थाली में 4 रोटी के लिये जनाब

बादल सरोज
बुधवार को होने वाली कामगारों की हड़ताल की जिद है कि हर थाली में 4 रोटी और 2 मुट्ठी भात होना चाहिये. एक तरह से 2 सितम्बर कामगारों को आर्थिक लाभ दिलाने की कार्यवाही कम, देश के आर्थिक रास्ते पर बहस और संवाद करने की चीत्कार ज्यादा है. 2 सितम्बर को होने वाली आम हड़ताल में समूचे यूरोप और अमरीका सहित विकसित राष्ट्रों की कुल वयस्क आबादी की संख्या के बराबर भारतीय नागरिकों की भागीदारी की संभावना है. यह प्रतिरोध कार्यवाही इसके जरिये श्रमिक संघो द्वारा उठाई जा रही मांगों से कहीं आगे के प्रश्न उपस्थित करती है. यह प्रश्न ऐसे हैं जिन्हें अनुत्तरित छोड़ने की कीमत लम्हों की ऐसी खता होगी, जिसकी कीमत सदियों को चुकानी पड़ सकती है.

उदारीकरण के काई भरे रास्ते पर एक के बाद एक आई सरकारों की सरपट फिसलन पर ब्रेक लगाने की, भारतीय श्रम शक्ति की, यह 16वी कोशिश है. दिलचस्प बात यह है कि, पिछली हड़तालों की तरह इस बार भी, ट्रेडयूनियनों की मांग किसी बुनियादी या गुणात्मक सुधार की नहीं है. वे समाजवाद तो छोड़िये, एक जमाने में एजेंडे पर आयी प्रबंधन में भागीदारी और आवश्यकता पर आधारित न्यूनतम वेतन की मांग को भी नहीं उठा रहीं हैं.


24 वर्ष लंबी अमावस में, विकासशील दुनिया के अपने सहधर्मियों की तरह, भारतीय श्रम आंदोलन भी अपनी बचीखुची रोशनी की हिफाजत की लड़ाई में मुब्तिला है. कुछ नया हासिल करने से ज्यादा उनका जोर अब तक के अनुभवों की समग्र समीक्षा करके उनसे सबक लेने का अधिक है. जीडीपी, संस्थागत विदेशी निवेश और डॉलर अरबपतियों की खरपतवार को हरियाली माने बैठे कारपोरेट अभिभूत शासकों की तंद्रा तोड़कर उनकी दृष्टि में बहुमत अवाम की बढ़ती दुर्दशा को लाने की अधिक है.

1991 के बाद शब्दों ने ही अपने मायने नहीं खोये है, जनता के मत से चुनी जाने वाली सरकारों के सरोकार भी बदले हैं. वास्तविक और आभासीय यथार्थ में फर्क करने का सलीका खत्म हुआ है. राष्ट्र-राज्य की अवधारणा फीकी पड़ी है. प्रगति के पैमाने सर के बल खड़े कर दिए गये हैं, विकास का नजरिया पूरी तरह बदल गया है. यहां तक कि पूंजीवादी मानदंडों से भी सट्टा बाजार सहित चौतरफा लगे धक्कों और झटकों के बाद भी पुनर्विचार की कोई इच्छा दिखाई नहीं दे रही है.

किसी भी सभ्य समाज के सबसे अगुआ तबके के रूप में श्रमिक संगठन इस सब पर तार्किक और तथ्यपरक संवाद की मांग उठाते रहे हैं. उनका मानना है कि खम्भों की तरह नजर आती सर्चलाइटों की रोशनी भले कितनी गाढ़ी और चमकीली क्यों न हो उस पर प्रगति के महल खड़े नहीं किये जा सकते. निर्माण वे ही टिकाऊ होते हैं जिन्हें करोड़ों इंसानों की मजबूत ईंटों, बजरी और सीमेंट से गढ़ा गया होता है.

दुनिया का इतिहास गवाह है कि नौलखा मुनाफों के आभूषण से ललचा कर सटोरिया बाजार में बुलाई गयी अप्सराओं ने किसी का घर नहीं बसाया. घर लक्ष्मी से बसते हैं, और लक्ष्मी खेत, कारखाने, खदान में बहाये गए पसीने से फलती फूलती है. बाजार के हिसाब से भी देखें तो वह समयसिद्द 44 श्रम कानूनों को सिकोड़ कर 4 संहिताओं में जकड़ देने से नहीं फैलेगा, हर थाली में 4 रोटी और 2 मुट्ठी भात बढ़ा देने से फलेगा फूलेगा.

शासक अगर मार्क्स का अनुसरण करने से डरते हैं तो पूंजीवादी शास्त्रीय अर्थशास्त्र के जनक कीन्स का ही कर लें जिसने कहा था कि गड्डा खोदने और बाद में उसे मूँद देने का 100 रूपये का अनुत्पादक रोजगार भी देना पड़े तो दिया जाना चाहिए, क्योंकि इस 100 रूपये से बाजार में 300 रुपये की गतिविधि होती है. मगर इसका ठीक उलटा हो रहा है. 1980 के दशक में कुल मूल्य संवर्धन (वैल्यू एडीशन) का 30% मजदूरी भुगतान और 35% मुनाफे में जाता था. 2014 में यह अनुपात गड़बड़ाते गड़बड़ाते क्रमशः 10 और 65% हो गया है. जाहिर है कि इसके चलते बाजार संकुचित हुआ है.

श्रमिक संगठन इस कैंसरस ग्रोथ के जिम्मेदार अंतर्राष्ट्रीय पूँजी प्रदत्त नुस्खे को बदलने की गुहार कर रहे हैं. वे संविधानेतर इंडिया इंक के नहीं संविधान में वर्णित इंडिया दैट इज भारत के विकास की तजबीज सुझा रहे है.

जब राष्ट्र और उसके आधार को प्रभावित करने वाले प्रश्नो पर खुला और ईमानदार संवाद करने की गुंजाइशें खत्म हो जाती हैं तब कशमकश और टकराव के रास्ते खुलते हैं. 2 सितम्बर की आम हड़ताल से हजारों करोड़ रुपयों के नुक्सान का शोर मचाने वालों को यह भी बताना चाहिए कि इसका असली कारण, श्रमिक संगठनों की ज़िद नहीं, बल्कि लाखों करोड़ रुपयों का फायदा पहुंचाने वाले वैकल्पिक सुझावों के प्रति उनकी ढीठ खामोशी है.

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