ओम पुरी कभी नहीं आयेंगे

आलोक प्रकाश पुतुल
“मैं दो महीने के लिये अज्ञातवास में जाना चाहता हूं, जहां केवल अनजाने लोगों से मुलाकात हो. मुझे जानने वाला वहां कोई भी न हो.”

अभी पिछले पखवाड़े की ही तो बात है, जब ओम जी ने फोन करके यह बात कुछ मित्रों से साझा की थी. उन्होंने फोन पर उत्साह से बताया कि आज ही खंडाला वाले बंगले में 64 अमरुद के पौधे लगाये हैं. अब जब मुंबई आओगे तो वहीं रहने चलेंगे.


फिर उन्होंने धीरे से उलाहना भी दिया-“आप बहुत व्यस्त रहते हैं जनाब, व्यस्तता कम करिये, तब तो आ पायेंगे.” फिर धीरे से छेड़ा-“अपनी टूटी हुई टांग का ख्याल रखियेगा और गाड़ी चलाते समय नजर सामने रखा करें, अपने आस-पास जा रहे लोगों पर नहीं.”

तय हुआ कि वो जल्दी ही छत्तीसगढ़ आयेंगे. हमारी बातचीत सुन रहे फ़िल्मकार साथी देवेंद्र शुक्ला ने कहा कि जब ओमपुरी जी छत्तीसगढ़ आयेंगे तो अपनी फ़िल्म में ओम जी से ही वाइस ओवर करवायेंगे.

लेकिन अब ओमपुरी कभी नहीं आयेंगे.

दो साल पहले की बात है. एक दोपहर मैंने उनसे कहा कि कुछ अलग बातचीत करते हैं. जीवन के अफसोस, ईश्वर, जीवन, दर्शन, मृत्यु… उन्होंने छूटते ही कहा- “मृत्यु का भय नहीं होता, बीमारी का भय होता है. जब हम देखते हैं कि लोग लाचार हो जाते हैं बीमारी की वजह से और दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं. उससे डर लगता है. मृत्यु से डर नहीं लगता. मृत्यु का तो आपको पता भी नहीं चलेगा. सोए-सोए चल देंगे. यह आपको पता चलेगा कि ओम पुरी का कल सुबह 7 बजकर 22 मिनट पर निधन हो गया.”

ओमपुरी ने यह कहा और हंस पड़े. लेकिन कमरे में बैठी उनकी पहली पत्नी सीमा कपूर समेत दूसरे सभी लोग उनके कहे के बाद चुप हो गये थे. कमरे में एक सन्नाटा पसर गया था.

उनसे अलग-अलग मुद्दों पर घंटों-घंटों बातचीत होती थी. कभी औपचारिक तो कभी अनोपचारिक रुप से. बहुत बार फ़ोन पर. पहली बार धनबाद में उनसे मिला था, कोई 25 साल पहले. फिर रायपुर में. मेरे दोस्त आलोक श्रीवास्तव हमारे अनुरोध पर उन्हें लेकर रायपुर आये थे. रिश्तों में गरमाहट ऐसी कि कभी लगता ही नहीं था कि हमारे हिस्से में ओमपुरी जैसा महान कलाकार है. दुनिया भर में अपने अभिनय का लोहा मनवाने वाले ओमपुरी जब परदे से बाहर होते तो खालिस ओमपुरी होते थे, जिन्हें लगता था कि जीवन में सब कुछ खुला हुआ होना चाहिये, साफ़ पानी की तरह पारदर्शी.

शायद यही कारण था कि वो जल्दी ही किसी से भी घुल-मिल जाते थे. अपने मन का व्यक्ति मिला तो रिश्ता निभाने में कोई कसर कभी नहीं छोड़ते. गजब के यारबाज ! वो दुनिया के दूसरे हिस्से में हों और आपको याद से फ़ोन कर के कहें- हैप्पी बर्थ डे टू यू डियर! इस रिश्ते पर किसका मन न भीग जाये !

वे जब भी कोई काम करते थे तो उनकी कोशिश होती थी कि मुद्दे को बेहतर तरीके से समझा जाये. प्रकाश झा की चक्रव्यूह फ़िल्म और नक्सलवाद को लेकर उनसे कोई तीन घंटे बात हुई होगी. रायपुर में तब वे कंजरवेशन कोर सोसायटी के फ़िल्म फेस्टिवल में पहुंचे थे. बात आई-गई हो गई. गरमी में उनका फ़ोन आया- “मैं मिर्जापुर में हूं, माओवादियों से संबंधित एक फ़िल्म की शूटिंग के लिये. मुझे चारु मजूमदार के उस पेपर को समझाइये, जिसका जिक्र आप उस दिन कर रहे थे.” वो सवाल पूछते रहे और मैं अपनी समझ के अनुसार उन्हें जवाब देता रहा. अगले दिन फिर यह सिलसिला चला.

छत्तीसगढ़ में माओवादियों और पुलिस के संघर्ष को लेकर वो बहुत दुखी थी. उनका कहना था कि इस लड़ाई में केवल गरीब आदमी मारा जा रहा है. ओमपुरी का मानना था कि माओवादी शोषण और अत्याचार के विरुद्ध लड़ने वाले योद्धा हैं लेकिन हथियार से अलग भी उन्हें लड़ाई के दूसरे रास्ते अख्तियार करना चाहिये. उनका मानना था कि हथियार से कोई भी हल नहीं निकल सकता. शायद यही कारण था कि वो बार-बार गांधी के रास्ते पर जाने की बात करते थे.

गांधी को लेकर उनकी समझ बहुत साफ थी और उन्होंने कई बार यह कहा है कि वर्धा जैसी जगहों को तीर्थ की तरह देखा जाना चाहिये. ओमपुरी कहते थे-“हमने देवताओं को, पैगंबरों को नहीं देखा. उनके होने और इतिहास को लेकर बहुत से विवाद हैं. लेकिन गांधी हमारे समय के हैं, जिनका सबकुछ हमारा जाना-समझा है. हमें अपने बच्चों को इस देवता के काम से मिलवाना चाहिये.”

ओमपुरी गांधी नहीं थे, हो भी नहीं सकते थे. वे गांधीवादी भी नहीं थे. लेकिन पिछले कुछ सालों में आसपास घिरते अवसाद के घने बादल उन्हें गांधी की तरफ धकेल रहे थे. मौन और एकांत की तरफ़ जाने की सोच और कोशिश और फिर-फिर शोर की तरफ़ लौट जाने का उनका अंतरद्वंद्व किसी से छुपा नहीं है. लेकिन यह अंतरद्वंद्व जान ले लेता है, यह कहां जानते थे हम सब! अलविदा ओम जी !

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