ग्वालियर से जुड़ी अटल की यादें

ग्वालियर | एजेंसी: मध्यप्रदेश का ग्वालियर बाजपेयी के लिये राजनीति की पाठशाला रही है. अटल बिहारी बाजपेयी को भारत रत्न देने की घोषणा से ग्वालियर वासी गर्व का अनुभव कर रहें हैं. रसूख, ओहदा और रुतबा लोगों के जीने का अंदाज बदल देता है, मगर देश के प्रधानमंत्री रह चुके और भारत रत्न के लिए नामांकित किए गए अटल बिहारी वाजपेयी का अंदाज कभी नहीं बदला. यही कारण है कि उनकी चर्चा आते ही ग्वालियर के लोगों के दिल और दिमाग पर अटल जी की मुस्कुराती हुई तस्वीर और उनका अंदाज उभर आता है.

अटल जी के जीवन का एक बड़ा हिस्सा ग्वालियर में गुजरा है, उनकी राजनीतिक पाठशाला भी ग्वालियर रही है. जनसंघ के गठन की जमीन भी ग्वालियर में ही तैयार हुई थी.


वाजपेयी के करीबियों में एक नारायण शेजवलकर रहे हैं. अब वह तो नहीं हैं, लेकिन उनके बेटे और ग्वालियर नगर निगम के महापौर विवेक शेजवलकर बचपन में वाजपेयी के साथ गुजरे वक्त याद कर कहीं खो जाते हैं.

विवेक कहते हैं कि वाजपेयी उनके घर के सदस्य की तरह रहे हैं, वह कितने ही बड़े पद पर क्यों न रहे हों मगर उनके अंदाज में कोई बदलाव नहीं आया.

वह बताते हैं कि जब भी वाजपेयी उनके घर आते थे, सीढ़ियां चढ़ते हुए मां को आवाज लगाते हुए कहते थे- “भाभी मैं आया हूं खाना खाऊंगा. ऐसा अपनापन कम लोगों में ही देखने को मिलता है.”

शेजवलकर बताते हैं कि वाजपेयी ने कभी भी अपने को बड़ा नेता नहीं माना और न ही कभी इस बात का प्रदर्शन किया. उन्होंने आगे बताया कि एक बार वाजपेयी उनके घर की सीढ़ियों से उतर रहे थे, तभी एक कार्यकर्ता ने उनसे कहा कि मेरी शादी है उसमें आपको आना है. पहले तो वाजपेयी चुप रहे फिर बोले “भईया शादी में कुवारों का क्या काम है”.

वह बताते हैं कि वक्त के साथ वाजपेयी का राजनीतिक कद बढ़ा, मगर उनमें किसी तरह का बदलाव नहीं आया, हां सुरक्षा व अन्य कारणों से जरूर वह उस तरह मेल जोल नहीं रख पाए जैसा पहले था. यही कारण है कि कई बार उन्होंने अपने भाषणों में कहा कि वह अब अपनी मर्जी से घूम फिर नहीं सकते और न ही खा सकते हैं.

आपातकाल के बाद देश में जनता पार्टी की सरकार बनी और मोरारजी भाई देसाई प्रधानमंत्री बने. वाजपेयी विदेश मंत्री बनाए गए.

शेजवलकर बताते हैं कि विदेश मंत्री बनने के बाद वाजपेयी जब ग्वालियर आए तो उन्होंने सरकारी लाल बत्ती वाली गाड़ी की सवारी नहीं की, बल्कि उनकी फीयट कार से विश्राम गृह तक गए. यहां गार्ड ऑफ ऑनर के बाद पुलिस जवानों को अपने बच्चों के साथ दिन बिताने की छुट्टी दे दी.

वाजपेयी की भतीजी कांति मिश्रा बताती है कि उनके ग्वालियर आते ही घर का माहौल खुशनुमा हो जाता था, वह जब तक स्वस्थ रहे दीपावली, दशहरा और मेला के समय ग्वालियर आना नहीं भूलते थे. मेला देखने जाते थे तो उनकी भाभियां, भतीजे-भांजे और भाई अलग-अलग तांगों पर सवार होकर चलते थे और एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ मच जाती थी.

कांति के मुताबिक मेला में पहुंचते ही चाट खाना, झूला झूलने का मौका वह हाथ से नहीं जाने देते थे. उन्हें मंगोडे सबसे ज्यादा पसंद रहे हैं. यही कारण है कि वह वाजपेयी के जन्म दिन पर मंगोडे के साथ गाजर का हलुआ तथा टॉफी बांटती हैं.

कांति कहती है कि वाजपेयी को खाना और बोलना सबसे ज्यादा पसंद रहा है, मगर बीमारी के चलते वह ऐसा नहीं कर पा रहे हैं. इससे उनका परिवार बेहद दुखी रहता है. ईश्वर से यही कामना करते हैं कि वह स्वस्थ्य होकर अपने चुटीले वाक्यों से सब को गुदगुदाएं.

ग्वालियर के लोगों की वाजपेयी से जुड़ी अनेकों स्मृतियां हैं. उन्हें याद कर हर कोई प्रसन्न होता है और अपने को इस बात को लेकर गौरवान्वित महसूस करता है कि उनके आंगन का लाल तीन बार देश का प्रधानमंत्री बना और अब उसे देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न के लिए चुना गया है.

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