गढ़ छत्तीसी का मल्ल युद्ध

कनक तिवारी

कांग्रेस की यात्रा पर नक्सली हमले के बाद शुरु हुआ यह गढ़ छत्तीसी का मल्ल युद्ध है. बस्तर की दरभा घाटी में माओवादियों द्वारा कत्ल किए गए कांग्रेस कार्यकर्ताओं, नेताओं और नागरिकों की स्मृति में कांग्रेस भवन रायपुर में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने आक्रोश, भावुकता और आक्रमण-मुद्रा का प्रदर्शन किया. जोगी के चुनौतीपूर्ण आह्वान को निजी तल्खियों के अनुभव विवरणों की राजनीतिक- सामाजिक पृष्ठभूमि में पढ़ना होगा. ‘छत्तीसगढ़ में किसी बाहर के गढ़ के नेता की जरूरत नहीं है……….नजफगढ़, प्रतापगढ़ या और कोई गढ़‘ जोगी ने कहा था.


रामास्वामी नायकर के आन्दोलन के बाद धीरे धीरे दलित चेतना का चेहरा तराशा गया है. आज वह दलित साहित्य में सबसे ज्यादा मुखर है. अमरीकी नीग्रो से लेकर स्लमडॉग मिलेनियर तक करुणा का वह सागर हिलोरें ले रहा है. सामाजिक समुद्र मंथन का अमृत तो सवर्णों ने पिया और जहर दलितों के हलक में ठूंस दिया. राजनीति में धोखे के कई अवसर पहले भी आए हैं.

जगजीवन बाबू काबिलियत के आधार पर प्रधानमंत्री बन सकते थे, लेकिन बाजी लगी मोरारजी देसाई की. शिवभानु सोलंकी को गुप्त मतदान में अर्जुनसिंह से ड्योढ़े मत मिले, लेकिन उन्हें उप मुख्यमंत्री बनाया गया. वसंतराव उइके जैसे काबिल राजनेता को उनका यथेष्ट नहीं मिला.

गणेशराम अनंत में दमखम था, तो वे टिके रहे. रेशमलाल जांगड़े की कर्मठता और ईमानदारी को कितने लोग जानते हैं. मिनीमाता ने लोगों का उपकार किया, क्या उन्होंने कभी समाज को इसका आत्मप्रशंसक ब्यौरा दिया? क्यों अरविंद नेताम ने कांग्रेस छोड़कर बसपा का दामन थामा? नेताम भटके नहीं होते तो छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री होने का उनका दावा होता.

मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह की जोगी पर नजर पड़ी. कलेक्टरी छोड़कर उन्हें राज्यसभा पहुंचाया गया. आक्रामक तेवर तो जोगी के जीन्स में ही हैं. अपने वरिष्ठ नौकरशाह डी. जी. भावे, मुख्यमंत्रीद्वय मोतीलाल वोरा और दिग्विजय सिंह तथा कई शीर्ष नेताओं से उलझने की जोगी की फितरत रही है. सभी मुख्यमंत्रियों के अंदर बैठा शासक छत्तीसगढ़ को अपना उपनिवेश समझता रहा. ब्राह्मण-ठाकुर संघर्ष में दलितों को मोहरा बनाया जाता रहा.

हलवाई मलाई खाते हैं और कर्मचारियों को खुरचन खाने की अनुमति देते हैं. रविशंकर शुक्ल, द्वारिकाप्रसाद मिश्र, श्यामाचरण शुक्ल, विद्याचरण शुक्ल जैसे कुलीनों ने बगावतें भी की हैं. खुद इंदिरा गांधी ने कांग्रेस के बहुमत को चुनौती दी थी. तब इंदिरा जी के साथ श्यामाचरण शुक्ल और मोतीलाल वोरा नहीं गए थे. बाद में उदार गांधी परिवार के उपकृत बने. गोविन्दनारायण सिंह ने बगावत का झंडा लेकर सरकार को पलट दिया था.

दिग्विजय सिंह चपलता, ठहाकों और हाथी जैसी स्मरण शक्ति के लिए लोकप्रिय हैं. हजारों कांग्रेस कार्यकर्ताओं के नाम उनकी जबान पर होते हैं. जोगी मुस्कराते ज्यादा हैं और दिग्विजय सिंह ठहाके लगाते हैं. दिग्विजय मुस्कराते हैं तो समझो वह बात उन्हें स्वीकार नहीं है. अपने दूसरे मुख्यमंत्रीकाल में दिग्विजय सिंह ने नौकरशाही पर आंख मूंदकर भरोसा किया. अन्यथा सरकार नहीं जाती. जोश में दस वर्षों के लिए चुनाव नहीं लड़े.

पिछले वर्षों में कांग्रेस की राजनीति में उनका कद बढ़ता गया है. हर मुद्दे पर अनधिकृत बयान देने के कारण देश की गृहणियां तक दिग्विजय को गंभीरता से नहीं लेतीं. दिग्विजय और जोगी भी अनुयायी चाहते हैं, साथी नहीं. नंदकुमार पटेल और उदय मुदलियार की हत्याओं से दिग्विजय सिंह का निजी नुकसान भी हुआ है. अर्जुन सिंह के शिष्यों के रूप में भी जोगी और दिग्विजय की कभी नहीं पटी. जोगी के लिए छत्तीसगढ़ ही मध्यप्रदेश रहा है. दिग्विजय के लिए छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश में रहा है. दोनों मूलतः इंजीनियर हैं. हमउम्र हैं. अंग्रेजी और हिंदी पर दोनों का अधिकार है. दोनों को प्रशासनिक दांवपेंच के गुर आते हैं. दुर्भाग्य ने अजीत जोगी के शरीर पर फालिज गिरा दी है. इसके बावजूद आत्मविश्वास के साथ उनका सक्रिय रहना कुदरत को ही चुनौती है.

विंध्यप्रदेश में चुटकुला मशहूर है कि काला ब्राह्मण और मीठा ठाकुर दोनों खतरनाक होते हैं. विश्वनाथ प्रताप सिंह, अर्जुन सिंह, वीरबहादुर सिंह, दिनेश सिंह, नटवर सिंह, कर्ण सिंह, दिग्विजय सिंह सफल मिसालें हैं. क्षत्रिय शासक दबंग होता है तो उसकी भोली रणनीति को पढ़ना संभव होता है. इसीलिए गोविंदनारायण सिंह, दिलीप सिंह जूदेव और शिवेन्द्र बहादुर सिंह वगैरह को वह नहीं मिला जो विनम्र होने पर मिल सकता था.

जोगी का मुख्यमंत्रीकाल विवादास्पद, दुर्भाग्यजनक और बाहरी तत्वों के हस्तक्षेप का रहा है. रामलखन सिंह यादव जैसे पुलिसिया नौकरशाह ने छत्तीसगढ़ को बिहार की तरह जातीय अखाड़ा बनाने की हिमाकत की. रामअवतार जग्गी की निन्दनीय हत्या राजनीतिक परिणाममूलक घटना बनी. आदिवासी नेताओं ने यह तय नहीं होने दिया है कि आदिवासी होने का जोगी का दावा सच्चा है. छत्तीसगढ़ कांग्रेस में सबने मिलकर जोगी से उसी तरह सलूक किया है जैसे सभी मंत्रालयों का मिलकर वित्तीय बजट बनता है. रेल मंत्रालय का अलग बजट होता है.

नरेन्द्र मोदी का प्रधानमंत्री, जोगी का मुख्यमंत्री और एक छत्तीसगढ़िया गांधीवादी सरकारी अधिकारी का पद्मश्री पाने का सपना है. वे सक्रिय भी हैं. इसमें बुराई क्या है? जोगी परिवार की सक्रियता प्रतिद्वंद्वियों के लिए खतरे की घंटी तो है ही. चुटकुला यह भी है कि जोगी डी. एम. के बाद सी. एम. बनकर एडजस्ट नहीं कर पाए थे.

उनके समर्थक जिंदाबाद के इतने चीत्कार करते हैं कि अनुशासन को दुम दबानी पड़ती है. हर सभा में जोगी देर से जाते हैं और सभा का कचूमर निकालकर जल्दी निकल आते हैं. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तक के सामने चहेतों ने रंगमंदिर में जोगी जिंदाबाद के नारे लगाकर सभा को ही भंगमंदिर बना दिया.
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