जोगी और चंदू

दिवाकर मुक्तिबोध
इसमें जरा भी संदेह नहीं कि अजीत जोगी कुशल रणनीतिकार हैं. चुनावी शतरंज की बिसात पर वे अपने मोहरे कुछ इस तरह चलते हैं कि प्रतिद्वंद्वी की सारी आक्रामकता हवा हो जाती है और उसका पूरा ध्यान मात से बचने में लग जाता है. महासमुंद में यही हो रहा है.

अजीत जोगी के सामने भाजपा के चन्दूलाल साहू हैं जिन्हें अपनी सीट बचाने की चिंता है. जोगी हैं कि शह पर शह देते जा रहे हैं.

अपनी उम्मीदवारी की अधिकृत घोषणा होते ही अजीत जोगी ने पहला पांसा फेंका. उनके राजनीतिक इशारे को समझते हुए महासमुंद से एक-दो नहीं 10-10 चन्दूलाल साहुओं ने नामांकन दाखिल किया और उसके बाद वे गायब हो गए. लौटे तभी जब नाम वापसी की तारीख निकल गई.

अब महासमुंद में भाजपा के चंदूलाल साहू के हमनाम 10 उम्मीदवार हैं जो कुछ और नहीं तो कुछ हजार वोट तो खराब कर ही सकते हैं. जोगी की रणनीति का यह कोई नया दांव नहीं है. इस तरह के चुनावी हथकंडे पहले भी आजमाये जाते रहे हैं.

नवम्बर 2013 में सम्पन्न हुए राज्य विधानसभा चुनाव में बृजमोहन अग्रवाल के रायपुर दक्षिण से 19 मुस्लिम प्रत्याशियों को खड़ा कर दिया गया था. इसका मकसद सिर्फ इतना ही है कि मतदाताओं के सामने भ्रम की स्थिति पैदा कर जाति विशेष के वोट विभाजित किए जाएं.

लोकसभा चुनाव में चूंकि बड़ी संख्या में मतदाता ग्रामीण अंचलों से होते हैं इसलिए वे भ्रम के शिकार हो सकते हैं. और होते भी हैं. इस चुनाव में उम्मीदवारों को लेकर महासमुंद जैसी स्थिति राज्य के और किसी लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में नहीं है. जाहिर है, यह चुनावी रणनीति का हिस्सा हैं.

हालांकि जोगी भाजपा के इस आरोप से इंकार करते हैं कि उनके इशारे पर चंदूलाल साहूओं को निर्दलीय के रूप में खड़ा किया गया है. लेकिन कहा जा रहा है कि यह उनकी सुविचारित नीति के अनुसार ही है. इससे भाजपा प्रत्याशी को कुछ हजार वोटों का नुकसान होना तय है. यद्यपि औसतन 17-18 लाख मतदाताओं की भारी-भरकम संख्या में कुछ हजार वोटों का कोई मूल्य नहीं है पर यह नहीं भूलना चाहिए कि जब फैसला बहुत कम वोटों के अंतर से होता है तो विभाजित वोट मायने रखते हैं.

इस सन्दर्भ में सन् 1991 में रायपुर से कांग्रेस की टिकट पर निर्वाचित पूर्व केन्द्रीय मंत्री एवं राज्य के प्रभावशाली नेता विद्याचरण शुक्ल का हवाला दिया जा सकता है जो भाजपा के रमेश बैस के खिलाफ मात्र 981 वोटों से जीत पाए थे.

बहरहाल महासमुंद लोकसभा के साहू वोटों को विभाजित करने की यह जुगत किसके कितनी काम आएगी, फिलहाल कहा नहीं जा सकता लेकिन जोगी जानते हैं जातिगत समीकरण का हर चुनाव में महत्व होता है. चूंकि इस लोकसभा क्षेत्र में साहू मतदाता बड़ी संख्या में हैं, और यदि उनका ध्रुवीकरण होता है तो जोगी मुसीबत में पड़ सकते हैं इसीलिए वे राजनीति की तरकश के अपने सारे तीर आजमाना चाहते हैं.

अपने जनसम्पर्क अभियान एवं ग्रामीण सभाओं में वे अपने भाषणों के जरिए मतदाताओं को लुभाने की भरपूर कोशिश करते हैं. मसलन वे अपने आप को ग्रामीणों का ‘कमिया’ बताते हैं यानी उनके लिए मेहनत मजदूरी करने वाला.

सन् 2004 के राज्य विधानसभा के चुनाव के दौरान जब वे मुख्यमंत्री थे, उस समय भी उनके बोल यही थे. अपनी लच्छेदार बातों से वे मतदाताओं की भावनाओं को पंख देते हैं. इसीलिए महासमुंद में उन्हें ‘मायावी’ कहा जाता है जिसके सम्पर्क में जो भी आता है, वह उनका हो जाता है.

वाकपटुता में माहिर जोगी अपने निकटतम भाजपा प्रतिद्वंद्वी से बहुत आगे हैं. उन्होंने साहू वोटरों में सेंध लगाने के साथ-साथ पिछड़े वर्ग के गैर साहू वोटों पर ध्यान केन्द्रित किया है. जो आमतौर पर साहू प्रत्याशी के विरोध में वोट करते हैं.

सरायपाली, बसना, बिन्द्रानवागढ़, खल्लारी के अनुसूचित जाति-जनजाति के वोटों पर भी उन्हें पूरा भरोसा है. कांग्रेस के इस वोट बैंक पर व्यक्तिगत रूप से जोगी की पकड़ अच्छी है. यद्यपि महासमुंद लोकसभा की 8 विधानसभा सीटों में से 6 पर भाजपा का कब्जा है और एक निर्दलीय विधायक भी भाजपा के पक्ष में काम कर रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद जोगी निश्चिंत हैं क्योंकि कार्यकर्ताओं की फौज के साथ-साथ उन्हें अपने चुनाव प्रबंधन पर भी पूरा भरोसा है जो नैतिक-अनैतिक की परवाह नहीं करतीं.

राजनीतिक हैसियत की दृष्टि से भी जोगी अपने प्रतिद्वंद्वी पर भारी हैं. उनके लिए एक और अच्छी बता है कि मोदी फैक्टर का क्षेत्र में असर नहीं है अलबत्ता राज्य सरकार के जनहितकारी फैसलों से मतदाता जरूर प्रभावित हैं. यानी यहां रमन फैक्टर ज्यादा असरकारक है. इसीलिए जोगी ने ‘भावनात्मक दोहन’ को अपना प्रमुख हथियार बना रखा है. उनकी शारीरिक असशक्तता भी उनके प्रति आकर्षण का भाव पैदा करती है क्योंकि व्हील चेयर पर बैठा व्यक्ति राजनीतिक रूप से मजबूर नहीं मजबूत है, यह उन्होंने सिद्ध किया है.

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