काले धन से महंगाई-गरीबी बढ़ी

रायपुर | विशेष संवाददाता: काले धन के कारण देश में महंगाई तथा गरीबी बढ़ी है. कितना काला धन है उसके लिये अलग-अलग आकड़े पेश किये जा रहें हैं परन्तु उससे हो रहें नुकसान पर चर्चा अवश्य किया जाना चाहिये. आपकों यह जानकर हैरत होगा कि काला धन महंगाई को बढ़ाता है. इसके समर्थन में अर्थशास्त्रीय तर्क भी मौजूद है. बाजार आधारित अर्थव्यवस्था में जब काला धन बाजार में आता है तो उसकी क्रय शक्ति सफेद धन से ज्यादा होती है. इसे इस रूप में भी समझा जा सकता है कि काला धन अनाप-शनाप दाम पर सामानों की खरीददारी करता है. धन ज्यादा होने के कारण मोल-भाव करने के स्थान पर जो चीज पसंद में आ जाये उसे खरीद लिया जाता है. परिणाम स्वरूप, बाजार में जिंसों का दाम उंचा उठता जाता है. हालांकि, महंगाई बढ़ने के और कारण भी होते हैं परन्तु काला धन इसमें इजाफा करता है इसमें कोई शक नहीं है.

उदाहरण के तौर पर जमीन बेचने वाला हमेशा दाम बढ़ाकर ही बताता है. जिससे आम आदमी मोल-भाव करे उससे पहले ही काले धन से उस जमीन को मुंह मांगी कीमत पर खरीद लिया जाता है. इसी कारण से उसके पास के जमीन की कीमत भी बढ़ जाती है.

इसी तरह से काले धन को सोना, हीरा तथा अन्य कीमती पत्थरों को खरीदने में लगाया जाता है. इसके पीछे सोच यह रहती है कि काले धन से सोना-हीरा खरीद लिया जाये जिसे बाद में बेचकर रुपया सफेद करने की कोशिश की जा सकती है. जाहिर है कि जिसके पास काला धन है वह उंची कीमत पर सोना-हीरा खरीदकर उसके बढ़े हुए दामों को भी स्थिर करने में सहयोग करता है.

इसी कारण से जब काला धन बाजार में आता है को महंगाई अनियंत्रित हो जाती है खासकर उन जिंसों की जिसकी जरूरत मलाईदार तबके को रहती है. इस बात की कभी उम्मीद न करें कि काला धन नौकरी पेशा लोगों के पास भी होती है. उनका तो कमाई के स्त्रोत से ही आयकर काट लिया जाता है.

काला धन वास्तव में पूरे देश में हर व्यक्ति के पास नहीं होता है. हमने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि काला धन वह मलाई है जिसे मलाईदार तबका दबाकर रखता है. इस प्रकार से देश में संपदा का वितरण एक तरफा ढ़ंग से हो जाता है. मलाईदार तबका ज्यादा माल दबा देता है फलतः बचे हुए माल पर अधिकांश आबादी को गुजारा करना पड़ता है. आय के इस असमान वितरण से देश में गरीबों तथा मध्यमवर्ग की संख्या में लगातार इजाफ़ा होता जाता है.

काला धन न केवल महंगाई तथा गरीबी को बढ़ाता है वरन् इससे समाज में असमानता भी बढ़ती है. उदाहरण के तौर पर यदि आपकों कोई सरकारी काम कराना है तो आप उसके लिये जूझते ही रहते हैं जबकि कोई और घूस देकर अपना काम करवाकर आराम से चला जाता है. जैसे जमीन की रजिस्ट्री का काम, बच्चों के एडमिशन का काम, उच्च शिक्षा का अवसर. सभी जगह तो आजकल डोनेशन चलता है या कहना चाहिये दौड़ता है.

काले धन से समाज में गुंडागर्दी बढ़ती है. ठेकेदार के गुंडे, जमीन की रक्षा के नाम पर लठैत यहां तक की कारखानों में समान वेतन के लिये उठती आवाज़ को ठंडा करने के लिये तथाकथित रक्षकों की फौज, सब कुछ काले धन के बल पर हासिल किया जाता है. इसे दूसरे शब्दों में कहे तो तो दूसरों के अधिकारों का हनन करने में भी काला धन बड़ी भूमिका में है.

कुल मिलाकर काला धन अपने व्यवहार से ही असामाजिक तथा आवारा है जिससे देश, समाज तथा प्रगति को नुकसान होता है.

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