बसपा और छजका के गठबंधन पर मुहर

रायपुर | संवाददाता: बसपा और अजीत जोगी की पार्टी छजका छत्तीसगढ़ में विधानसभा का चुनाव मिल कर लड़ेंगे. दोनों ही पार्टियों के बीच गठबंधन की घोषणा कभी भी हो सकती है. इसके लिये अंतिम समझौते पर मुहर लग चुकी है.

अजीत जोगी की पार्टी ने बसपा के लिये 30 सीटें छोड़ने पर सहमति जताई है. शेष 60 सीटों पर छजका अपने उम्मीदवार खड़े करेगी.


बसपा सूत्रों के अनुसार इसी सप्ताह बसपा सुप्रीमो मायावती के निर्देश पर बसपा की एक टीम रायपुर पहुंची थी. यहां पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के सागौन बंगला स्थित निवास पर इस टीम ने मुलाकात की.

कई घंटों तक चली बैठक में बसपा की एक पूरी टीम और अमित जोगी भी उपस्थित थे.

खबर के अनुसार एक-एक सीट पर चर्चा हुई. इसके बाद 30 सीटें बसपा के लिये छोड़ने पर सहमति बनी. बसपा नेताओं का कहना था कि इस गठबंधन में गोंडवाना गणतंत्र पार्टी और समाजवादी पार्टी को भी शामिल किया जाये.

बसपा नेताओं ने हीरासिंह मरकाम के गोंडवाना गणतंत्र पार्टी की छत्तीसगढ़ में 14 सीटों पर मजबूती का भी हवाला दिया. उन्होंने यह भी आश्वस्त किया कि समाजवादी पार्टी को इस गठबंधन में शामिल करने के लिये उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से सुविधानुसार बात की जा सकती है.

बसपा के एक नेता ने कहा कि अजीत जोगी इसके लिये फिलहाल तैयार नहीं हुये. उन्होंने इस मुद्दे पर अगले दौर में बातचीत करने को लेकर सहमति जरुर जताई है.

कांशीराम का पहला चुनाव छत्तीसगढ़ से

आंकड़ों की देखें तो 2013 के चुनाव में छत्तीसगढ़ की 90 विधानसभा सीटों में से 49 सीटों पर भाजपा ने कब्जा जमाया था. वहीं 39 सीटों पर कांग्रेस काबिज हुई थी. एक-एक सीटें बसपा और निर्दलीय प्रत्याशी को मिली थीं.

छत्तीसगढ़ भले बहुजन समाज पार्टी का गढ़ नहीं रहा हो. लेकिन राज्य के मैदानी इलाकों में दलित वोट हमेशा से डिसाइडिंग फैक्टर रहे हैं. बसपा का इन इलाकों में अच्छा-खासा जनाधार रहा है.

बसपा की स्थिति का अनुमान इस बात से भी लगाया जा सकता है कि बसपा के संस्थापक कांशीराम ने अपने जीवन का पहला लोकसभा चुनाव 1984 में छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा इलाके से ही लड़ा था. उसके बाद से बसपा इस इलाके में लगातार बढ़ती चली गई है.

हालांकि वोटों का बिखराव और संसाधनों की कमी से जूझती रही बसपा विधानसभा चुनाव में एक बार 54 सीटों पर और दो बार 90 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़ी कर चुकी है. लेकिन दो सीटों से अधिक पर उसे कभी सफलता नहीं मिली है.

तीन बार विधायक बने रत्नाकर

अविभाजित मध्यप्रदेश में पामगढ़ से बसपा उम्मीदवार दाउराम रत्नाकर को तीन बार विधायक बनने का अवसर मिला.

छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद 2003 के विधानसभा चुनाव में सारंगढ़ और मालखरौदा से बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार विधानसभा में पहुंचे तो 13 सीटें ऐसी थीं, जहां पार्टी तीसरे नंबर पर थी. पार्टी को कुल 4.45 फीसदी वोट मिले थे.

इसके बाद 2008 के चुनाव में भी पार्टी दो सीटों पामगढ़ और अकलतरा से चुनाव जीतने में सफल रही. जबकि 36 सीटों पर पार्टी तीसरे नंबर पर रही. इस साल वोटों का प्रतिशत बढ़ कर 6.11 प्रतिशत पर जा पहुंचा.

तो नहीं बनती भाजपा की सरकार

अंतिम चुनाव यानी 2013 में बसपा का प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं रहा.

अलग-अलग कारणों से पार्टी के कई नेताओं के संगठन से बाहर होने का नुकसान बहुजन समाज पार्टी को उठाना पड़ा और केवल एक विधानसभा क्षेत्र जैजेपुर से जीत हासिल हो पाई.

इस साल वोट का प्रतिशत भी घट कर 4.27 पर जा पहुंचा. लेकिन बसपा तीन सीटों पर दूसरे नंबर पर रही और 9 सीटों पर तीसरे नंबर पर पार्टी ने अपनी जगह बनाई.

पिछले चुनाव में कम से कम 11 सीटें ऐसी थीं, जहां कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी के वोट जोड़ दिये जायें तो भाजपा वहां हार जाती.

2013 के चुनाव में राज्य की 90 विधानसभा सीटों में से भाजपा ने 49 सीटें जीती थीं. जबकि कांग्रेस को 39 और बसपा को 1 सीट मिली थी.

कांग्रेस और बसपा मिलकर चुनावी समर में उतरतीं तो नतीजे अलग होते. बीजेपी को 11 सीटों का नुकसान उठाना पड़ता और 38 सीटें मिलतीं. जबकि कांग्रेस-बसपा गठबंधन 51 सीटों के साथ सत्ता पर काबिज हो सकता था.

अब जबकि बसपा और छजका में गठबंधन पर मुहर लगभग लग चुकी है, तब भाजपा को इस गठबंधन का कितना नुकसान उठाना पड़ेगा, यह देखना दिलचस्प होगा.

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