बांबे ब्लड ग्रूप ने डाला संकट में जीवन

रायपुर | संवाददाता: बांबे ब्लड ग्रूप के कारण छत्तीसगढ़ के बिलासपुर और दंतेवाड़ा में दो लोगों की जिंदगी खतरे में है. अपनी तरह के अनूठे बांबे ब्लड ग्रूप की पहचान 1950 के आसपास पहली बार तत्कालीन बम्बई में हुई थी, जब इस रक्त समूह का मामला सामने आया था. इसके बाद इसे ओएच या ‘बॉम्बे रक्त समूह’ के नाम से जाना जाता है. माना जाता है कि करोड़ों लोगों में किसी एक का रक्त समूह इस तरह का होता है.

आम तौर पर ए,बी, एबी या ओ रक्त समूह के बारे में हम सब जानते हैं. लेकिन बांबे रक्त समूह के बारे में बहुत अधिक जानकारी लोगों को नहीं है. मूल रुप से ‘ओ’ रक्त समूह से मिलते-जुलते इस ख़ून में एच एंटीजेन नहीं होता. यही कारण है कि इस रक्त समूह के व्यक्ति को किसी और रक्त समूह का ख़ून नहीं दिया जा सकता.


छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद पहली बार बिलासपुर में 2006 में अरविंद बघेल नामक 5 साल के बच्चे के बांबे ब्लड ग्रूप के होने का पता चला. इस मामले को पत्रकार अब्दुल असलम ने न केवल सार्वजनिक किया, बल्कि उन्होंने बाद के दिनों में देश भर के बांबे ब्लड ग्रूप के लोगों को जोड़ने की भी कोशिश की. उनकी खबर का असर ये हुआ कि देश और दुनिया की मीडिया में अरविंद की कहानी प्रसारित-प्रचारित हुई और फिर अऱविंद के दिल का ऑपरेशन संभव हो सका. अब्दुल असलम लगातार बांबे ब्लड ग्रूप के कई परिवारों के संपर्क में रहे. कोरबा में ईटीवी के संवाददाता अब्दुल असलम का कहना है कि देश भर में इस दुर्लभ बांबे ब्लड ग्रूप के लगभग 180 लोगों की अब तक पहचान हो पाई है.

अब एक बार फिर बिलासपुर में बांबे ब्लड ग्रूप का मामला सामने आया है. जाहिर है, इन दो नये लोगों की पहचान के साथ इस संख्या में इजाफा हो गया है. लेकिन इन पहचानों के बाद इन दोनों पीड़ितों की मुश्किलें और बढ़ गई हैं.

पेंड्रा के भरारी गांव के रहने वाले 19 साल के दुर्गेश भरिया की पैर की हड्डी टूट गई थी. जिन्हें स्थानीय अस्पताल में इलाज के बाद बिलासपुर के सिम्स में भेज दिया गया. चिकित्सकों ने जांच के बाद अरविंद के पैर का ऑपरेशन करने की जरुरत बताई. लेकिन जब दुर्गेश के रक्त समूह की जांच की गई तो चिकित्सक परेशान हो गये. कई घंटों की मशक्कत के बाद पता चला कि दुर्गेश का रक्त बांबे ब्लड ग्रूप का है. फिलहाल खून के अभाव में दुर्गेश का ऑपरेशन टल गया है.

इसी तरह दंतेवाड़ा में 45 साल की एक महिला अस्पताल पहुंची, जहां उसका हिमोग्लोबीन 5.2 पाया गया. चिकित्सकों ने राय दी कि महिला की हालत ठीक नहीं है, इसलिये इसे बल्ड चढ़ाये जाने की जरुरत है. लेकिन रक्त समूह की जांच के दौरान पता चला कि महिला का रक्त बांबे ब्लड ग्रूप समूह का है और कम से कम दंतेवाड़ा में इस रक्त समूह का कोई भी अब तक नहीं मिला है. अब एक बार फिर से बांबे ब्लड ग्रूप के लोगों की तलाश शुरु हो गई है.

इस बीच कोरबा के भिलाई बाज़ार में रहने वाली सुश्री सरिता नामक बांब रक्त समूह का एक यूनिट रक्दान किया है. छत्तीसगढ़ हेल्थ वेलफेयर सोसाइटी, छत्तीसगढ़ ब्लड डोनर फाउंडेशन, चरामेति फाउंडेशन और सुमित फाउंडेशन के सदस्यों की पहल से इस खून का इंतजाम हो सका है, जिसे दंतेवाड़ा भेजा जायेगा.

चिकित्सकों ने उम्मीद जताई है कि छत्तीसगढ़ में चिन्हित नौ बांबे ब्लड ग्रूप के लोगों में से कुछ और लोग भी रक्तदान के लिये तैयार हो सकते हैं.

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