कमजोर पड़ रही आप की लहर

दिवाकर मुक्तिबोध
आम आदमी पार्टी के संयोजक एवं दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को अपनी सरकार बचाने की फिक्र नहीं है. उनका कहना है कि वे सरकार बचाने की राजनीति नहीं करते. केजरीवाल का यह दो-टूक बयान इस बात का संकेत है कि वे यह मानकर चल रहे हैं कि उनकी सरकार 6 माह से ज्यादा नहीं चल सकती. दरअसल सरकार की उम्र की अनिश्चितता तो उसी दिन तय हो गयी थी जिस दिन उन्होंने अल्पसंख्यक सरकार के प्रमुख के रूप में शपथ ली थी.

दिल्ली में सरकार बनाने के पीछे उनकी मंशा अपनी पार्टी के चुनावी घोषणा पत्र में उल्लेखित कुछ मुद्दों पर फैसले लेने, उन्हें लागू करने तथा पार्टी को राजनीतिक ताकत देने की थी. लेकिन सिलसिला शुरू होता इसके पूर्व ही पार्टी राजनीति के चक्रव्यूह में फंस गई. विदेशी महिलाओं के मामले में उनके कानून मंत्री सोमनाथ भारती का कानून के घेरे में आना, उनकी बर्खास्तगी की मांग पर भाजपा का धरना और अपनी ही पार्टी के विधायक विनोद कुमार बिन्नी को बाहर का रास्ता दिखाना, नई मुसीबतें खड़ी कर रहा है.


पार्टी की किरकिरी तब और अधिक हुई जब सोमनाथ भारती से बदसलूकी करने वाले पुलिस अधिकारियों के तबादले की मांग को लेकर केजरीवाल केबिनेट सड़क पर आ गई. उनका दो दिवसीय धरना-आंदोलन, यद्यपि मांगें आंशिक रूप से स्वीकार करने के साथ खत्म हुआ था लेकिन जनमानस में इसका कोई अच्छा संदेश नहीं गया.

दिल्ली में आप की सरकार का यह कदम आत्मघाती कहा जा सकता है क्योंकि इससे पार्टी की स्वीकार्यता को आंशिक रूप से ही सही झटका लगा है. दिल्ली विधानसभा चुनावों के बाद ऐसा लग रहा था आप की आंधी देशभर में खासकर हिन्द प्रांतों में जोर पकड़ेगी, दिल्ली में सरकार बनने के बाद लोकसभा की तीन सौ सीटों पर चुनाव लड़ने एवं 10 जनवरी से 26 जनवरी तक नि:शुल्क सदस्यता अभियान प्रारंभ करने के फैसले से इसे और हवा मिली लेकिन ‘आप’ सरकार की मौजूदा कार्यप्रणाली से यह महसूस किया जा रहा है कि हवा अब पहले जैसी खुशगवार नहीं है. बाह्य एवं आंतरिक संकटों का दौर शुरू हो गया है हालांकि इससे उबरने के लिए आम आदमी पार्टी किनारा पकड़ने की कोशिश कर रही है.

इस बीच आगामी लोकसभा चुनावों के संदर्भ में कुछ चुनावी सर्वेक्षण भी जारी हुए हैं. कतिपय न्यूज चैनलों के इस सर्वेक्षणों में आज की स्थिति में आम आदमी पार्टी के लिए अच्छी संभावनाएं व्यक्त की गई है. लेकिन चुनाव में कम से कम तीन महीने का वक्त है लिहाजा ये सर्वेक्षण केवल ‘आप’ की हौसलाअफजाई कर सकते हैं. चुनाव के वक्त संभावनाओं की क्या शक्ल रहेगी कहा नहीं जा सकता. पर इतना जरूर है कि इस दौरान राजनीतिक घटनाक्रम तेजी से बदलेंगे और तब ‘आप’ की शक्ति का शायद ठीक-ठीक आकलन संभव हो सकेगा. लेकिन यदि हम ‘आप’ को केन्द्र में रखकर हालातों पर चर्चा करें तो यह पक्के तौर पर कहा जा सकता है आम आदमी पार्टी अपने सर्वोच्च को स्पर्श करने के बाद नीचे लौट रही है.

जिस प्रबल वेग से जनभावनाओं का ज्वार उठा था, वह कम से कम दिल्ली से बाहर ठंडा पड़ते दिखाई दे रहा है. ‘आप’ ने अपने सदस्यता अभियान में एक करोड़ का लक्ष्य निर्धारित किया था. इस लक्ष्य को प्राप्त किया जा सका अथवा नहीं, इसकी अभी अधिकृत घोषणा नहीं हुई है. लेकिन जिस तरह अभियान की गति रही, इससे साफ लगता है कि लक्ष्य से पार्टी दूर ही रहेगी.

दरअसल आम आदमी पार्टी के सामने फिलहाल एक ही उद्देश्य है जनता की अधिक से अधिक सहानुभूति एवं समर्थन बटोरना. उसे मालूम है लोहा गरम है इसलिए चोट करने का यही वक्त है. चूंकि आम आदमी पार्टी दिल्ली तक सीमित रहते हुए राष्ट्रीय पार्टी विशेषकर कांग्रेस एवं भाजपा के विकल्प के तौर पर अपनी धमक बनाने में सफल रही है लिहाजा उसे उम्मीद है लोकसभा चुनाव में वह तीसरी बड़ी ताकत के रूप में उभर सकती है बशर्ते जनभावनाओं के उबाल को किसी तरह कायम रखा जाए तथा उसे भुनाया जाए. दिल्ली में घटित राजनीतिक घटनाक्रम से इसका स्पष्ट आभास होता है.

‘आप’ ने अपने बुनियादी सिद्धांतों में इस बात का जिक्र किया था कि पार्टी में इमानदार, कर्तव्यनिष्ठ और सेवाभावी लोगों को स्थान मिलेगा किंतु देशभर में जिस तरह सदस्यता अभियान चलाया गया, उससे लगता है पार्टी ने संख्या बल बढ़ाने की चिंता में इस सिद्धांत से समझौता कर लिया है. दिल्ली को छोड़ दिया जाए तो पार्टी का संगठनात्मक ढांचा कहीं भी मजबूत नहीं है. प्राय: तदर्थ व्यवस्था से काम चलाया जा रहा है तथा प्रादेशिक एवं जिलेवार नेतृत्व के अभाव में दिशाहीनता की स्थिति है. ऐसे में पार्टी को लोकसभा चुनाव में यही उम्मीद है कि जनता ही उसे चुनाव जिताएगी संगठन नहीं. किंतु यह विश्वास उसे मुंह के बल भी गिरा सकता है.

यद्यपि आम आदमी पार्टी अभी शैशवावस्था में है लेकिन उसने अहिस्ते-अहिस्ते कदम आगे बढ़ाने के बजाए तेज रफ्तार से चलने का फैसला किया है. दरअसल उसे डर है कि समय जैसे-जैसे आगे बढ़ेगा, जनसमर्थन की गति धीमी पड़ते जाएगी. इसीलिए वह इस बात की कोशिश कर रही है कि किसी तरह सुुर्खियों में रहा जाए. अरविंद केजरीवाल सहित पार्टी के कुछ नेताओं के विवादास्पद बयान इस ओर इशारा करते हैं.

दरअसल ‘आप’ का भय निर्मूल नहीं है. देश का राजनीतिक इतिहास इस बात का गवाह है कि जनभावनाओं का जो ज्वार तेजी से ऊपर उठता है वह दुगुनी रफ्तार से नीचे गिरता है. दिल्ली में आप की सरकार ने एक महीने में अपने कार्यकाल में अद्भुत कुछ नहीं किया है हालांकि कामकाज के आकलन की दृष्टि से एक माह का समय कुछ भी नहीं होता. फिर भी एक तस्वीर तो बनती ही है और भविष्य की दृष्टि से ‘आप’ की तस्वीर कोई बहुत उत्साहवर्धक नहीं है. इसलिए यह कहना मुनासिब होगा कि एक वैकल्पिक राजनीति का जो स्वरूप ‘आप’ ने प्रारंभ में घड़ा था, वह धीरे-धीरे खुरच रहा है.

*लेखक हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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