रक्तदान की नीति बने

चंद्रकुमार जैन
रक्तदान को महादान की संज्ञा दी गई है, ज़िंदगी में एक मर्तबा किये रक्तदान से हम किसी की पूरी ज़िंदगी बचा सकते है. देश की नई पीढ़ी में सेवा की इस भावना को जागृत करने हेतु राजस्थान सरकार ने एक सराहनीय कदम उठाया है व रक्तदान को कॉलेज प्रवेश की नीति में बतौर प्रावधान जगह दी है. गौर करें कि 102 दफा रक्तदान कर चुके डॉ. दीपक शुक्ला चालीसगांव (महाराष्ट्र) कहते हैं कि स्वैच्छिक रक्तदान करने वालों के बच्चों को स्कूल एवं कालेज में प्रवेश के लिए छूट देकर इसे प्रोत्साहित किया जा सकता है और लोगों को आकर्षित किया जा सकता है.

किसी की जिंदगी बचाना मानवीय जीवन का सबसे बड़ा कार्य है और स्वैच्छिक रक्तदान के जरिये किसी जरूरतमंद के जीवन की रक्षा की जा सकती है. रक्तदान का महत्व हमें उस वक्त समझ आता है,जब हमारा कोई अपना प्रियजन हॉस्पिटल में रक्त के लिए जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहा होता है. हम परेशान होते हैं कि काश कोई व्यक्ति हमारे अपने की जिंदगी के लिए रक्त दे दे और उसे बचा ले. रक्तदान से आप किसी की जान बचा सकते हैं, जिसकी बदले में आपको ढेर सारी दुआएं मिलती हैं.


जीवन बचाने के लिए खून चढ़ाने की जरूरत पड़ती है. दुर्घटना, रक्तस्राव, प्रसवकाल और ऑपरेशन आदि अवसर शामिल हैं, जिनके कारण अत्‍यधिक खून बह सकता है और इस अवसर पर उन लोगों को खून की आवश्‍यकता पडती है. 25,065 लोगों द्वारा मुंबई में एक साथ रक्तदान करने के गिनीज बुक आफ रिकार्ड को तोड़ने में बतौर रक्तदाता शामिल डॉ. शुक्ला कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति 18 साल की उम्र से नियमित रूप से रक्तदान करे तो 60 साल की अवस्था तक वह 168 बार रक्त दे सकता है.

चिकित्सकों की राय के अनुसार थेलेसिमिया, ल्‍यूकिमिया, हीमोफिलिया जैसे अनेक रोगों से पीडित व्‍यक्तियों के शरीर को भी बार-बार रक्‍त की आवश्‍यकता रहती है अन्‍यथा उनका जीवन खतरे में रहता है. जिसके कारण उनको खून चढ़ाना अनिवार्य हो जाता है. इस तरह जीवनदायी रक्‍त को एकत्रित करने का एकमात्र उपाय है रक्‍तदान. स्‍वस्‍थ लोगों द्वारा किये गये रक्‍तदान से प्राप्त रक्त का उपयोग जरूरतमंद लोगों को खून चढ़ाने के लिये किया जाता है. यह धारणा कि रक्‍तदान से कमजोरी आती है, पूरी तरह आधारहीन है. आजकल चिकित्‍सा क्षेत्र में कॅम्‍पोनेन्‍ट थैरेपी विकसित हो रही है, इसके अन्‍तर्गत रक्‍त की इकाई से रक्‍त के विभिन्‍न घटकों को पृथक कर जिस रोगी को जिस रक्‍त की आवश्‍यकता है दिया जा सकता है. इस प्रकार रक्‍त की एक इकाई कई मरीजों के उयोग में आ सकती है.

मानवता की पहचान

यहां सवाल किया जा सकता है कि क्या रक्तदान करने से रक्तदाता को भी कोई लाभ होता है ? हमारा ज़वाब है – जी हाँ ! रक्‍तदान द्वारा किसी को नवजीवन देकर जो आत्मिक आनन्‍द मिलता है उसका न तो कोई मूल्‍य आंका जा सकता है न ही उसे शब्‍दों में व्‍यक्‍त किया जा सकता है. चिकित्‍सकों का यह मानना है कि रक्‍तदान शरीर द्वारा रक्‍त बनाने की क्रिया को भी तीव्र कर देता है. रक्‍त के कणों का जीवन सिर्फ 90 से 120 दिन तक का होता है. प्रतिदिन हमारे शरीर में पुराने रक्‍त का क्षय होता रहता है और नया रक्‍त बनता जाता है इसका हमें कोई अनुभव नहीं होता. अतः आप भी रक्‍तदान करें, जिससे रक्‍त की हमेशा उपलब्‍धता बनी रहे. कोई सुहागिन विधवा न बने, बूढ़े मॉ-बाप बेसहारा न हों, खिलता यौवन असमय ही काल का ग्रास न बने. आज किसी को आपके रक्‍त की आवश्‍यकता है, हो सकता है कल आपको किसी के रक्‍त की आवश्‍यकता हो. अतः निडर होकर स्‍वैच्छिक रक्‍त दान करें. स्‍वेच्‍छा से रक्‍त देने वाला मनुष्‍य, मानव मात्र सहायता के लिये रक्‍त देता है, न की धन के लालच से. इस स्वैच्छिक दान विकल्प नहीं है.

सुनिए ये कहानी

हर साल आठ करोड़ यूनिट से अधिक रक्तदान के बावजूद दुनिया की आबादी को सुरक्षित रक्त नहीं मिल पाता है. इसमें विकासशील देशों की भागीदारी केवल 38 फीसदी की होती है, जहां पूरे विश्व की 82 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है. पिछड़े देशों में महिलाओं और बच्चों को सबसे अधिक खून की जरूरत होती है. हर साल पांच लाख से अधिक महिलाओं की गर्भावस्था और बच्चे के जन्म के दौरान खून न मिलने से मौत हो जाती है. इसमें 99 फीसदी लोग विकासशील देशों के होते हैं. गौरतलब है कि विश्व में तकरीबन 60 फीसदी रक्त की आपूर्ति केवल 18 फीसदी आबादी करती है. एक अनुमान के मुताबिक, अस्पताल में भर्ती होने वाले 10 व्यक्तियों में से एक को रक्त की आवश्यकता होती है.

95 दफा रक्तदान कर चुके योगेश राज, हैदराबाद के अनुसार अधिकतर देशों में लोग मरीजों के लिए रक्त की खातिर मित्रों और परिजनों पर निर्भर रहते हैं. कुछ देश ऐसे भी है, जहां लोग रक्त के बदले भुगतान करते हैं. उन्होंने कहा कि हकीकत यह है कि स्वैच्छिक रक्तदाताओं के रक्त में संक्रमण का खतरा कम होता है और रक्तदान अभियान चलाने वाले इसकी तरफ आकर्षित करने के लिए दिशा में कार्यरत हैं. योगेश विभिन्न संस्थाओं द्वारा मिलने वाले नकद ईनाम को वह सामाजिक कार्यो में खर्च कर देते हैं. क्योंकि उनका मानना है कि वह इंसानियत की खातिर जो भी कर सकें, वह कम ही है. योगेश ने पहली दफा 2 अक्तूबर 1983 में 19 साल की उम्र में बी. काम में पढ़ते समय रक्तदान किया था और इसके बाद से वह लगातार हर तीन महीने में रक्तदान कर रहे हैं और उनकी इच्छा अंतिम सांस तक रक्तदान-महादान के सूत्र को चरितार्थ करने की है.

क्या कहते हैं विशेषज्ञ

सबसे अच्छी बात यह है कि रक्त देने से जरूरत मंद लोगों को जीवन दान मिलता है, बल्कि रक्तदाता को स्वास्थ्य लाभ भी प्राप्त होता हैं. रक्त में कई जीवनरक्षक तत्व होते हैं जो विभिन्न प्रकार की बीमारियों व चोटों को ठीक करने में मददगार होते हैं. कई लोगों के लिये रक्तदाता उनकी लाइफलाइन होते हैं. रक्तदान करने से किसी के जीवन को करीब से छूने का सुंदर अनुभव प्राप्त होता है. यह वो अनुभव है, जो शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता है. 18 से 60 वर्ष की आयु के स्वास्थ्य व्यक्ति जिनका वजन 50 किलो से ऊपर होता है, वो 450 मिली लीटर रक्त दान कर सकते हैं. पुरुष तीन महीने में एक बार और महिलाएं चार महीने में एक बार रक्त दान कर सकती हैं.

जब रक्तदान का इतना अधिक महत्व है और हमें इसका कोई नुकसान भी नहीं होता तो क्यों न हम भी रक्तदान करें. वैसे भी विश्व बंधुत्व की भावधारा भी भारतीय संस्कृति देने के सुख का शाश्वत उद्घोष करती रही है. यह भी कि जब हम देंगे तभी तो हमें लेने का अधिकार होगा. तो इस अवसर पर क्यों न प्रण लें कि अब हम भी रक्तदान करेंगे.

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