शहीद ने कहा था

कनक तिवारी
यह इतिहास का सच है कि भगतसिंह असाधारण बौद्धिक भी थे. उन्होंने गांधी, नेहरू, लाला लाजपत राय, सुभाष बोस और गणेश शंकर विद्यार्थी आदि को निकट से जानने की कोशिश की थी. गांधी और उनके साथी भगतसिंह और साथियों को हिंसक रणनीति का समर्थक मानते थे, जबकि यह सच नहीं था.

भगतसिंह को गांधी का पूरी तौर पर अहिंसा पर अवलंबित रहना और उसे एक अनिवार्य सिद्धांत या सामाजिक आदत के रूप में आत्मसात करने को कहना रास नहीं आया. भगतसिंह ने मोटे तौर पर गांधी और लाला लाजपत राय की कड़ी आलोचना की. सुभाषचंद्र बोस के प्रति आदर के बावजूद भगतसिंह उन्हें एक भावुक युवक नेता की तरह ही तरजीह देते थे. जवाहरलाल नेहरू अकेले नेता थे जिन पर इस अग्निमय नायक ने पूरी तौर पर भरोसा किया था.


नेहरू ने भी लगातार भगतसिंह की क्रांति का गांधी के विरोध के बावजूद समर्थन किया. नेहरू और सुभाष बोस के अलावा कई और प्रमुख कांग्रेसी क्रांतिकारियों के साथ हमदर्दी रखते हुए उन्हें आर्थिक सहायता भी दिया करते थे. भगतसिंह ने जुलाई 1928 में ‘किरती‘ में नेहरू को लेकर अपने तार्किक विचार रखे हैं. भगतसिंह ने कहा था कि जवाहरलाल नेहरू अकेले नेता हैं जो राष्ट्रीयता के संकीर्ण दायरों से निकलकर खुले मैदान में आ गए हैं.

पंजाब के नौजवानों का आह्वान करते हुए भगतसिंह ने लिखा था, ‘‘इस समय पंजाब को मानसिक भोजन की सख्त जरूरत है और यह पण्डित जवाहरलाल नेहरू से ही मिल सकता है. इसका अर्थ यह नहीं है कि उनके अन्धे पैरोकार बन जाना चाहिए. लेकिन जहां तक विचारों का सम्बन्ध है, वहां तक इस समय पंजाबी नौजवानों को उनके साथ लगना चाहिए, ताकि वे इन्कलाब के वास्तविक अर्थ, हिन्दुस्तान में इन्कलाब की आवश्यकता, दुनिया में इन्कलाब का स्थान क्या है, आदि के बारे में जान सकें.‘‘

‘क्रांतिकारी कार्यक्रम का मसौदा‘ में भगतसिंह ने यह प्रमाण पत्र दिया था, ‘‘हमारे नेता किसानों के आगे झुकने की जगह अंगरेज़ों के आगे घुटने टेकना पसंद करते हैं. पंडित जवाहरलाल को छोड़ दें तो क्या आप किसी भी नेता का नाम ले सकते हैं जिसने मज़दूरों या किसानों को संगठित करने की कोशिश की हो. नहीं, वे खतरा मोल नहीं लेंगे. यही तो उनमें कमी हैै. इसीलिए मैं कहता हूं वे संपूर्ण आज़ादी नहीं चाहते.‘‘

संघ परिवार और उसके शो ब्वॉय नरेन्द्र मोदी सरदार पटेल के कंधे का इस्तेमाल करते हुए नेहरू के चरित्र पर अवांछित हमले कर रहे हैं. उनकी राय में जवाहरलाल ने लोकतंत्र, समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता जैसे सिद्धांतों को भारतीय संविधान में गूंथकर कोई अपराध कर दिया है. भगतसिंह ने उर्वर, उद्दाम तथा अनगढ़ भाषा में नेहरू का वास्तविक तथा भविष्यमूलक मूल्यांकन किया था. देश में किसी विचारधारा की यह दृष्टि और नैतिक साहस नहीं है कि वह कह सके कि उसे भगतसिंह के नेहरू-मूल्यांकन से कोई इत्तफाक नहीं है.
* उसने कहा है-16

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