बंधुआ जीवन की काली दास्तान

मोहम्मद जाकिर हुसैन
कभी-कभी तकलीफ भी राहत का रास्ता दिखा सकती है. छत्तीसगढ़ में नारायणपुर जिले में भानुप्रतापपुर की रहने वाली राजेश्वरी (29 वर्ष) के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ. आज भी वह उस पल को नहीं भूली है जब एक फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री में बंधुआ मजदूर के तौर पर काम करने के दौरान एसिड व दूसरे रसायनों के दुष्प्रभाव से उसके हाथ-पैर में जलन-खुजली होने लगी और यही तकलीफ न सिर्फ उसकी बल्कि उसकी तरह अन्य 58 युवतियों की मुक्ति की राह बनीं.

आज ये सारी की सारी युवतियां शासन से बंधुआ मुक्ति का प्रमाण पत्र हासिल कर अपके घर लौट चुकी हैं और अब उस दौर को भूल कई जिंदगी जी रही हैं. बस्तर की इन युवतियों की बंधुआ बनने की दास्तां शुरू होती है, पिछले साल अक्टूबर माह में.


भानुप्रतापपुर की राजेश्वरी के माता-पिता का काफी पहले देहांत हो चुका है. वह भानुप्रतापपुर में अपके रिश्तेदारों के यहां रह कर गुजर-बसर कर रही थी. राजेश्वरी ने बताया कि अक्टूबर में किसी दिन वह बाजार गई तो वहां उसकी सहेलियां एक दलाल तिजोराम कोर्राम के साथ मिली. इन लोगों ने बताया कि सभी तिरुपति दर्शन के लिए जा रही हैं. इनकी बात सुन कर राजेश्वरी भी खुशी-खुशी तिरुपति जाने के लिए तैयार हो गईं. लेकिन यहीं से इनके उत्पीडऩ की दास्तान भी शुरू हो गई.

10-20 के समूह में नारायणपुर से 15-30 आयु समूह की ये युवतियां तिरुपति जाने लगीं. 10-12 दिन के बाद जब ये घर नहीं लौटीं तो घर वालों को चिंता हुई. इस बीच ठेकेदार के लोगों ने गांव आकर बता दिया कि सभी वहां एक फैक्ट्री में काम कर रही हैं और जल्द ही बहुत सारा पैसा लेकर घर लौटेंगी. इससे घर वाले भी चुप बैठ गए. लेकिन दूसरी तरफ इन युवतियों को तिरुपति के बजाए सीधे तमिलनाडू के सेलम जिले में नमक्कल स्थित जेम्स एग्रो एक्सपोर्ट इंडस्ट्री ला कर काम में झोंक दिया गया था.

बंधुआ के अभिशाप से मुक्त हो चुकी यशोदा बाई बताती है कि वहां के हालात बेहद विपरीत थे. दिन भर सिर्फ काम करना होता था. खाने की छुट्टी मिलती थी लेकिन फैक्ट्री से बाहर जाने की इजाजत किसी को भी नहीं थी. सभी इस दमघोंटू माहौल में काम करने अभिशप्त थीं. अंजली बाई के बताया कि महिला होने के नाते उनके सम्मान का पूरा ध्यान रखा गया और उनके आस-पास किसी पुरुष को जाने की भी अनुमति नहीं थी लेकिन रोजी देने और मूलभूत सुविधाओं के नाम पर खूब परेशान किया गया.

जगनी पोटाई बाई बताती हैं कि किसी को भी बाहर बाजार जाने की अनुमति नहीं थी. किसी के पास मोबाइल फोन भी नहीं था और अपने घर तक संपर्क करनेे का इनके पास दूसरा कोई और साधन भी नहीं था. सुदाई बाई भी इन बातों की तस्दीक करते हुए बताती हैं कि वहां जाने के बाद तो हम अपके घर परिवार से पूरी तरह कट चुके थे. गांव-घर की कोई खबर नही थी. इन परिस्थितियों में काम कर रही राजेश्वरी के हाथ-पैर में करीब महीने भर के बाद से दुष्प्रभाव दिखने लगे थे.

राजेश्वरी बताती हैं कि अचार बनाने से पहले खीरे को एसिड या ऐसे ही कई रसायन में डूबा कर रखा जाता था. जिसे हाथ से निकालना होता था. इससे पैर में भी छींटे उड़ते थे. लगातार खुजली बढऩे की वजह से राजेश्वरी ने ठेकेदार से मिन्नतें कर घर जाने की छुट्टी ले ली. घर आते ही राजेश्वरी ने शोषण की सारी दास्तान बताई. इसके बाद जगदलपुर के एक एनजीओ आरशिल वेलफेयर सोसाइटी तक यह खबर पहुंची.

सोसाइटी के यह जानकारी जनजागृति केंद्र रायपुर को दी. इन महिला मजदूरों को नमक्कल से छुड़ानेे में अहम भूमिका अदा करने वाले एनजीओ जनजागृति केंद्र के प्रोजेक्ट मैनेेजर डॉ. पंकज मसीह बताते हैं कि बंधुआ मजदूरों को छुड़ाने में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय संगठन इंटरनेशनल जस्टिस मिशन (आईजेएम) को मामले की पूरी जानकारी दी गई. इसके बाद जीपीआर स्ट्रेटेजिक साल्यूशंस, आरशिल वेलफेयर सोसाइटी और जन जागृति केंद्र ने मिलकर संयुक्त रणनीति बनाई. मामला आदिवासी युवतियों का होने की वजह से बेहद संवेदनशील था, इसलिए छत्तीसगढ़ शासन के श्रम विभाग, नारायणपुर के जिला व पुलिस प्रशासन को पूरी जानकारी दी गई. जिसके बाद श्रम कल्याण अधिकारी, महिला पुलिस व अन्य अफसरों के साथ आईजेएम की संयुक्त टीम गठित की गई. वहां सेलम में डिप्टी कलेक्टर अतुल यादव ने समन्वयक का दायित्व निभाया. 18 नवंबर 13 को बस्तर की इन सभी 59 युवतियों को उस फैक्ट्री से मुक्त करवाया गया. इसके बाद सभी का सेलम कलेक्टोरेट में प्रशासनिक अफसरों के सामने कलमबंद बयान हुआ. फिर सभी स्वास्थ्य परीक्षण भी करवाया गया.

नमक्कल से बंधुआ मुक्ति मुहिम के बाद सकुशल घर लौटी युवतियों में सुखमति वड्डे (23 वर्ष), बुधियारिन (17 वर्ष), रचना (17 वर्ष), फूलमति (17 वर्ष),सुखमति (16 वर्ष),सोनदाई (20 वर्ष), जैनीबाई (17 वर्ष), सुगोंधी (15 वर्ष),सुकारो (23 वर्ष),सियाबती (19 वर्ष),सनमति (20 वर्ष), गंगा (16 वर्ष), रुखमी (23 वर्ष),सुनीता (18 वर्ष), बुधियारी (17 वर्ष),सुकली (20 वर्ष),उर्मिला (22 वर्ष), बजई (20 वर्ष),सुधानी (19 वर्ष), जोनेे (24 वर्ष), रजई (18 वर्ष), सुगंती(20 वर्ष), रायमति(20 वर्ष),अनिता (20 वर्ष), लछंती (20 वर्ष),बीना (16 वर्ष),सयाथो (19 वर्ष),संतोषी (20 वर्ष),बजंथी (17 वर्ष),मनकी (25 वर्ष),सुगवंती (27 वर्ष), संताई(16 वर्ष), सरिता (15 वर्ष),बजंथी (16 वर्ष), सुखमति (15 वर्ष),राकू (16 वर्ष), गंदई (19 वर्ष), जगानी (20 वर्ष), संथाई(20 वर्ष), रंथी बाई (15 वर्ष), लखंती (23 वर्ष),सुखबाई (19 वर्ष),मंगनी(23 वर्ष),सरोती (20 वर्ष),सोनारी (15 वर्ष),सनोथी (22 वर्ष),सुकमी (18 वर्ष),सुखमति (18 वर्ष),बाथी (23 वर्ष),संथारी (20 वर्ष),अंजली(20 वर्ष), यशोदा (20 वर्ष),रसाई (19 वर्ष),फूलबाई (16 वर्ष),सिंगाई (21 वर्ष),माथुरो (20 वर्ष),संजना (20 वर्ष)और राजबति (22 वर्ष) शामिल हैं.

बंधुआ मुक्ति पर कार्य कर रहे जगदलपुर के सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता दीपक बताते हैं कि आईजेएम न सिर्फ बंधुआ मुक्ति के लिए प्रयास करता है, बल्कि इसके बाद की परिस्थितियों में भी प्रभावितों के लिए पूरा कार्यक्रम चलाया जाता है. यह संगठन पूरे साल भर तक ऐसे प्रभावितों के बीच ‘आफ्टर केयर और ‘फ्रीडम प्रोग्राम’ के नाम से दो महत्वपूर्ण कार्यक्रम चलाता है. जिसमें हर महीने आईजेएम के कार्यकता इन बंधुआ मुक्त मजदूरों की स्थिति की समीक्षा करते हैं कि कहीं फिर से दलाल के चंगुल में फंस तो नहीं गए हैं. वहीं इन्हें सरकारी योजनाओं और इसके अंतर्गत मिलने वाली तमाम सुविधाओं की जानकारी दी जाती है.

इधर इन युवतियों के नारायणपुर लौटने पर सरकार की तरफ से सभी को इंदिरा आवास उपलब्ध कराए गए हैं. इन्हें विधि सम्मत पुकर्वास राशि का भुगतान चरणबद्ध तरीके से किया गया और इनके वोटर आईडी, स्मार्ट कार्ड, राशन कार्ड व अन्य दस्तावेज दुरुस्त करवाए गए. इन सभी का श्रम विभाग के अंतर्गत असंगठित कर्मकार मजदूर संघ में पंजीयन करवाया गया. जिससे कि इन्हें शासन की 21 विभिन्न योजनाओं का लाभ मिल रहा है. वर्तमान में फैक्ट्री संचालक पर बंधुआ मजदूरी के अलावा अनुसूचित जनजाति अधिनियम व विस्फोटक रसायन इस्तेमाल करने के आरोप में न्यायालय में मामला चल रहा है.

*नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया की फैलोशिप के अंतर्गत किये गये अध्ययन का हिस्सा

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