‘बदलाव की गंगोत्री ग्रंथालयों में है’

नई दिल्ली | संवाददाता: अमित शाह का कहना है पढ़ने-लिखने वाले लोग राजनीति में आना चाहिये. इतना ही नहीं उनका मानना है कि राजनीति करने वालों में लिखने-पढ़ने का अभ्यास निरंतर होना चाहिये. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने अपने ब्लॉग में कार्यकर्ताओं से कहा आव्हान् किया है देश की राजनीतिक संस्कृति बदलने की गंगोत्री ऐसे ग्रंथालयों में है इस तथ्य को हम न भूले.

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने अपने हालिया छत्तीसगढ़ के दौरे का उल्लेख करते हुये रायपुर में ‘नानाजी देशमुख स्मृति वाचनालय’ तथा पार्टी के ई-ग्रंथालय के उद्घाटन का जिक्र किया है.


उन्होंने अपने ब्लॉग में इसके बारें में लिखा है, “इसे एक आदर्श ग्रंथालय के रूप में तैयार किया गया है तथा नानाजी देशमुख जन्म शताब्दी वर्ष की उपलक्ष्य में इसका नाम ‘नानाजी देशमुख स्मृति वाचनालय’ रखा गया है. केवल दो महीने के अल्पावधि में निर्मित इस ग्रंथालय में विभिन्न श्रेणियों के 10,255 पुस्तकें उपलब्ध हैं. आधुनिक तकनीकों से युक्त इस ग्रंथालय में पार्टी दस्तावेज, दुर्लभ पांडुलिपियां, संविधान, इतिहास, दर्शन आदि विषयों से संबंधित अनेक पुस्तक-पुस्तिकाएं उपलब्ध हैं. वाई-फाई सुविधा से युक्त यहां पर्याप्त जगह उपलब्ध है जहां बैठकर अध्ययन किया जा सकता है. इसमें कोई संदेह नहीं कि यह ग्रंथालय अन्य प्रदेशों के लिए एक आदर्श प्रस्तुत करेगा.”

भाजपा की लाइब्रेरी में गांधी-मार्क्स

पार्टी का ग्रंथालय : राजनीति की संस्कार शाला

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने राजनीतिक पार्टी के कार्यालय में ग्रंथालय खोलने के अपने विचार के बारें में तर्क दिया है, “किसी को लग सकता है कि भला राजनीतिक दल के कार्यालय में ग्रंथालय की क्या जरूरत है? यह तो राजनीतिक उठापटक का केंद्र है, रणनीति की प्रयोगशाला है या फिर मीडिया से मिलने जुलने का स्थान है. मगर मुझे बताना चाहिये कि स्वाधीनता के पूर्व और उसके पश्चात भी राजनीति में ’विचारक’ राजनेताओं की एक स्वथ्य, समृद्ध परंपरा रहती आयी है. गोपाल कृष्ण गोखले, महात्मा गांधी, वीर सावरकर, राम मनोहर लोहिया, दीनदयाल उपाध्याय और अटल बिहारी वाजपेयी इत्यादि से लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक कितने सारे राजनेता लेखक, चिंतक, कवि या विचारक भी रहे हैं. यही कारण था कि भारतीय राजनीति में जनतंत्र के प्रति आस्था बनी रही. इसी धारा को आज के वर्तमान युग में हमें हर प्रदेश में बरकरार रखना है तो लिखने-पढ़ने-अध्ययन करने वाले लोग राजनीति में आने चाहिये और राजनीति करने वालों ने लिखने-पढ़ने का अभ्यास निरंतर रखना चाहिये.”

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