इन जहरीली दवाओं का क्या होगा

रायपुर | जे के कर: छत्तीसगढ़ में अभी भी ऐसी दवायें बिक रही हैं, जो जहर का काम करती हैं. केन्द्र सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने भले तीन दवाओं को देश में प्रतिबंधित कर दिया है. ये हैं- एनालजीन, पायोग्लीटाजोन एवं डेनक्सीड. लेकिन इससे यह मत समझ लीजियेगा कि तमाम विनाशकारी दवाओं से आपको मुक्ति मिल गई है. अभी भी इनसे ज्यादा कई खतरनाक दवाएं छत्तीसगढ़ के बाजार में धड़ल्ले से बिक रही हैं. लेकिन संकट ये है कि इन दवाओं को लेकर कहीं कोई बात नहीं हो रही है.

आज भी छत्तीसगढ़ के अधिकांश दवा दुकानों में एक खाकी गोली बिना किसी चिकित्सक की पर्ची के मिल जायेगी. वैसे शायद ही कोई चिकित्सक हो, जो इसका नुस्खा लिखकर अपने मरीज को देता है. यह दवा ओवर द कांउटर यानी बिना पर्ची के ही बिकती है. वास्तव में यह खाकी गोली आंव की एक पुरानी दवा है, जो दुनिया में और कहीं नहीं मिलेगी. यह बाजार में एन्ट्रोक्यूनाल टैबलेट के नाम से उपलब्ध है. इसमें क्यूनोडोक्लोर होता है.


यह वही क्यूनोडोक्लोर है, जिसके सेवन से जापान में 1955 से लेकर 1970 के बीच करीब एक लाख लोग सब एक्यूट माइलो आप्टिक न्यूरोपैथी (समोन सिंड्रोम ) के शिकार हो गये थे. इस बीमारी में क्यूनोडोक्लोर के दुष्परिणाम स्वरूप स्नायु रोग हो जाता है, जिससे अंधापन हो जाता है. कुल मिलाकर लोग जापान में इसके कारण अंधे हुए थे. उस त्रासदी के बाद जापान तथा दुनिया के अधिकतम देशों ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया है. यहां तक कि बंग्लादेश में भी यह प्रतिबंधित है.

मामला यहां तक पहुंच गया कि टोक्यो की जिला अदालत ने फैसला सुनाया कि क्यूनोडोक्लोर के कारण जापान में समोन सिंड्रोम हुआ है. जिसके कारण जापान में इस दवा की विक्रेता महाकाय विदेशी दवा कंपनी सीबा-गायगी को 3 अगस्त 1978 को अदालत में आकर सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी पड़ी थी. सीबा-गायगी ने स्वीकार किया कि उसके द्वारा उत्पादित तथा बेची जाने वाली दवा के कारण ही लोग अंधत्व का शिकार हुए हैं, जिसका उसे खेद है.

इतने हो-हल्ले के बावजूद आज की तारीख में यह दवा बलरामपुर के रामानुजगंज से लेकर बस्तर के कोंटा तक में आसानी से किसी भी दवा दुकान में मिल जाती है. दोष दवा दुकानदार का नहीं है, क्योंकि भारत सरकार के ड्रग कंट्रोलर जनरल ने इसे बेचने की अनुमति दे रखी है. चिकित्सक भी इस दवा को लेने की सलाह नहीं देते हैं, फिर भी महीने में हजारों-लाखों गोलियाँ बिक जाती हैं. कारण यह है कि जब तक भारत में जापान के समान कोई त्रासदी न हो जाये, तब तक सरकार के कानों में जूँ नही रेंगने वाली है. वैसे भारत सरकार जापान में हुए परमाणु विस्फोट की विभीषिका से तो सतर्क है लेकिन समोन सिंड्रोम को लेकर नही.

एक और खतरनाक दवा छत्तीसगढ़ के बाजारों में उपलब्ध है, वह है निमेसुलाइड टैबलेट. जिसके सबसे ज्यादा चलने वाले ब्रांड का नाम नाइस है. यह बुखार तथा दर्द की दवा है. हालांकि 10 मार्च 2011 में बच्चों के लिये इस दवा को प्रतिबंधित कर दिया गया था, लेकिन बड़ों के लिये इसका टैबलेट सरकार की अनुमति के कारण आज भी बिकता है. सवाल यह उठता है कि जो दवा बच्चों के लिये हानिकारक है, क्या वह बड़ों को दी जा सकती है. चिकित्सा विज्ञान के अनुसार कुछ दवाएं बच्चों के लिये प्रतिबंधित होती हैं लेकिन वह दवा बड़ों को दी जा सकती है. परन्तु निमेसुलाइड के क्षेत्र में यह नियम लागू नही होता है क्योंकि यह दवा दोनों के लिये ही समान रुप से हानिकारक है.

इस दवा को अमरीका की थ्रीएम नामक कंपनी ने बनाया था. चूंकि इस दवा के सेवन से यकृत खराब होने की आशंका रहती है, इस कारण कभी भी स्वयं अमरीका में उसे बेचने की अनुमति नही दी गई. करीब 160 देशों में यह प्रतिबंधित है. विकसित देश ब्रिटेन, कनाडा, आस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैंड में यह प्रतिबंधित है. और तो और भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान तथा बांग्लादेश तक में इसे बेचने की मनाही है. हाल ही में श्रीलंका ने छठवीं बार इस दवा को बेचने वाली कंपनियों का आवेदन ठुकरा दिया है.

इन दोनों दवाओं का सुरक्षित विकल्प भारत में उपलब्ध है. इस कारण इन दवाओं को भी प्रतिबंधित किया जाना चाहिये. जैसे निमेसुलाइड का विकल्प पैरासीटामॉल है. क्यूनोडोक्लोर के तो कई विकल्प हैं जैसे टिनिडाजोल, मेट्रोनिडाजोल, सेक्निडाजोल तथा आरनिडाजोल आदि. जब सुरक्षित विकल्प मौजूद हों तथा जो महंगी भी न हों तो स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा इन दोनों दवाओं को भारत में बेचने की अनुमति अब तक क्यों दी जा रही है. शायद सरकार का स्वास्थ्य मंत्रालय कियी त्रासदी का ही इंतजार कर रहा है और तब तक तो हमें इन दवाओं का उपयोग करने वालों के लिये दुआ करनी चाहिये.

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