जब बीपीएल ने किया करोड़ों का भुगतान

रायपुर | संवाददाता : कोरबा वेस्ट पावर कंपनी लिमिटेड के मामले में सब कुछ वैसा नहीं है, जैसा राजस्व मंत्री प्रेम प्रकाश का दावा है. सोमवार को विधायक अमित जोगी के सवाल के जवाब में राजस्व मंत्री प्रेम प्रकाश पांडेय ने दावा किया कि कोरबा वेस्ट द्वारा भूमि का अधिग्रहण विधिवत भू-अर्जन अधिनियम 1894 में वर्णित प्रावधानों के तहत किया गया है.

लेकिन इस मामले में हाईकोर्ट में सरकार कटघरे में है. इस मामले में ग्रामीणों ने राजस्व मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री और राष्ट्रपति तक को अनुरोध किया लेकिन बीपीएल मजदूरों और मनरेगा मजदूरों के नाम पर करोड़ों रुपये के भुगतान के इस मामले में कोई हस्तक्षेप अब तक नहीं हुआ, जिसके बाद मामला हाईकोर्ट तक जा पहुंचा.


गौरतलब है कि रायगढ़ के पुसौर में उद्योगपति गौतम थापर के स्वामित्व वाली अवंथा ग्रुप की सहयोगी संस्था कोरबा वेस्ट पावर कंपनी लिमिटेड 600-600 मेगावाट के पॉवर प्लांट बना रही है. पुसौर ब्लाक के ग्राम बड़े भंडार, छोटे भंडार, सरवानी और अमलीभौना में प्रस्तावित 600-600 मेगावाट के 5826 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले इस पॉवर प्लांट के लिये कंपनी को 885.12 एकड़ जमीन की जरुरत थी.

जनवरी 2014 में पत्रकार आलोक प्रकाश पुतुल और सामाजिक कार्यकर्ता विनोद व्यास द्वारा दायर याचिका में कहा गया है कि छत्तीसगढ़ की भू-राजस्व संहिता की धारा 170 ख के अनुसार अनुसूचित क्षेत्र एवं अनुसूचित जनजातियों की भूमि को गैर आदिवासी द्वारा अंतरण नहीं किया जा सकता. ऐसे में कोरबा वेस्ट पावर लिमिटेड ने इसके लिये सरकारी अधिकारियों की मदद से पहले जमीनों का चिन्हांकन करवाया और फिर आदिवासियों की जमीन खरीदने के लिये 300 किलोमीटर दूर रायपुर जिले के अभनपुर के परसदा गांव के आदिवासियों को मोहरा बनाया गया.

याचिका में कहा गया है कि इस गांव के आठ आदिवासियों ने अपने नाम से 100 आदिवासियों की जमीनें खरीदीं. इन आदिवासियों में से सभी का नाम रोजगार गारंटी योजना में दर्ज है और इनका परिवार रोजगार गारंटी योजना में मजदूरी भी करता रहा है. सभी आदिवासी बीपीएल कार्डधारी हैं और इन बीपीएल कार्डधारियों ने महीने भर के भीतर 10 करोड़ 26 लाख 66 हजार 427 रुपये की ज़मीन खरीदी है.

इस जनहित याचिका में कहा गया है कि फर्जी तरीके से आदिवासियों की ज़मीन खरीदी गई, जिससे उन्हें न तो विधिसम्मत मुआवजा मिला और ना ही नियमानुसार नौकरी और दूसरी विस्थापन संबंधी सुविधायें ही मिली. फर्जी तरीके से ज़मीन खरीदे जाने के मामले में पुसौर के आदिवासियों ने राज्य के सभी आला अधिकारियों से लिखित गुहार लगाई लेकिन इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं की गई. याचिकाकर्ता आलोक प्रकाश पुतुल के अनुसार उन्होंने इस फर्जीवाड़े को लेकर रिपोर्टिंग की. इसके बाद आदिवासी लगातार उनके पास इस समस्या में मदद मांगने आते रहे. जब कहीं से इस दिशा में कोई कार्रवाई नहीं हुई तो उन्होंने नैतिक दायित्व निभाते हुये इस मामले में अधिवक्ता रजनी सोरेन और किशोर नारायण के माध्यम से जनहित याचिका दायर की है.

इस मामले में ज़मीन खरीदी करने वाले आदिवासियों की आर्थिक स्थिति को लेकर हाईकोर्ट ने सरकार से जनवरी 2015 में रिपोर्ट पेश करने के लिये कहा था. लेकिन सरकार रिपोर्ट नहीं पेश कर पाई. हर बार तीन सप्ताह का समय रिपोर्ट पेश करने के लिये लिया जाता रहा. लेकिन ऐसे कई तीन सप्ताह गुजर गये. रिपोर्ट पेश हो गई तो फिर जवाब देने के लिये समय लिया जाता रहा.

याचिकाकर्ता आलोक प्रकाश पुतुल और विनोद व्यास ने कहा है कि राज्य सरकार जिस तरह से मामले को लंबा खिंचने की कोशिश कर रही है, उससे लगता है कि वह अनावश्यक रुप से याचिकाकर्ता और अदालत का समय जाया कर रही है.

माना जा रहा है कि इस मामले में अगले एक-दो महीनों में कोई महत्वपूर्ण फैसला आ सकता है.

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