छग में पशुधन का विकास बिहार से कम

रायपुर | संवाददाता: 5 वर्ष में छत्तीसगढ़ में पशुओं की संख्या में महज 4.34 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. इसकी जानकारी बुधवार को केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह द्वारा ‘19वीं पशु गणना-2012’ की रिपोर्ट जारी किये जाने से हुई है. इससे पहले पशु गणना वर्ष 2007 में हुआ था. जाहिर है कि पशुओं की संख्या या पशु धन में बढ़ोतरी का आकड़ा पिछले 5 वर्षो की तुलना में है. गौर करने वाली बात यह है कि छत्तीसगढ़ में मनुष्यों की आबादी पिछले 10 वर्षों में 17.64 फीसदी बढ़ी है.

इसके उलट गुजरात में पशुओं की संख्या 15.36 फीसदी, उत्‍तर प्रदेश में 14.01 फीसदी, असम में 10.77 फीसदी, पंजाब में 9.57 फीसदी, बिहार में 8.56 फीसदी, सिक्किम में 7.96 फीसदी तथा मेघालय में 7.41 फीसदी हुई है. हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर पशुओं की संख्या में वर्ष 2007 की तुलना में 3.33 फीसदी घटी है.


गौरतलब है कि बिहार जैसे राज्य में वर्ष 2007 की तुलना में पशुओं की संख्या दुगनी बढ़ी है. वहीं, गुजरात तथा उत्तर प्रदेश में छत्तीसगढ़ की तुलना में पशुओं की संख्या में तीन गुना बढ़ोतरी हुआ है. यहां तक की सिक्किम और मेघालय में पशुओं की संख्या में बढ़ोतरी की दर छत्तीसगढ़ से ज्यादा है.

उल्लेखनीय है कि पशुओं की संख्या का सीधा संबंध अर्थव्यवस्था से है. इन पशुओं में गाय, भैंस से लेकर मुर्गिया तक शामिल हैं. पशुओं की संख्या में बढ़ोतरी का तात्पर्य है कि राज्य में दूध, दही, पनीर तथा अंडे और चिकन जैसी खाद्य पदार्थो का उत्पादन बढ़ना है. सबसे बड़ी बात है कि गांव के किसान से लेकर शहरों के डेयरियों में गाय तथा भैंसो को पाला जाता है. मुर्गी पालन का व्यवसाय किया जाता है. जिससे छोटे किसानों से लेकर मध्यम श्रेणी के व्यापारियों को रोजगार मिलता है.

इस प्रकार से कहा जा सकता है कि पशुओं के कारण डेयरी तथा कुक्कट पालन जैसे लघु और मध्यम श्रेणी के उद्योग चलते हैं. इसी कारण से इनके संख्या में कितनी बढ़ोतरी का अर्थ है राज्य के बाशिंदों की क्रय शक्ति बढ़ रही है. बुधवार को केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह द्वारा पेश किये गये आकड़ों के अनुसार देश के 8 राज्यों में पशुओं की संख्या में बढ़ोतरी हुई है जिसमें हमारा छत्तीसगढ़ सबसे नीचे के पायदान पर खड़ा है.

देश में पशुओं की गणना वर्ष 1919 में शुरू हुई थी और उसके बाद से ही हर पांच साल में यह कवायद की जाती है. नीति बनाने में इन आंकड़ों का इस्‍तेमाल किया जाता है और नियोजन एवं अनुसंधान कार्यों में भी इस‍की व्‍यापक उपयोगिता है. 19वीं पशु गणना वर्ष 2012 में की गई थी, जिसमें सभी राज्‍यों एवं केंद्र शासित क्षेत्रों ने हिस्‍सा लिया था. इस गणना में देश भर के सभी गांवों और शहरों के वार्डों को कवर किया गया था.

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