खामोश, सिप्रोसीन से मौतें जारी हैं!

रायपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ में प्रतिबंधित दवा खाने से बलौदा बाजार के लक्ष्मी साहू की मौत हो गई है. मृतक लक्ष्मी साहू बलौदा बाजार के हसुआ गांव का रहने वाला था जिसने बुखार होने पर गांव के एक झोलाछाप डॉक्टर से ईलाज कराया था. उक्त झोलाछाप डॉक्टर ने लक्ष्मी साहू तथा उसके पत्नी अमरीका साहू को सिप्रोसीन की गोली खाने के लिये दी थी. बताया जा रहा है कि लक्ष्मी साहू ने सिप्रोसीन की छः गोलिया खाई थी तथा उनकी पत्नी अमरीका साहू ने केवल दो गोली खाई थी.

गांव में हालत बिगड़ने पर उन्हें रायपुर के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया था जहां लक्ष्मी साहू की मौत हो गई तथा उनकी पत्नी अमरीका साहू आईसीयू में भर्ती है. उल्लेखनीय है कि इसी सिप्रोसीन की गोली खाने से छत्तीसगढ़ में नसबंदी के बाद 13 तथा कुल मिलाकर 18 लोगों की मौते हो चुकी हैं.


छत्तीसगढ़ सरकार ने इस दवा को प्रतिबंधित कर दिया है तथा उसकी बड़े स्तर पर जब्तिया भी सरकारी अमले के द्वारा की गई थी. जाहिर है कि इन जब्तियों के जद में झोलाछाप डॉक्टर आने से बच गये तथा उनकी नादानियां अब तक राज्य में जाने ले रहीं हैं.

छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल ने बीबीसी के हवाले से बताया कि, “हमने इस मामले में दवा बेचने वाले और इलाज करने वाले डॉक्टर को गिरफ्तार करने और उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई के निर्देश दिए हैं.”

तमाम सरकारी प्रतिबंध तथा जब्तियों के बीच इस चीज को समझने की जरूरत है कि दवाओं की मार्केटिंग कैसे की जाती हैं. दवाएं ही शायद एकमात्र ऐसी वस्तु है जो बिल के आधार पर अपना सफऱ जारी रख सकती हैं. भले ही उसका उपभोक्ता याने की मरीज उसे बिल कटवाकर खरीदने का झंझट नहीं पालता है परन्तु बिना बिल के दवाओं के चिकित्सकों, दवा दुकानदारों तथा झोलाछाप डॉक्टरों तक पहुंचना नामुमकिन है. इसी कारण से इनका पता लगाना भी आसान है बशर्ते बीच के किसी कड़ी को गायब न कर दिया गया हो.

गौरतलब है कि दवाओं के बल्क ड्रग मुंबई तथा चेन्नई जैसे बाजारों में उपलब्ध होते हैं. जिन्हें उत्पादक दवा कंपनियां बिल के माध्यम से ही खरीद सकती हैं. बल्क ड्रग को खरीदने के बाद दवा कंपनियां उनसे दवाओं का निर्माण करती हैं तथा अपने डिपो में भेज देती हैं जिसका कि पूरा हिसाब-किताब रखा जाता है. यहां तक की ब्रेकेज तथा एक्सपाइरी दवाओं का भी कंपनिया हिसाब रखती हैं.

दवा कंपनियों के डिपो से ये दवाएं विभिन्न राज्यों में कंपनी के सीएंडएफ एजेंट या डिस्ट्रीब्यूर को भेज दी जाती है. जहां से इसे थोक दवा दुकानों तक पहुंचाया जाता है. थोक दवा दुकानों से इसे दवा दुकानदार तथा चिकित्सकों को बेचा जाता है. आज की तारीख में कुछेक चिकित्सकों के अलावा कोई इसको स्वंय ही बेचने की जहमत नहीं उठाता है.

दवाओं की खरीदी तथा बिक्री की संपूर्ण प्रक्रिया पर केन्द्र तथा राज्य के दवा नियंत्रक नजर रखते हैं.

सिप्रोसीन 500 मिलीग्राम के क्षेत्र में भी ऐसा ही होना चाहिये. इस दवा को राजधानी रायपुर के महावर फार्मा द्वारा बनाया तथा बेचा जाता था. जाहिर है कि सिप्रोसीन को भी डिस्ट्रीब्यूटर , थोक दवा विक्रेता तथा दवा दुकानों के उसी जायज़ जाल के माध्यम से मरीजों तक पहुंचाया जाता था.

यदि रायपुर के महावर फार्मा ने इसे किन-किन थोक दवा दुकानदारों को सप्लाई किया है उसका रजिस्टर जब्त करके उसके अनुसार चला जाता तो अब तक इसकी एक-एक गोली जब्त की जा चुकी होती. यह दिगर बात है कि सरकारी खरीद की जानकारी होने के कारण उसे जब्त किया जा चुका है परन्तु सिप्रोफ्लाक्सासिन गली-गली में बिकने वाली दवा है, इसके लिये महावर फार्मा के विक्रय रजिस्टर के अनुसार जांच किये जाने की जरूरत है. अन्यथा, झोलाछाप डॉक्टरों के पास से उनका उपयोग होता रहेगा तथा छत्तीसगढ़ में सिप्रोसीन से होने वाली मौते नहीं रुक सकती हैं.

आज की तारीख में न तो कोई रजिस्टर्ड डॉक्टर और न ही डेंटिस्ट इसका पर्चा लिखने से रहा और न ही कोई दवा दुकानदार इसे अपने पास रखेगा या बेचेगा. इसके बावजूद बलौदाबाजार के लक्ष्मी साहू की मृत्यु से साफ है कि यह दवा अभी भी झोलाछाप डॉक्टरों के पास उपलब्ध है तथा उपयोग किया जा रहा है. चूंकि, लक्ष्मी साहू सरकारी अस्पताल में आ गया इस कारण से उसका पता चल सका है.

उल्लेखनीय है कि सिप्रोफ्लाक्सासिन, क्यूनोलोन्स ग्रुप की दवा है तथा इसका धड़ल्ले से प्रयोग सर्दी, खांसी, बुखार, दस्त, इंफेक्शन, छोटी-मोटी सर्जरी में किया जाता है.

एक और तथ्य की यहां पर चर्चा कर लेनी चाहिये. वह सत्य यह है कि हमारे देश की जनता दवाओं के मामले में पूरी तरह से निरक्षर है. लोगों के पास न तो इतना समय है कि दवा के एक्सपाइरी डेट को जांच लिया जाये न ही वे अपने द्वारा लंबे समय से उपयोग की जा रही दवा का नाम जानते हैं. मरीजों में इतनी जागरुकता भी नहीं है कि दवा खाने से परेशानी बढ़ने से वापस चिकित्सक के पास जाकर उसकी सूचना दे. यदि एक या दो गोली खाने के बाद लक्ष्मी साहू ने किसी रजिस्टर्ड डॉक्टर के पास इसकी शिकायत की होती तो उसकी जान बचने की संभावना थी.

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