ब्रिक्स बैंक की सुबह

जे के कर

कहावत है कि बिल्ली को बंद कमरे में नहीं मारना चाहिये. उसके भागने के लिये जगह अवश्य छोड़ देनी चाहिये, अन्यथा वो हमला कर देगी. डरबन में हुए ब्रिक्स देशों के सम्मेलन में यही हुआ है.


27 मार्च को डरबन में संपन्न ब्राज़ील, रुस, भारत,चीन तथा दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्र प्रमुखों की बैठक, जिसे ब्रिक्स देशो के नाम से जाना जाता है; ने अब बाजाप्ता यह तय कर लिया है कि दो वर्षों के भीतर ये पांचों देश मिलकर ब्रिक्स बैंक का गठन कर लेंगे. इसके लिये सितंबर 2013 में इन देशों के वित्त मंत्रियों की बैठक में आवश्यक पूंजी पर निर्णय ले लिया जायेगा. जिसे मार्च 2014 के ब्रिक्स राष्ट्र प्रमुखों के बैठक में अमली जामा पहना दिया जायेगा. एक अनुमान के अनुसार इस के गठन में साढ़े चार खरब डॉलर की आवश्यकता होगी.

इससे पहले दुनिया के सभी देश अल्प तथा दीर्घ अवधि के ऋण के लिये अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष एवं विश्व बैंक पर निर्भर रहे हैं. जिसके घोषित से ज्यादा अघोषित उद्देश्य हैं. कर्ज देते वक्त ये दोनों संस्थाए इतनी शर्तें लाद देती हैं कि फिर उस कर्ज जाल से निकलना उस देश के लिये लगभग असंभव हो जाता है.

इन शर्तों में देशी बाज़ार को विदेशी दैत्याकार कंपनियों के लिये खोलना प्रमुख है. इस प्रकार देशी बाज़ार का मुनाफा पूर्वी विकसित देशों जैसे अमरीका तथा यूरोप को चला जाता है.

ब्रिक्स देशों में विश्व की चालीस प्रतिशत जनसंख्या वास करती है. इनका सकल घरेलू उत्पादन भी विश्व का तीस प्रतिशत है. इन ब्रिक्स देशों को एक उभरते हुए बाज़ार के रूप में देखा जाता है. अब इन देशों द्वारा स्वयं का एक विकासशील बैंक बनाना पूर्वी देशों को रास नही आयेगा. वह भी तब जब अमरीका का प्रमुख व्यापारिक तथा सैन्य प्रतिद्वंद्वि चीन इसमें शामिल हो. बढ़ती जनसंख्या तथा अपने ढीले ढाले कानून के कारण आकर्षक बाज़ार भारत यदि इसके साथ हो तो अमरीका की नींद में अवश्य ही खलल पड़ेगी.

डरबन सम्मेलन में यह भी निर्णय हुआ है कि सौ अरब डालर के एक कोष की स्थापना की जाये, जिससे आपातकाल में ऋण लिया जा सके. उपरोक्त दोनों निर्णय विश्व बैंक तथा अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के जुगतों पर कुठाराघात करेगा, यह तो तय है. डरबन में हुए राष्ट्राध्यक्षों की बैठक में यह भी तय किया गया है कि सदस्य देश आपस में व्यापार, निवेश तथा सहयोग बढ़ाएगें. जब ऐसा होगा तब विश्व की चालीस प्रतिशत आबादी अमरीकी कब्जे से बाहर निकल जायेगी.

दुनिया के प्राकृतिक संसाधन, चाहे वह जमीन के नीचे हों या उपर, अमरीका के नेतृत्व ने उसे लूटा जा रहा है. इराक, लीबिया, अफगानिस्थान इसके उदाहरण हैं. अमरीका ने हर एक को घेर कर मारा है. आने वाले समय में सीरिया तथा ईरान को निशाना बनाया जाना है.

आज तमाम विश्व आजाद होने के लिये छटपटा रहा है, ऐसे में ब्रिक्स बैंक का मूर्त रूप धारण करना एक नई सुबह की तरह है.

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