, जब तक स्वास्थ्य रक्षा पर सार्वजनिक खर्चों में उल्लेखनीय रूप से ज्यादा तथा लगातार बढ़ोतरी नहीं की जाती है और सार्वजनिक क्षेत्र से दवाओं की बढ़ती हुई खरीदी नहीं की जाती है.

भारतीय दवा कंपनियों की निर्यात पर बढ़ती निर्भरता
बड़ी भारतीय कंपनियों की निर्यात पर निर्भरता का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि शीर्ष 25 भारतीय कंपनियों की मार्केट सेल का 60 फीसद से ज्यादा हिस्सा, निर्यातों से ही आ रहा था. इनमें से 8 के मामले में तो कुल बिक्री का 80 फीसद से ज्यादा निर्यातों से ही आ रहा था. पुन:, इन निर्यातों का बड़ा हिस्सा अब खुद विकसित देशों के बाजारों तक पहुंच रहा है. 2011 में भारत के कुल दवा निर्यातों का 63 फीसद हिस्सा, 26 शीर्ष निर्यात ठिकानों तक पहुंचा था और इसमें से भी 23.45 फीसद अमरीकी बाजारों में पहुंचा था और 20.15 फीसद और हिस्सा, अन्य विकसित देशों के बाजारों में. निर्यातों और उसमें भी खासतौर पर यूरोप व उत्तरी अमरीका के लिए निर्यातों पर यह बढ़ती निर्भरता, बड़ी भारतीय दवा कंपनियों को ऐसी स्थिति में ले आयी है जहां उन्हें अपनी नीतियों को, विकसित दुनिया के देशों की नीतियों के अनुकूल ढालने की जरूरत महसूस होने लगी है.

अब जबकि भारत की सार्वजनिक नीति के जरिए हासिल होने वाली मदद हासिल नहीं रह गयी है, भारतीय जेनरिक कंपनियां अब अमरीकी तथा यूरोपीय दवा बहुराष्ट्रीय निगमों को चुनौती देने के बजाए, उनके साथ गठजोड़ करना ही ज्यादा पसंद करेंगे. घरेलू दवा कंपनियां अब बढ़ते पैमाने पर ऐसे गठबंधनों की तलाश कर रही हैं, जिनमें घरेलू उत्पादन सुविधाओं का उपयोग शोध व विकास और विनिर्माण व मार्केटिंग, दोनों की आउटसोर्सिंग के लिए किया जा सके. आज प्रमुख भारतीय जेनरिक दवा कंपनियों के व्यापारिक फैसलों व नीतियों को, बहुराष्ट्रीय निगमों के साथ गठजोड़ की उनकी जरूरतें तय कर रही हैं. यह करीब 15 साल पहले के हालात से एक बड़े बदलाव का सूचक है, जब सिप्ला जैसी बड़ी भारतीय कंपनियां, बहुराष्ट्रीय निगमों के विरोध का सामना करने के लिए तैयार थीं.

एफडीआइ उदारीकरण की अंधी दलील
दवा क्षेत्र में एफडीआइ के लिए नियम-कायदों में हाल में जो उदारीकरण लाया गया है, एक आत्मनिर्भर उद्योग के रूप में भारतीय दवा उद्योग के कायम रहने के लिए और चुनौतियां पेश करता है. भारतीय दवा कंपनियों और बहुराष्ट्रीय निगमों के बीच ‘‘रणनीतिक’’ गठबंधनों के साथ ही साथ, बहुराष्ट्रीय निगमों द्वारा भारतीय कंपनियों के अधिग्रहणों का सिलसिला भी चलता रहा है. 2001 में दवा क्षेत्र के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के नियमों के उदार बनाए जाने ने, इस तरह के अधिग्रहणों को आसान बनाया था. औद्योगिक उदारीकरण के आरंभिक दौर में ही, 1991 में जो औद्योगिक नीति वक्तव्य रखा गया था उसमें यह दावा किया गया था कि, ‘विदेशी निवेश अपने साथ प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, मार्केटिंग विशेषज्ञता, आधुनिक प्रबंधन तकनीकों के आगमन तथा निर्यातों के संवर्धन की नयी संभावनाओं के लाभ लेकर आएंगे.’

लेकिन, सच्चाई यह है कि 2001 से लगातार, जो पहला वर्ष है जब दवा क्षेत्र में 100 फीसद प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की इजाजत दी गयी थी (हालांकि, ब्राउन फील्ड परियोजनाओं के मामले में सरकार की पूर्वानुमति की शर्त बनी हुई थी) हमारे देश में काम कर रहे बहुराष्ट्रीय निगमों के निर्यात-बिक्री अनुपात में, 2000-01 से 2008-09 के बीच सिर्फ मामूली बढ़ोतरी हुई थी और यह अनुपात 7 फीसद से बढक़र सिर्फ 11 फीसद हुआ था. पुन: दवाओं के क्षेत्र में आए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का प्रचंड रूप से बड़ा हिस्सा ब्राउनफील्ड परियोजनाओं में गया है और आंकड़े दिखाते हैं कि 2012 के अप्रैल से 2013 के अप्रैल के बीच आय प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में 96 फीसद हिस्सा ब्राउनफील्ड परियोजनाओं में ही आया था.

अब से चंद साल पहले तक, सरकार का औद्योगिक संवद्र्घन व नियोजन विभाग, घरेलू कंपनियों के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के उदार नियमों से पैदा होने वाले खतरे की ओर इशारा किया करता था. डीआइपीपी के एक आंतरिक नोट में कहा गया था: ‘इसका नतीजा यह हुआ है कि कुंजीभूत दवा कंपनियों का, दुर्लभ सुविधाओं तथा अति महत्वपूर्ण कंपनियों का अधिग्रहण किया गया है, जिसमें रैनबैक्सी, पीरामल, संस्था बायोटैक, एजिला स्पेशिएलिटीज तथा डाबर’ शामिल हैं. 2012 में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर जो अंतर-मंत्रालयी ग्रुप गठित किया गया था, उसने यह सिफारिश की थी कि दवा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए 49 फीसद की अधिकतम सीमा लगायी जाए. बहरहाल, पिछली सरकार ने भी और वर्तमान सरकार ने भी, दोनों ने इस अंतर-मंत्रालयी ग्रुप के सुझावों का अनुमोदन करने से इंकार कर दिया.

मोदी सरकार का देशभक्ति का स्वांग
आज भारतीय जेनरिक दवा कंपनियों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बीच बढ़ते गठजोड़ ने, एक ऐसे स्वतंत्र व आत्मनिर्भर दवा उद्योग के कायम रहने पर सवाल खड़ा कर दिया है, जिसे दुनिया के विभिन्न हिस्सों में गरीब किसानों की जीवनरक्षक रेखा की तरह देखा जाता था. इस संदर्भ में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का और उदारीकरण, भारतीय जेनरिक दवा उद्योग के ताबूत में आखिरी कील ठोकने की तरह है. इसके बाद अब भीमकाय बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए इसके दरवाजे खुल गए हैं कि मनचाही भारतीय कंपनियों का अधिग्रहण कर लें या उन्हें अपना जूनियर पार्टनर बनाकर छोड़ दें.

इस तरह आज न सिर्फ घरेलू दवा उद्योग का अस्तित्व दांव पर लग गया है बल्कि सस्ती जेनरिक दवाओं की पूरी की पूरी आपूर्ति भी दांव पर लग गयी है, जो न सिर्फ भारत में बल्कि दुनिया भर में गरीबों की दवाओं की जरूरत पूरी करती थी. जहां तक अमरीकी, यूरोपीय तथा जापानी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का सवाल है, उनके लिए तो भारत की जेनरिक दवा कंपनियां, तोडऩे के लिए तैयार पके हुए फल की तरह हैं. बहुराष्ट्रीय कंपनियां अब आसानी से भारतीय जेनरिक विनिर्माताओं का अधिग्रहण कर सकती हैं और उनकी क्षमताओं का, अपने व्यापारिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल कर सकती हैं. एक बात तो पक्के तौर पर कही जा सकती है कि उनके इन व्यापारिक हितों में सस्ती जेनरिक दवाओं की अबाध आपूर्ति बनाए रखना शामिल नहीं होगा. इसी तरह उनके व्यापारिक हितों में नवोन्मेषी प्रौद्योगिकियां को लाना भी शामिल नहीं होगा. पीछे हम यह भी देख आए हैं कि किस तरह पिछले 15 साल से ऑटोमैटिक रूट से 100 फीसद प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की इजाजत बनी रहने के बावजूद, ग्रीन फील्ड परियोजनाओं में विदेशी कंपनियों ने शायद ही कोई दिलचस्पी दिखाई होगी.

अब दवा उत्पादन के ब्राउन फील्ड क्षेत्र में 74 फीसद तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए ऑटोमैटिक रूट से इजाजत देने के जरिए मोदी सरकार ने दुनिया भर में और खुद भारत में भी, करोडों गरीब मरीजों के स्वास्थ्य संबंधी कल्याण को दांव पर लगा दिया है. यह सब साफ तौर पर नवउदारवादी तर्क के आधार पर ही हो रहा है, जिसमें पूंजी के हितों को सबसे ऊपर रखा जाता है और जनता के कल्याण को गाली की तरह लिया जाता है. याद रहे कि भारत का दवा उद्योग किसी भी तरह से बुरे हाल में नहीं था और उसके मुनाफे लगातार काफी तगड़े बने रहे थे.

2015-16 में भारतीय दवा भारतीय दवा उद्योग का मुनाफा, केंद्र सरकार के 2016-17 के पूरे स्वास्थ्य बजट के बराबर रहा था. इस तरह, वास्तव में सवाल यही है कि इस ताजातरीन रियायत के जरिए, क्या हासिल करने की उम्मीद की जा रही है? सरकार के विकल्प बिल्कुल स्पष्ट थे. वह सार्वजनिक स्वास्थ्य में निवेश करने के जरिए, घरेलू मांग को बढ़ा सकती थी और सार्वजनिक क्षेत्र की शोध संस्थाओं में उपलब्ध विशेषज्ञता का उपयोग कर, नवोन्मेषी प्रौद्योगिकियां ला सकती थी और भारत में विश्वस्तरीय दवा उत्पादन कारखाने कायम कर सकती थी, जिससे दुनिया भर के मरीजों की जरूरतें पूरी होती रहें.

इसके बजाय मोदी सरकार ने तो मूल्यवान भारतीय दवा उत्पादन सुविधाएं विदेशी बहुराष्ट्रीय निगमों के हवाले करने का फैसला कर लिया है. इससे इस सरकार की फर्जी देशभक्ति की असलियत सामने आ जाती है. ‘मेक इन इंडिया’ सचमुच ‘लूट इन इंडिया’ का समानार्थी बन गया है.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!