छत्तीसगढ़: बीजों का उपचार जरूरी

रायपुर | संवाददाता: मानसून पूर्व की बारिश के साथ ही छत्तीसगढ़ में धान की छुटपुट बोनी शुरू हो गई है. सिंचाई सुविधा वाले किसान धान का थरहा डालने का काम तेजी से कर रहे हैं. उधर कृषि वैज्ञानिकों और कृषि विभाग के अधिकारियों ने किसानों को बीजों को उपचारित कर बोने और थरहा डालने की सलाह दी है.

इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर के कृषि वैज्ञानिकों ने बताया कि जैसे बच्चों को बीमारियों से बचाने के लिए टीकाकरण किया जाता है, वैसे ही फसलों को स्वस्थ रखने, कीट व्याधियों से बचाने और अच्छी पैदावार के लिए बीजों का उपचार करना जरूरी है. बीज उपचार की प्रक्रिया बहुत सरल और आसान है.


कृषि वैज्ञानिकों ने बताया है कि खरीफ में बोई जाने वाली फसलों के बीजों का उपचार करने के लिए किसानों को एफ.आई.आर. क्रम अपनाना चाहिए. बीजों को बोने से पहले फफूंद नाशक तथा कीटनाशक दवाओं से उपचारित करना चाहिए. इसके बाद जैविक कल्चर से उपचारित करना फायदेमंद होता है. बीजों को उपचारित करने के बाद लगभग आधा घण्टा छांव में रखना चाहिए.

कृषि बुलेटिन में यह भी बताया गया है कि धान की श्रीविधि बोनी से कई लाभ किसानों को मिलते हैं. इस विधि से खेती करने से प्रति इकाई क्षेत्रफल में अधिक उत्पादन होता है. इससे धान की बीज की काफी बचत होती है तथा सिंचाई के लिए उपयोग होने वाले पानी की 40 प्रतिशत तक बचत हो जाती है. श्रीविधि से धान की अच्छी बढ़वार भी होती है. कृषि विभाग के अधिकारियों ने बताया कि जैविक खेती के लिए उपयोग होने वाले जैव उर्वरक (राईजोबियम कल्चर, पी.एस.बी., एजेटोबेक्टर तथा नीलहरित) जिलों में स्थित कृषि विज्ञान केन्द्रों से भी प्राप्त कर सकते हैं.

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