13 वर्ष कम तो नहीं होते

दिवाकर मुक्तिबोध
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को देखकर आपको, आम आदमी को क्या लगता है? क्या राय बनती है? अमूमन सभी का जवाब एक ही होगा- भले आदमी हैं, नेकदिल इंसान. सीधे, सरल. मुख्यमंत्री होने का दंभ नहीं. सबसे प्रेम से मिलते हैं. सबकी सुनते हैं. लेकिन शासन? जवाब यहां भी एक जैसा ही होगा – लचर है. नौकरशाहों पर लगाम नहीं है. उनकी मनमानी रोकने में असमर्थ है. धाक नहीं है. भ्रष्टाचार पर नियंत्रण नहीं है. सुस्त है. सरकार वे नहीं, नौकरशाह चला रहे हैं. सरकारी योजनाओं का लाभ निचले तबके तक नहीं पहुंच पा रहा है. सरकारी कामकाज में पारदर्शिता नहीं है. फाइलों के आगे बढऩे की रफ्तार बेहद सुस्त है और सर्वत्र कमीशनखोरी का जलवा है.

और उनकी राजनीति? यहां भी प्राय: सभी का जवाब तकरीबन एक जैसा ही होगा- बहुत घाघ हैं. जबरदस्त कूटनीतिज्ञ. अपने विरोधियों को कैसे चुन-चुनकर ठिकाने लगाया. आदिवासी नेतृत्व की मांग करने वालों की हवा निकाल दी. उनकी कुर्सी की ओर आंखें उठाने वालों की बोलती बंद कर दी. शासन की आलोचना करने वाले सांसदों व पार्टी नेताओं को आईना दिखा दिया. कईयों के लिए मार्गदर्शक की भूमिका का इंतजाम कर दिया. संगठन के नेतृत्व को भी अपनी मुट्ठी में रखा. कोई हूं की चूं नहीं. सभी महत्वपूर्ण स्थानों, पदों पर अपने मोहरे फिट किए? गजब के राजनेता. मासूमियत भरी राजनीति. भाजपा शासित पहला प्रदेश जहां पार्टी में असंतोष पानी के बुलबुले की तरह है, फूंक मारते ही ध्वस्त.


और अब पार्टीजनों, नेताओं के नज़रों में रमन सिंह? जवाब मिलेगा- पंगा लेने का मतलब नहीं. केन्द्र में जबरदस्त पकड़. पीएम तक तारीफ करते हैं. लेकिन यहां अभयदान. खूब कमाओ, खाओ. लिहाजा चौथी पारी भी मिलनी ही चाहिए.

तो ये हैं, प्रदेश की जनता के प्रति बेहद संवेदनशील, उदारमना मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह जिनके शासन के 13 वर्ष 12 दिसम्बर 2016 को पूर्ण होने वाले हैं. मुख्यमंत्री के बतौर तीसरी पारी के अभी दो वर्ष और बाकी हैं. यानी दो जलसे इन्हीं तारीखों में और होंगे जैसे कि इस बार हो रहे हैं. यह स्वाभाविक भी है क्योंकि हर सरकार को यह हक है कि वह अपनी उपलब्धियों का खूब ढिंढोरा पीटे भले ही वे कमतर क्यों न हो. फिर सत्ता के 13 वर्ष कम नहीं होते. मुख्यमंत्री के बतौर तीसरी पार्टी हर किसी राजनेता को नसीब नहीं होती.

भाजपा शासित राज्यों में दो ही मुख्यमंत्री ऐसे हैं जो तीसरी पारी खेल रहे हैं- एक म.प्र. के शिवराज सिंह और दूसरे रमन सिंह. रमन सिंह के अब तक के कार्यकाल का असली लेखा-जोखा जनता के पास है, जो चुनाव वर्ष 2018 में वोटों के जरिए सामने आएगा. सरकार विकास के दावे भले ही कितने ही क्यों न करे लेकिन तय जनता को करना है. इसमें संदेह नहीं कि सरकार की लोक कल्याणकारी नीतियों की वजह से राज्य में काफी कुछ बदला है. यह बदलाव हर मोर्चे पर नज़र भी आता है विशेषकर आधारभूत संरचनाओं के मामले में. शहरों में जीवनस्तर सुधरा है, कुशल, अकुशल हाथों के पास पर्याप्त काम है किंतु गांव? वे अभी भी समस्याग्रस्त हैं.

|| ||

राज्य के 19 हजार गांवों में से कुछ दर्जन गांवों को छोड़ दें तो शेष नागरिक जीवन की सुविधाओं के लिए तरस गए हैं. जबकि सरकार दावा करती है कि उसकी प्राथमिकता गांवों का विकास है.

अभी चंद दिन पूर्व राजधानी में आयोजित युवा सम्मान समारोह में मुख्यमंत्री एवं सरकार के अन्य नुमाइंदों की मौजूदगी में प्रतिभाशाली युवाओं ने कहा- वे गांवों में मूलभूत सुविधाएं चाहते हैं और इसके लिए वे आगे चलकर अपने स्तर पर प्रयत्न करेंगे. वे ऐसा छत्तीसगढ़ चाहते हैं जहां हर गांव में स्कूल व अस्पताल हो. जिला दंतेवाड़ा के ग्राम बुरगुम के किशोर वय के भारत कुमार ने कहा उनके गांव में सिर्फ कक्षा 8वीं तक स्कूल है. गांव में बिजली नहीं, सड़क कच्ची है और पानी के नाम पर केवल हैंडपम्प है. अपनी प्रतिभा के दम पर गांवों से उच्च शिक्षा के लिए निकले प्राय: सभी युवाओं का एक ही दर्द है- उनके गांवों की बदहाली. ग्रामीण युवाओं के विचारों से जाहिर है नया राज्य बनने के बावजूद 16 वर्षों में गांवों की हालत बदली नहीं है.

अब राज्य सरकार 12 दिसम्बर को राजधानी में एक विराट सम्मेलन करके युवाओं से जानना चाहती है कि गांव की जरूरतें क्या हैं और उनके क्या सुझाव है. गोया सरकार के बड़े-बड़े अफसर, राज्य के विधायक, नेता और प्रदेश पार्टी का नेतृत्व नहीं जानता कि गांवों की समस्याएं क्या हैं और सरकार को क्या करना चाहिए. जाहिर है, 12 दिसम्बर का सम्मेलन राजनीतिक है और पार्टी की नज़र में वे 34 लाख युवा हैं जिनके वोट उसके लिए कीमती हैं. सरकार उनके मुख से अपनी उपलब्धियां भी सुनना चाहती है. इसलिए इस सम्मेलन का गांवों के विकास से कोई लेना-देना नहीं है.

बहरहाल बात फिर घूम फिरकर वहीं आ जाती है कि सरकार ने इन 13 वर्षों में गांवों के लिए क्या किया? क्यों नहीं तस्वीर बदली? अरबों रुपए खर्च हो गए. कहां गए वे? मलेरिया, पीलिया जैसे रोगों से अभी भी ग्रामीण क्यों मरते हैं? किसानों को उनकी उपज का सही मूल्य क्यों नहीं मिलता? क्यों लुडेग, पत्थलगांव के किसानों को अपने टनों टमाटर सड़कों पर फेंकने पड़ते हैं जबकि तीन दशक पूर्व म.प्र. के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने जशपुर, रायगढ़ क्षेत्र में टमाटर की भारी पैदावार को देखते हुए वहां फूड प्रोसेसिंग यूनिट की स्थापना करने की घोषणा की थी. छत्तीसगढ़ नया राज्य बन गया, 15 वर्ष बीत गए किंतु एक अदद प्लांट वहां स्थापित नहीं हो सका जबकि सरकार फूड प्रोसेसिंग को बढ़ावा देने की बात करती रही है.

बस्तर में नक्सल समस्या के चलते स्वीकृत डेढ़ सौ से अधिक सड़कें पिछले कई वर्षों से नहीं बन पा रही हैं. कल्पना की जा सकती है, वनांचलों के सैकड़ों गांवों की स्थिति क्या होगी जहां पहुंच मार्ग ही नहीं है.

छत्तीसगढ़ के गांवों की और भी मूलभूत समस्याएं हैं जबकि प्रत्येक वर्ष मुख्यमंत्री दर्जनों गांवों का दौरा करते हैं, गांवों से जनप्रतिनिधि विधानसभा एवं पंचायतों के लिए निर्वाचित होते हैं, छोटी-बड़ी तमाम किस्म की योजनाएं बनती है किंतु गांवों की तस्वीर नहीं बदलती. भूखमरी, बेरोजगारी, प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य तथा जीवन की अन्य कठिनाइयां और दरिद्रगी छत्तीसगढ़ के गांवों की अभी भी मूल पहचान है.

राज्य स्थापना दिवस पर हर वर्ष सरकारी उत्सवों के बीच यह पहचान गुम हो जाती है, गुम कर दी जाती है पर जाहिर है समाप्त नहीं होती.

*लेखक हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!