जजों की नियुक्तियां को चुनौती

नई दिल्ली | एजेंसी: मोदी सरकार के राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्तियां विधेयक को सर्वोच्य न्यायालय में चुनौती दी गई है. राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्तियां विधेयक की सांवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय में कई जनहित याचिकाएं दायर की गई हैं, जिन पर न्यायालय में सोमवार को सुनवाई होगी. याचिका में कहा गया है कि यह विधेयक असंवैधानिक, अमान्य और संविधान के बुनियादी ढांचे का उल्लंघन है.

सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर.एम. लोढ़ा, न्यायमूर्ति कुरियन जोसफ और न्यायमूर्ति रोहिंटन फाली नारिमन ने गुरुवार को कहा कि इस मामले की सुनवाई इसी तरह की अन्य याचिकाओं के साथ की जाएगी. सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन की याचिका पर वरिष्ठ वकील सुशील कुमार जैन और दूसरे वकील आर. के. कपूर की दलील सुनने के बाद अदालत ने यह निर्देश दिया.

विधेयक इस महीने की शुरुआत में संसद से पारित किया गया. यह उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति की मौजूदा कॉलेजियम प्रणाली का स्थान लेगा. इसके लिए संसद ने 99वां संविधान संशोधन विधेयक भी पारित किया.

प्रस्तावित एनजेएसी में छह सदस्य होंगे जिसमें प्रधान न्यायाधीश और वरिष्ठता में उनके बाद आने वाले शीर्ष अदालत के दो वरिष्ठ न्यायाधीश, कानून मंत्री और दो प्रमुख हस्तियां शामिल होंगी.

एससीएओआर की ओर से दायर याचिका में प्रख्यात न्यायविद फाली नारिमन ने यह घोषित किए जाने की मांग की है कि संविधान द्वारा पारित संविधान संशोधन विधेयक ‘संविधान के बुनियादी ढांचे का उल्लंघन करता है और यह अमान्य, अवैध और असंवैधानिक है.’

विधेयक के जरिए संशोधित अनुच्छेद 124 (2) में अब कहा गया है, “सर्वोच्च न्यायालय के हर न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा अपने अधिकार से और अनुच्छेद 124ए में उल्लेखित राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग की सिफारिश पर किया जाएगा.”


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