मांझी के पीछे कौन?

पटना | एजेंसी: अपने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ दहाड़ते बिहार के मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के तेवरों से स्पष्ट है कि उनके पीछे कोई बड़ी राजनीतिक शक्ति काम कर रही है. अन्यथा बिहार में नीतीश कुमार का उनके द्वारा दी सत्तासीन किये गये ‘भरत’ का बागी होना संभव नहीं है. बिहार में सत्तारूढ़ जनता दल युनाइटेड आजकल डोलमाल में फंसा हुआ है. आपात स्थिति में नीतीश कुमार ने जिस जीतन राम मांझी को सरकार रूपी नैया की पतवार सौंपी थी, वही आज बगावती सुर अलापकर नैया मझधार में डुबोने पर अमादा हैं.

लोकसभा चुनाव में पार्टी की धूलधूसरित प्रदर्शन की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 19 मई, 2014 को अपनी कार से जीतन राम मांझी के साथ राजभवन पहुंचे थे. सरकार की कमान थामने के लायक उन्होंने जीतन को ही समझा था. वही मांझी ने अब नीतीश और पार्टी नेतृत्व के खिलाफ बगी तेवर अपनाए हुए हैं.


मांझी ने 20 मई, 2014 को 17 अन्य मंत्रियों के साथ मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी. नीतीश ने कहा था कि मांझी सरकार चलाएंगे और वह संगठन का काम देखेंगे. सवाल यह है कि इन आठ महीनों में ऐसा क्या हो गया?

ऐसा नहीं कि मांझी को सत्ता की बागडोर सौंपने के बाद नीतीश की आलोचना नहीं हुई थी. पक्ष से लेकर विपक्ष तक के नेता नीतीश पर कभी रिमोट से सरकार चलाने, कभी नरेंद्र मोदी का बतौर प्रधानमंत्री सामना करने से बचने तो कभी मांझी को स्वतंत्र रूप से काम नहीं करने देने का आरोप चस्पां करते रहे हैं.

राजनीतिक गलियारों में चल रही चर्चाओं के अनुसार, मांझी की ‘हिम्मत’ के पीछे भाजपा की ताकत काम कर रही है. बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी शुक्रवार को सारे विकल्प खुले रहने के बयान देकर इस बात के स्पष्ट संकेत दे चुके हैं कि भाजपा मांझी के पीछे खड़ी है.

उल्लेखनीय है कि कुछ दिनों पूर्व केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने अपने पटना दौरे के क्रम में मांझी से मुलाकात की थी और उन्हें ‘गरीबों का मसीहा’ बताया था.

राजनीति के जानकार कहते हैं कि इतने दिनों में मांझी की महत्वकांक्षा बढ़ गई है. प्रारंभ से ही मांझी महादलित नेता के तौर पर खुद को स्थापित करने में लगे थे. मांझी के विवादास्पद बयानों से जदयू नेतृत्व परेशान हो चुका था. ऐसे में पार्टी नेतृत्व ने मांझी से जब इस्तीफा मांगा तो मांझी बगी से दिखने लगे.

राजनीतिक जानकार सुरेंद्र किशोर कहते हैं कि मांझी बहुत कम दिनों में अपने समाज के नेता बन गए. कई लोग मांझी के पीछे खड़े नजर आते हैं. इसमें कई मंत्री और विधायक भी शामिल हैं. ऐसे में मांझी का हौसला बुलंद हुआ.

किशोर कहते हैं, “इसीलिए जब पार्टी नेतृत्व ने मांझी से इस्तीफा मांगा तो मांझी के सब्र का पैमाना छलक गया.”

मांझी के एक नजदीकी नेता के अनुसार, उनकी नाराजगी लगातार उनके कामों में हस्तक्षेप को लेकर भी है. पिछले दिनों उनके काम को लेकर पार्टी के प्रवक्ताओं द्वारा की गई बयानबाजी से मांझी खासा नाराज हुए थे.

इसके बाद भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के स्थानांतरण को भी दो मंत्रियों ने नियम विरुद्ध बताते हुए मुख्य सचिव से शिकायत की थी.

सूत्रों का दावा है कि कुछ दिनों पूर्व राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद ने भी मांझी को खरी-खोटी सुनाई थी.

किशोर मानते हैं कि मांझी को लेकर पार्टी में नाराजगी काफी दिनों से थी, परंतु पार्टी अध्यक्ष शरद यादव द्वारा उनसे बिना पूछे पार्टी विधानमंडल दल की बैठक बुलाना आग में घी का काम कर गया और जदयू की नाव हिचकोले खाने लगी. अब देखना यह है कि यह नाव किस किनारे लगती है.

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