बोलो, लेकिन पोल न खोलो

संजय पराते
‘एसोचैम’ ने छत्तीसगढ़ सरकार के कहने के लिए कुछ न छोड़ा. पानी-पानी कर दिया उसने — सरकार को भी, पार्टी को भी. इतना भी नहीं सोचा कि जिस सरकार के दावे की धज्जियां वह उड़ा रही है, उसे तो उन्हीं की प्रतिनिधि पार्टी चला रही है. आम जनता गरियाए तो समझ में आता है. गरीब बेचारे गरिया ही सकते हैं. रोना-धोना, चिल्ल-पों ही कर सकते हैं. बहुत हुआ तो धरना-प्रदर्शन. उनके गरियाने की हमें चिंता नहीं. चुनावी मौसम आने दो, फिर पटा लेंगे दारू-पैसे से. लेकिन ये उद्योगपति ! इन्हीं की चिंता में दुबले हुए जा रहे हैं, लोगों की लात-गालियां खा रहे हैं, लेकिन ये भी गरियाने पर उतर आये !! टैक्स चोरी के मौके दिए, टैक्स माफ़ किये. गरीब से जमीन छीनकर इनके चरणों में धर दिया. इनके मन-माफिक श्रम कानून बना दिए. बता दिया कि न कोई न्यूनतम मजदूरी होगी और न काम के घंटे तय होंगे. कह दिया कि काम करना है तो करो, विकास में भागीदार बनना है तो बनो, वर्ना छुट्टी !!! फिर भी ये अपने न हुए, पराये हो गए. हाय, ये भी उतर आये गरियाने पर. अब क्या अपना गला काटकर इन्हें दे दें?

कह रहे हैं कि छत्तीसगढ़ में निवेश का वातावरण नहीं है. कागजों में ही काम हो रहा है. अधोसंरचना के विकास पर कोई ध्यान नहीं. बता रहे हैं कि कृषि क्षेत्र में गिरावट तो आई ही है, उद्योगों के साथ ही निर्माण व रियल स्टेट के क्षेत्र में भी गिरावट आई है. अरे भाई, जब कंट्री बिल्डिंग का काम आज तक कागजों में हो रहा है, तो स्टेट की प्लानिंग भी तो कागजों में ही बनेगी. पता नहीं, इन पूंजीपतियों को कागजों से क्यों इतना बैर हो गया है? बड़े-बड़े निर्माण कागजों में ही करके हमने इन पूंजीपतियों की जेब में डाले. अब भी पूरी-पूरी कोशिश कर रहे हैं कि गांठ से न जाये और तिजोरी में लबालब आये. इतना भी नहीं समझते कि कागजों के काम को पूरा करने लगे, तो न हम फूलेंगे, न ये फलेंगे. बस ‘अधो-संरचना, अधो-संरचना’ चिल्लाए जा रहे हैं.


आखिर बड़े लोगों की ‘समझ’ इतनी छोटी क्यों होती हैं? इन्हें इतनी भी समझ नहीं कि कृषि में विकास दर घटी नहीं है, घटाया गया है और इसे घटाने में हमने कितनी मेहनत की है. इसे घटाया ही इसलिए गया है कि ये लोग बढे. अब ये कह रहे हैं कि हमारे पास कोई नीति नहीं है. ‘नीति-नीति’ अभी तक केवल कम्युनिस्ट ही चिल्लाते थे, इसलिए कि उनके पास कोई नेता नहीं है. अब यदि ‘एसोचैम’ चिल्लाने लगे, तो दीवार पर सिर पटकने का मन करता है. क्या उन्हें पता नहीं कि हमारे पास नेता भी है और नीति भी. स्पष्ट नीति है हमारे पास — दूरदृष्टि वाली, पक्के इरादे के नेता के साथ. कृषि भूमि कम होगी, तो रियल स्टेट का कारोबार बढ़ेगा. इससे निर्माण धंधों में तेजी आएगी. गांवों के किसान यदि मजदूर बनेंगे, तो इस धंधे में सस्ते मजदूर मिलेंगे. मजदूरी सस्ती होने से लागत कम होगी और मुनाफा भारी. खेती छोड़कर जब ये मजदूर बाज़ार में आयेंगे, तो मजदूरी देने में गँवाए पैसे भी घर में ही आयेंगे. इस बरकत से काले धन को भी सफ़ेद किया जा सकेगा — कहीं निवेश के नाम पर, तो कहीं घाटे के कारखाने को फायदे में दिखाकर. कारखाने फायदे में दिखेंगे, तो शेयर के भाव भी खूब उछलेंगे. उछलते शेयरों से फिर हम सब अपनी तिजोरियां भरेंगे. तिजोरियां जितनी बड़ी होंगी, जल-जंगल, जमीन-खनिज पर उतना ही भारी कब्ज़ा होगा. धीमी पड़ी हुई परियोजनाएं आगे बढेंगी, रुकी हुई चलेंगी. इन परियोजनाओं के दौड़ने-चलने से ही देश का ‘विकास’ होगा.

चुनाव में भी हमने यही नारा दिया था — विकास का. सो, हमारी सरकार विकास के लिए पूरा जोर लगा रही है. विकास बढेगा, तो देश बढेगा. यही हमारी स्पष्ट नीति है. इस नीति को आगे बढाने के लिए हम्मरे पास मोदी भी है और रमन भी. दोनों को आगे बढ़ाने के लिए संघ भी है और संघी दल भी.

सो एसोचैम के मालिकों, वामपंथियों-जैसे गिरावट का रोना न रोओ. देखो कि कमजोरी कहां रह गयी है. देखो कि कृषि घटी, तो हमारा धंधा क्यों नहीं चमका? देखो और हमें बताओ कि काले धन के साथ ही विदेशी धन का आना कहां-कैसे रूक गया. कहीं काले धन ने ही तो गुस्सा होकर विदेशी निवेश को नहीं रोक लिया? दोनों में कहीं रिश्तेदारी तो नहीं?? रोओ-धोओ नहीं, हमें बताओ कि तुम्हारे लिए हमें और क्या-क्या करना है, कहां-कहां करना है, कहां-कितना-कैसे काला-पीला करना है??? आखिर हमारा-तुम्हारा जन्म-जन्मांतर का संबंध है. ये हम भी जानते हैं, तुम भी जानते हो. तुम जानते हो की हम तुम्हारे लिए ही बैठे हैं. हम भी जानते हैं कि तुम हमारे मालिक हो. मालिक को नाराज़ करके हम भला बढ़ सकते है? आखिर मालिक की बरकत में ही हमारी भी भलाई हैं. सो मालिकों, बोलो कि मोदी-रमन की इस जोड़ी को और क्या करना है???

बोलो, लेकिन आपस की बात है कि पोल न खोलो. पोल खुलने से वोट खिसकने का डर रहता है.

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