पार्टी में मनमानी चल रही है

नई दिल्ली | बीबीसी: संघ और भाजपा के प्रमुख रणनीतिकार रहे केएन गोविंगाचार्य ने टिप्पणी की है कि पार्टी में मनमानी चल रही है. उनका कहना है कि लीडर और कैडर के बीच संवाद खत्म हो गया है. उनका मानना है कि सरकार संख्यबल से नहीं साख से चलती है. ललित मोदी को ट्रैवल डॉक्यूमेंट दिलाने में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के मदद देने की बात सामने आने के बाद भाजपा सांसद कीर्ति आज़ाद ने इस विवाद के लिए ‘आस्तीन के सांप’ को ज़िम्मेदार ठहराया था. इसके बाद बिहार में भाजपा के नेता शत्रुघ्न सिन्हा ने आज़ाद का समर्थन किया था. इन बयानों से भाजपा में चल रहा टकराव सतह पर आ गया है.

किसी ज़माने में संघ और भाजपा के प्रमुख रणनीतिकार रहे केएन गोविंदाचार्य ने मौजूदा विवाद पर कहा है कि भाजपा में मनमानी चल रही है. बीबीसी से एक ख़ास बातचीत में उन्होंने कहा कि इस तरह की टिप्पणियां इस बात का संकेत है कि पार्टी नेतृत्व और कैडर के बीच संवाद और विश्वास का अभाव है. पार्टी नेतृत्व में भी आपस में संवाद और विश्वास के अभाव के कारण ही कुछ लोग अपनी भावनाएं गैरवाज़िब तरीक़े से व्यक्त कर रहे हैं.


पढ़ें बातचीत के ख़ास अंश
नेतृत्व को चाहिए वो संवाद बढ़ाने पर और गंभीरता से काम करे, नहीं तो ये समस्याएं संभाले नहीं संभलेंगी.

केवल संख्याबल से सरकार नहीं चलती, सरकार साख और इक़बाल से चलती है. पार्टी संगठन का काम है कि इन मतभेदों का सुलझाए, लेकिन संगठन तो कहीं दिखाई ही नहीं देता. इससे ये बात प्रमाणित होती है कि संगठन अनुशासन, संवाद और विश्वास की बजाय मनमानी से चल रहा है.

भारत के इतिहास में पहली बार ऐसा हो रहा है कि कोई गैर कांग्रेसी दल अपने बूते पर सत्ता में आया है. इसलिए लोगों की आकांक्षाएं बहुत हैं लेकिन सरकार की नीतियों और प्राथमिकताओं का क्रम गड़बड़ा गया है और सरकार ने इसमें ग़लतियां की हैं.

जहां तक संघ की बात है वो सरकार को अभी मौका दे रहा है. लेकिन मौका देते-देते कहीं ऐसा न हो जाए कि सुधरने की स्थिति ही न बचे. नीतियां स्मार्ट सिटी और बुलेट ट्रेन नहीं हो सकतीं प्राथमिकताओं के तौर पर.

‘भारत गुजरात नहीं’
इस सरकार ने पंचायती राज का सारा बजट काट कर ख़त्म कर दिया. महिला बाल विकास का बजट ख़त्म कर दिया. कोऑपरेटिव फ़ेडरलिज़्म के नाम पर सरकार अपनी ज़िम्मेदारी से भाग गई.

प्राथमिकता तय करने का ये कोई तरीक़ा तो नहीं होता. प्राथमिकता इससे नहीं तय होगी कि कितना निवेश आया या जीडीपी में कितना विकास हुआ, बल्कि अंतिम आदमी को क्या मिला, इससे तय होगी. इसमें सरकार दिग्भ्रमित है. बिना ज़मीनी हक़ीकत को जाने भारत को अमरीका और ब्राज़ील बनाना चाहते हैं.

दिल्ली और आसपास ही सिर्फ भारत नहीं है और न ही भारत गुजरात है. भारत विशष्ट जटिलताओं और विशेष ताक़त से भरा समाज और सभ्यता है. कई सहयोगी संगठन थे जिन्होंने इन्हें सत्ता तक लाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाया था.

एकतरफ़ा संवाद
अब स्वदेशी जागरण मंच वाले कह रहे हैं कि रिटेल में एफ़डीआई का क्या हुआ. मज़दूर संघ वाले कहते हैं कि श्रम सुधारों का क्या हुआ.

किसान संघ वाले कह रहे हैं कि ऐसी कौन सी आपातकालीन स्थिति आ गई थी जमीन अधिग्रहण क़ानून बनाने की.

ये सभी असंतुष्ट और नाराज़ हैं. जब तक इस विविधता का सम्मान, आपस में संवाद और निर्णय की प्रक्रिया में इनकी भागीदारी नहीं सुनिश्चित होगी, तब तक ये कामचलाऊ तरीक़े से काम नहीं चलेगा.

इस पार्टी के सांसद और अन्य लोग जब मिलते हैं तो बताते हैं कि उनका ही संवाद नहीं हो पाता है और उनकी ही नहीं सुनी जाती. उनको कहीं बुलाया जाता है तो उन्हें ही सुनाया जाता है और वो भी सुनकर लौट आते हैं. सब एकतरफ़ा ही चलता है.

जुमलेबाजी
निष्ठा के कई विषय जुमलेबाजी के नहीं होते. जनता आपकी निष्ठा से आपको आंकती है.

काला धन वापस लाने पर सबसे खातों में पैसा आने के वादे को बाद में चुनावी जुमला क़रार दे दिया गया.

इसके कारण लोगों को संदेह होने लगता है कि क्या राम जन्मभूमि का मामला आस्था का नहीं रहा, कहीं यह भी जुमला तो नहीं.

जितनी तेज़ी भूमि अधिग्रहण क़ानून में दिखाई गई उतनी तेज़ी राम जन्मभूमि की समस्या को हल करने में नहीं की गई.

(केएन गोविंदाचार्य से बीबीसी संवाददाता समीरात्मज मिश्र से बातचीत के आधार पर)

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