गरीबी बनाये रखने का घोषणा पत्र

रायपुर | समाचार डेस्क: छत्तीसगढ़ भाजपा का चुनावी घोषणा पत्र प्रदेश में गरीबी बनाये रखने का ऐलान करता नजर आ रहा है. राज्य में गरीबी कम करने के बजाये गरीबों को 2 रुपये के स्थान पर 1 रुपये की दर से 35 किलो चावल देने की घोषणा की गई है. वर्ष 1993-1994 में गॉवों में 50 फीसदी लोग गरीब थे जो 2011-12 में बढ़कर 65 प्रतिशत का हो गया है. ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा जारी 2012-13 के वार्षिक रिपोर्ट से तथ्य उजागार हुआ है.

यदि भाजपा गरीबी की संख्या को कम करना चाहती है तो फिर क्यों इसके उलट बीपीएल परिवारों की संख्या में इजाफा हो रहा है. छत्तीसगढ़ में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली आबादी का प्रतिशत बढ़ता ही जा रहा है. आज की तारीख में छत्तीसगढ़ की 40.1 प्रतिशत जनसंख्या रेखा के नीचे वास करती है. यह तब है, जब छत्तीसगढ़ वन संपदा तथा प्राकृतिक संशाधनो से भरा पड़ा है.


गरीबी को कम करने के लिये रोजगार मुहैया करवाने की जरूरत है. वास्तव में यदि गांवों में लोगों को रोजगार देना है तो इसमें कुछ हद तक मनरेगा मदद कर सकता है. मनरेगा के आकड़े बयां करते हैं कि छत्तीसगढ़ में 100 दिनों के बजाये केवल 31 दिनों का रोजगार ही साल भर में मिल पाता है. उम्मीद की जा रही थी कि मनरेगा में 100 दिनों का काम एक वर्ष में मिल सके इसके लिये ठोस योजना इस घोषणा पत्र के माध्यम से की जायेगी. जिसका की पूर्णतः अभाव है.

ग्रामीण विकास मंत्रालय के आकड़े बताते हैं कि वर्ष 2012-13 में छत्तीसगढ़ के 22लाख 03हजार 3सौ 44 परिवारों ने मनरेगा के तहत रोजगार मांगा था. जिसमें से 21लाख 97हजार 8सौ 57 परिवारों को औसतन 31 दिनों का रोजगार मिल पाया. 100 दिनों का रोजगार तो केवल 44 हजार 9सौ 33 परिवारों को ही मिल पाया है जो कि 2.04 फीसदी है. जब छत्तीसगढ़ में रोजगार मुहैया करवाने वाली योजनाओं को ठीक से लागू ही नही किया गया है तो गरीबी कैसे दूर होगी.

छत्तीसगढ़ में 2001 की जनगणना में जहां कुल कामकाजी लोगों में किसानों की जनसंख्या 44.54 प्रतिशत थी, वह 2011 में घट कर 32.88 प्रतिशत रह गई है. इसके उलट खेतिहर मजदूरों की जनसंख्या आश्चचर्यजनक रुप से बढ़ गई है. 2001 में कुल कार्मिकों में 31.94 प्रतिशत जनसंख्या खेतिहर मजदूरों की थी. 2011 में इसमें चिंताजनक बढ़ोत्तरी हुई है और यह 41.80 प्रतिशत तक जा पहुंची है. किसानों को खेतिहर मजदूर में तब्दील होने से रोकने का उपाय कौन करेगा. छत्तीसगढ़ के सबसे बड़ी चुनौती यही है कि किसानों को खेतिहर मजदूर बनने से रोका जाये.

भाजपा चूंकि वर्तमान में शासन में है इसलिये यह उम्मीद करना गलत नही होगा कि उसके पास अगले 5 वर्षो में छत्तीसगढ़ के वास्तविक विकास के लिये क्या किया जाना चाहिये उसके लिये ठोस योजना हो. जब गांव के किसानों खेतिहर मजदूरों में तब्दील होने से नही रोका जा सका है तो उनके जीवन स्तर को ऊपर उठाने के लिये न्यूनतम वेतन की घोषणा तो अवश्य करनी चाहिये थी. घोषणा के अनुरूप केवल उनका शत प्रतिशत बीमा करवा देना गरीबी को दूर करने के लिये कोई मदद नही करता सकता है.

किसानों को ऋणमुक्त कर्ज के स्थान पर भूमि सुधार किये जाने की जरूरत है जिससे फालतू जमीन किसानों में बांट दी जाती है. इससे किसानी का रकबा भी बढ़ेगा तथा पैदावार, जो किसानों को गरीबी की रेखा से ऊपर आने में मदद करेगा.

छात्रो को लैपटाप तथा टैबलेट जैसे उच्च संचार के साधन मुफ्त में दिये जाने से जरूरी है कि उनके लिये रोजगार के अवसर उपलब्ध करवाये जाये. घोषणा पत्र में छत्तीसगढ़ में रोजगार के अवसर बढ़ाने के बजाये, उद्योगो तथा निजी नौकरी में आरक्षण देने की बात कही गई है. लाख टके का सवाल यह है कि जब रोजगार के अवसर ही न बढ़ाये जाये तब उसमें आरक्षण किस काम का है.

इतना जरूर है कि सामाजिक सुरक्षा में बढोतरी करने का वादा यह घोषणा पत्र करता है. जिसके तहत स्मार्ट कार्ड में पचास हज़ार रूपये तक का इलाज एवं निराश्रित पेंशन दुगना किया जाना है. पहले स्मार्ट कार्ड में 30 हजार रुपये मिलते थे जिसे बढ़ाने की बात हो रही है लेकिन छत्तीसगढ़ की जनता को गर्भाशय कांड जरूर याद होगा जिसमें सरकारी पैसे पर महिलाओं के गर्भाशय अनावश्यक रूप से आपरेस कर निकाल दिये गये थे. ऐसी घटना की पुनरावृत्ति फिर न हो इस पर घोषणा पत्र खामोश है.

कुल मिलाकर भाजपा छत्तीसगढ़ चुनाव के लिये जारी घोषणा पत्र लोकलुभावनें घोषणाओं से भरा है जिससे वास्तव में छत्तीसगढ़ का भला होने नही जा रहा है.

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