उपचुनाव में नमो लहर फेल?

नई दिल्ली | विशेष संवाददाता: ताजा उप चुनाव के नतीजें इंगित करते हैं कि इन उपचुनावों में मोदी लहर नाम की चीज नहीं रह गई है. यदि मोदी लहर रहती तो विपक्ष का फिर से सूपड़ा साफ हो गया होता. मंगलवार को घोषित उपचुनावों के नतीजें बयां कर रहें हैं कि लोकसभा चुनाव में डंके के चोट पर सत्ता परिवर्तन करने वाली भाजपा उसी उत्तर प्रदेश में लव जिहाद के भंवर में फंस कर रह गई है जिसके बल पर उसने दिल्ली का समर जीता था.

लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के रागा के राग को जनता ने सुनने से इंकार कर दिया था परन्तु उसी कांग्रेस ने राजस्थान तथा गुजरात जैसे भाजपा के गढ़ में सेंध लगाई है. इतना जरूर है कि भाजपा ने पश्चिम बंगाल में वाम शासन को उखाड़ फेंकने वाली ममका बनर्जी के लिये खतरें का ऐलान कर दिया है.


अपने 100 दिनों के शासन में मोदी सरकार ने विदेशी मोर्चे पर राजनयिक सफलता अवश्य पाई है. इसके बावजूद मतदाता भाजपा के उस नारे को कैले भूल सकती है जिसमें कहा गया था कि “बहुत हुई महंगाई की मार, अबकी बार भाजपा सरकार”. गौरतलब है कि मोदी सरकार के 100 दिनों के शासन के दौरान ही टमाटर 80-100 रुपये प्रति किलो की दर से बिक चुके हैं.

जापान, वेशक भारत में करीब 2लाख करोड़ रुपयों का निवेश करने जा रहा है परन्तु वहीं देश के बाशिंदों के वास्तविक आय में कोई इजाफा नहीं हुआ है. मतदाता जो सबसे पहले एक इंसान है इस सत्य को सहसूस कर रहा है कि शेयर बाजार के तेजड़ियो उसकी भूख नहीं मिटा सकते हैं. उसे तो दो जून की रोटी के लिये नमो के दौर में उतनी की कठिनाईयों का सामना करना पड़ रहा है जितना उसे ममो के दौर में करना पड़ता था. जाहिर है कि सत्ता परिवर्तन की खुशी कम से कम उसके दरवाजे तक नहीं पहुंची है.

उपचुनाव के लिए 13 सितंबर को मतदान कराए गए थे और मतगणना मंगलवार को संपन्न हुई. जहां पश्चिम बंगाल में 15 वर्षो बाद अपने दम पर विधानसभा में भाजपा को जगह मिली है वहीं उसके शासन वाले दो राज्यों गुजरात एवं राजस्थान में अपनी सीटें गंवा बैठी. सबसे हाताशा उत्तर प्रदेश में मिली है जहां 11 सीटों में से भाजपा को सिर्फ तीन सीटें ही मिल सकीं सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी को आठ सीटें मिलीं. और तो और, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अब गढ़ कहलाने वाले वाराणसी की रोहनिया सीट पर भाजपा का सहयोगी संगठन अपना दल की प्रत्याशी कृष्णा पटेल चुनाव हार गई हैं, जबकि मुलायम के गढ़ मैनपुरी में उनके पोते तेज प्रताप सिंह यादव नए किलेदार बनकर उभरे हैं.

गुजरात में विधानसभा में जिन नौ सीटों पर उपचुनाव कराए गए थे उनमें से भाजपा 6 सीटें मिली और तीन पर कांग्रेस ने बाजी मार ली. भाजपा के लिए राहत वाली बात वडोदरा लोकसभा सीट का परिणाम रहा है जहां उसके प्रत्याशी चुनाव जीतने में कामयाब रहे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लोकसभा चुनाव जीतने से रिक्त हुई मणिनगर सीट पर भाजपा का कब्जा बरकरार रहा. इसके अलावा प्रधानमंत्री द्वारा ही खाली की गई वडोदरा लोकसभा सीट फिर भाजपा के खाते में गई, मगर इस बार उसके प्रत्याशी कम ही अंतर से जीते.

मणिनगर के अलावा आठ अन्य विधानसभा सीटों में दीसा, टंकारा, खंभालिया, मंगरौल, तलाजा, आनंद, मातर और लिंखेड़ा शामिल हैं. कांग्रेस ने दीसा, खंभालिया और मंगरौल सीटों पर भारी अंतर से विजय हासिल की है. पार्टी ने इस जीत के लिए लोगों को धन्यवाद दिया. वडोदरा लोकसभा सीट पर भाजपा प्रत्याशी रंजनाबेन भट्ट ने कांग्रेस प्रत्याशी नरेंद्र रावत को 300,000 मतों से पराजित किया.

लोकसभा चुनाव में मोदी वडोदरा के अलावा उत्तर प्रदेश में वाराणसी से भी चुनाव जीते थे और उन्होंने वडोदरा सीट खाली कर दी. आम चुनाव में मोदी यहां से 500,000 लाख से ज्यादा मतों से विजयी हुए थे.

तेलंगाना के मेडक लोकसभा सीट पर तेलंगाना राष्ट्र समिति ने अपना कब्जा बरकरार रखा. इस सीट के लिए हुए उपचुनाव के बाद मंगलवार को मतगणना हुई. इस बार जीत का अंतर हालांकि आम चुनाव से कम रहा. टीआरएस उम्मीदवार के. प्रभाकर रेड्डी ने कांग्रेस की उम्मीदवार वी. सुनीता लक्ष्मा रेड्डी को 361,277 मतों से पराजित किया. भारतीय जनता पार्टी एवं तेलुगू देशम पार्टी के संयुक्त प्रत्याशी जग्गा रेड्डी तीसरे नंबर पर रहे.

प्रभाकर रेड्डी को 571,800 मत मिले जबकि सुनीता को 210,523 मत मिले. जग्गा रेड्डी को 186,334 मत मिले. तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के इस्तीफ के बाद रिक्त हुई मेडक सीट पर उपचुनाव कराया गया था.

पश्चिम बंगाल की दो विधानसभा सीटों पर कराए गए उपचुनाव में एक पर भाजपा ने जीत दर्ज करते हुए 15 वर्ष बाद वह विधानसभा में अपना प्रतिनिधि भेजने में सफलता पाई है. सत्ता धारी तृणमूल कांग्रेस चौरंगी सीट पर कब्जा कायम रखने में कामयाब रही. 1999 में एक उपचुनाव में ही भाजपा ने विधानसभा में प्रवेश किया था, लेकिन उस समय उसका तृणमूल के साथ गठबंधन था.

बशीरहाट-दक्षिण विधानसभा सीट पर भाजपा प्रत्याशी शामिक भट्टाचार्य ने जीत दर्ज की. भट्टाचार्य ने तृणमूल के प्रत्याशी और फुटबाल टीम के पूर्व कप्तान दीपेंदु बिस्वास को कड़े मुकाबले में 1,586 मतों से हराया. 24 परगना जिले की इस सीट से 2011 के चुनाव में वाम मोर्चा के प्रत्याशी और मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नारायण मुखर्जी विजयी रहे थे. उनके निधन के बाद यहां उपचुनाव कराना पड़ा है. कोलकाता के मध्य में स्थित चौरंगी सीट पर नयना बंदोपाध्याय ने भाजपा के रीतेश तिवारी को 14,344 मतों से पराजित किया. बंदोपाध्याय तृणमूल संसदीय दल के नेता सुदीप बंदोपाध्याय की पत्नी हैं.

नौ राज्यों में हुए उपचुनाव के परिणाम आने पर कांग्रेस ने मंगलवार को कहा कि ये अच्छे संकेत हैं, इससे स्पष्ट है कि लोग भारतीय जनता पार्टी की नीतियों को खारिज कर रहे हैं. कांग्रेस प्रवक्ता शकील अहमद ने कहा कि उनकी पार्टी ने राजस्थान और गुजरात में अच्छी स्थिति में रही, लेकिन उत्तर प्रदेश में अपेक्षा के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर पाई. उन्होंने कहा, “ये परिमाण कांग्रेस और जीतने वाली अन्य पार्टियों के लिए अच्छे संकेत हैं मगर भाजपा और उसकी नीतियों के लिए बुरे संकेत हैं. लोगों ने भाजपा की नीतियों को खारिज कर दिया है.”

वहीं, भाजपा के प्रवक्ताओं ने जोर देकर कहा है कि उपचुनावों में स्थानीय मुद्दे हावी रहते हैं. इसके बावजूद दिल्ली के सत्ता के गलियारों में यह माना जा रहा है कि उपचुनावों में नमो लहर ने काम नहीं किया है. इतना जरूर है कि इन उपचुनावों के नतीजे का असर नीति-निर्धारण की प्रक्रिया पर नहीं पड़ने जा रहा है परन्तु इससे यह जरूर समझा जा सकता है कि जिंदा कौमे पांच साल तक इंतजार नहीं कर सकती हैं.

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