बत्तीसगढ़ का चुगली आयोग

कथा बत्तीसगढ़
अजयभान सिंह
बत्तीसगढ़ के राजा रम्यकमन को कुटुम्बियों-मित्रों एवं परिचारकों सहित चैन की बंसी बजाते हुए एक दशक से ज्यादा समय हो चुका था. राजा के आंख-कान के रूप में प्रसिद्ध दरबारी सिंगद बंधु सत्ता के सूत्रधार थे. न राजा को प्रजा की सुध थी और न प्रजा को राजा से सरोकार.

एक दिन अचानक राजा को जाने क्या सूझी. भेदियों और दरबार की जूतियां साफ करने वाले खबरधीशों को आवाम की सूरते हाल पेश करने को कहा. चूंकि राजा को अच्छी तरह से पता था कि सत्ता की मलाई का भरपूर ईंधन ढकोसे बगैर राज्य का कोई कारकून हिलने डुलने में भी असमर्थ था. इसलिए राज-चाकरी विधा के ख्यातिलब्ध विशेषज्ञ एवं महापद्म से सम्मानित परतंत्र प्रसाद के नेतृत्व में एक भारी भरकम चुगली आयोग गठित किया गया.


90 सदस्यीय विशेषज्ञ दल के सहायकों, अतिरिक्त सहायकों, निज परिचारकों और रथ हांकने वाले सारथियों सहित 500 से ज्यादा राजकर्मी आयोग में तैनात कर इसके लिए एक हजार करोड़ मुद्राओं का प्रबंध किया गया.

सूबे के 90 परगनों और मंडलों के घने वन-प्रांतर में बसे नागरिकों के आंनद और वैभव को देखकर रम्यकमन के भेदियों की प्रसन्नता का कोई ठिकाना न रहा.

महारथी परतंत्र प्रसाद ने भारी भरकम लवाजमे की तीन साल के कठोर परिश्रम के बाद भेद आयोग की रिपोर्ट राजा के चरणों में रखी. एक हजार करोड़ के बजटीय आवंटन के विरुद्ध भेदियों के दल ने पांच हजार करोड़ मुद्राएं उड़ा दीं. किंतु रिपोर्ट ऐसी नायाब कि राजा आनंद अतिरेक में बल्लियों उछलने लगे.

आयोग ने लिखा कि “राजन, आपके राज्य में समस्त नर नारी सुख सागर में गोते लगा रहे हैं. जितने गृहस्थ राज्य में हैं ही नहीं, उतने प्रजाजनों को परम चतुर और कर्मठ राजकर्मी प्रतिमास चावल-चने-चबैने-ईंधन का बंदोबस्त कर रहे हैं. पूरे राज्य के गोदाम अन्न के भंडारों से ठसाठस भरे हैं, कस्बों और नगरों में स्थानाभाव में लाखों मन अनाज सड़ रहा है. जिसे हटाने का पुण्य कार्य चावल एवं मदिरा के कारखाने चलाने वाले परोपकारी धनिकों ने अपने हाथ में लिया है. राज्य के एक दरबारी ने मदिरा बेचने वाले बड़े-बड़े बकल्लालों पर प्रजा को आसुरी मदिरा पिलाने का आरोप लगाते हुए उन्हें देशनिकाला दे दिया है. अब राजसवेक स्वर्ग के वैद्य सोवर्ना कुमारों की बनाई एक खास किस्म की सुरा नागरिकों को पिला रहे हैं. इस मदिरा के प्रयोग से प्रजा अहर्निश आनंदनिमग्न होकर राजमार्गों, मल-मूत्र प्रवाहिकाओं के किनारे गहन साधना में लीन रहने लगी है. सुरासक्त प्रजा के आत्मिक और आध्यात्मिक विकास की प्रशस्ति अंग्रेजी भाषा में नित्य प्रकाशित वार्ता पुराणों में भी हो रही है.

भेदियों ने आगे लिखा कि “हे राजन राज्य में वास्तु एवं विनिर्माण के क्षे़त्र में क्रंति आ गई है. राजकोष से सैकड़ों झारों करोड़ रुपये व्यय कर बनने वाले मार्गं, सेतु, आश्रम और महल निर्माण पूर्ण होने के पूर्व ही धराशायी हो जाते हैं. इन विनिर्माणों को राजकोष से उतना ही धन खर्च कर पुनः बनाने से राज्य में सभी स्तरों पर रोजगार के अवसर सृजित हो रहे हैं. उर्वरा भूमि से अन्न उपजाने वाले कृषक समृद्धि और सुखों से उबकर अपनी भूमि अनैतिक धनराशि के स्वामी नगरसेठों और राजसेवकों को सौंपकर आराम कर रहे हैं. शिवनदी और महानाथ जैसी अनेक पवित्र नदियां पवित्र उद्योग के लिए धन कुबेरों के सुपुर्द कर दी गई हैं. सैकड़ों सरोवरों को पाटकर राज्य के सभासदों और उनके ईष्टमित्रों ने विशालकाय अट्टालिकाएं बना ली हैं. प्रजा में कृषि एवं पेयजल के लिए ’एडमिसिबल लिमिट’ का हाहाकार मचा है. लेकिन घबराने की बात नहीं है.

दंडक वन की गाथा में आयोग ने लिखा कि “हे भूपति, महर्षि माओ के चरमपंथी साधकों ने ‘वस्त्रार’ नाम से प्रसिद्ध इस वनक्षेत्र को अपने कठोर अनुशासन के बल पर पवित्र कर दिया है. राजकर्मी अब वहां नही जाते, शबर प्रजा उनके चंगुल में है. अच्छा हुआ बला टली. राज्य को अब उस प्रांत को भूलकर निरंतर अपने सुख-शोधन और दोहन का चिंतन करना चाहिए.

अपनी-सुख-वंशी-वादन की अवस्था में इतने सुन्दर राज्य प्रबंधन से गदगद रम्यकमन ने खुशामदखोर चारणों और खबरधीशों के अलावा अन्न एवं प्रजा पूर्ति, राजकीय निर्माण, सुरादि उन्मादक द्रव्य, नदी सरोवर संरक्षण, कृषि, प्रजा सुरक्षा, एवं वन प्रांतर विभागों के प्रमुख राजसेवकों को सह-राजस्वामी के रूप में पदोन्नत कर पांच-पांच करोड़ स्वर्ण मुद्राएं एवं राजप्रशस्ति प्रदान किए जाने का आदेश दिया. नेति, नेति. जयति जय बत्तीसगढ़ गाथा.

* यह एक काल्पनिक कथा है.

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