उदारवादी बैंक

भारत में रेल सेवाओं को प्रारंभ तथा विस्तार देने का कार्य ब्रितानी शासन ने किया था. उनका उद्देश्य हरगिज भी भारतीयों को सैर करवाना नही था. वे तो ब्रितानी प्रशासन की पहुंच को बढ़ाना चहते थे. ताकि उनके व्यापार का विस्तार हो सके. सबसे पहले जेम्स वॉट ने अठारहवीं शताब्दी में भाप की शक्ति की खोज की तथा उन्नीसवीं शताब्दी में जॉर्ज स्टीफनसन् ने प्रथम रेल इंजन का अविष्कार किया. इन दोनों को भी मालूम नही था कि वे प्राक पूंजीवाद को गति देने का कार्य कर रहे हैं.

ठीक उसी तरह बैंको का जन्म तथा विकास लेन देन एवं धन जमा रखने के लिये हुआ. अपने विकासक्रम में बैंको ने भी अलग-अलग समय, अलग-अलग भूमिका का निबाह किया. वर्तमान में बैंक नवउदारवादी एजेंडे को आगे बढ़ाने के तौर पर उपयोग में लाये जा रहे हैं. तभी तो तमाम तरह के राजनैतिक अंतर्विरोधों के बावज़ूद भी हमारे वित्त मंत्री 29 मार्च को लखनऊ के ताज़ होटल में 300 नये बैंक शाखाओं का उद्घाटन करने पहुंच गये. इतना ही नही वरन् यह भी घोषणा की कि मार्च 2014 तक और 2700 बैंक की शाखाएं उत्तर प्रदेश में खोली जायेंगी.


जाहिर है, इन बैंको के माध्यम से सरकारी योजनाओं को अमली जामा पहनाया जायेगा. किन सरकारी योजनाओं के लिये यह हड़बड़ी की जा रही है, इसे समझना जरुरी है. ये योजनाए हैं संपूर्ण प्रशासन को दरकिनार कर लोगों तक सीधे भत्ते आदि पहुंचाना. एक तरफ तो केन्द्र सरकार सामाजिक खर्चो में कटौती करती जा रही है. दूसरी तरफ उन्हें बरगलाने के लिये सीधे पैसे को उनके खाते में जमा कराने की योजनाओं पर बल दिया जा रहा है. हजारों रुपये की महंगाई बढ़ाकर कुछ सौ रुपये खाते में जमा करने की योजना केन्द्र सरकार ने बनायी है.

अब यदि समाजवादी नेताजी के पुत्र मनमोहन-मोंटेक के नवउदारवादी एजेंडे को आगे बढ़ाने की तत्परता दिखाते हैं तो श्रीमान चिदंबरम जी को क्या तकलीफ है. वे तो हर विरोधियों में उदारवाद के समर्थको को एकजुट करने का परचम उठाये हुए हैं. नयी पीढ़ी के अखिलेश यादव या तो यह नही समझ पा रहें हैं या वे स्वयं इसी नीति के पक्षधर हैं. उदारवाद को लागू करवाने में आज बैंको की बड़ी ही महत्वपूर्ण भूमिका है, जिसे समझने की आवश्यकता है.

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