ढोलकल में दुबारा विराजेंगे वही गणेश जी

दंतेवाड़ा | समाचार डेस्क: छत्तीसगढ़ के बस्तर में ढोलकल में गणेश जी की प्रतिमा को फिर से स्थापना की जायेगी. ढोलकल की पहाड़ी से नीचे गिराये गये प्रतिमा के 80 फीसदी टुकड़े मिल गये हैं. पुराविद अरुण शर्मा उसी को जोड़कर गणेश जी की प्रतिमा बनायेगें जिसे ग्रामीण फिर से स्थापित करेंगे. पुराविद अरुण शर्मा द्वारा मुआयना करने पर पता चला कि पहले किसी ने गणेश की प्रतिमा को किसी भारी चीज से तोड़ने की कोशिश की थी. जब प्रतिमा नहीं टूटी तो उसे पहाड़ से ढकेलकर नीचे गिरा दिया गया था.

शनिवार को फरसपाल में पांच गांवों के गांव वालों की बैठक हुई. सभी ने हाथ उठाकर इसकी सहमति दी. बैठक में फरसपाल, आलनार, केशापुर, मिड़कुलनार, गोंदपाल गांव के लोग थे. सभी ने एक स्वर में कहा कि पुरखों के समय से रखी प्रतिमा उसी जगह स्थापित की जाये.


यह बैठक जिला प्रशासन ने ग्रामीणों से रायशुमारी करने के लिये बुलाई थी. इसमें यह तय किया जाना था कि प्रतिमा को पुरानी जगह रखा जाये या संरक्षण के लिए पुरातत्व विभाग को सौंप दिया जाये.

बैठक में जिला पंचायत सीईओ डॉ. गौरव कुमार सिंह ने ग्रामीणों से बारी-बारी से राय ली. रायपुर से आये पुराविद पद्मश्री अरुण कुमार शर्मा ने प्रतिमा जोड़ने के कई पहलुओं पर चर्चा करते हुये कहा कि प्रतिमा का 80 से 85 फीसदी हिस्सा मिलना खुशी की बात है. प्रतिमा को फरसपाल में जोड़ने की बजाय पुरानी जगह पर ले जाकर ही री-सेटिंग की जायेगी.

गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ के बस्तर के ढोलकल के श्रीगणेश की प्रतिमा पहाड़ी से 1500 फीट नीचे नष्ट अवस्था में पाया गया है था. ड्रोन कैमरा की सहायता से इसे शुक्रवार को ढूंढने मे कामयाबी मिल पाई थी. दक्षिण बस्तर के फरसपाल इलाके से सटे घने जंगल और बैलाडिला की पहाड़ी से सटे ढोलकल शिखर पर स्थित प्राचीन श्रीगणेश की प्रतिमा चोरी होने की खबर गुरुवार को सामने आई थी.

पुरातत्ववेत्ताओं के अनुसार ढोलकल शिखर पर स्थापित दुर्लभ गणेश प्रतिमा लगभग 11वीं शताब्दी की है. इसकी स्थापना छिंदक नागवंशी राजाओं ने की थी. यह प्रतिमा पूरी तरह से ललितासन मुद्रा में है. ढोलकल की गणेश प्रतिमा वास्तुकला की दृष्टि से अत्यन्त कलात्मक है.

प्रतिमा में ऊपरी दांये हाथ में परशु, ऊपरी बांये हाथ में टूटा हुआ एक दंत, नीचे का दायाँ हाथ अभय मुद्रा में अक्षमाला धारण किए हुए तथा निचला बायाँ हाथ मोदक धारण किए हुए है. पर्यंकासन मुद्रा में बैठे हुए गणपति का सूँड बायीं ओर घूमता हुआ शिल्पांकित है. प्रतिमा के उदर में सर्प लपेटे हुए तथा जनेऊ किसी सांकल की तरह धारण किये हुए अंकित है. गणपति की जनेऊ के रूप में सांकल का सामान्य चित्रण नहीं है.

इस प्रतिमा में पैर एवं हाथों में कंकण आभूषण के रूप में शिल्पांकित है तथा सिर पर धारित मुकुट भी सुंदर अलंकरणों से संज्जित है. सरसरी निगाह से देखने पर ये प्रतिमा नवीं-दसवी शताब्दी की प्रतीत होती हैं. यह समय चक्रकोटय (प्राचीन बस्तर) की नाग सत्ता का था.

इन स्थलों व यहाँ की तस्वीरों को गंभारता से देखने पर अनुमान लगता है कि आस-पास किसी बडे प्राचीन नगर की उपस्थिति भी अवश्यंभावी है. वह भव्य नाग-कालीन नगर रहा होगा या संभवत: कोई राजधानी जिस के निकट ढोलकल के शिखर पर सूर्य की पहली किरण पड़ती रही होगी एवं फिर नगर में उजियारा फैल जाता होगा. प्रथम-वंदनीय भगवान गणेश की इतनी प्रतिमायें बस्तर भर में नाग शासकों द्वारा बनवायी गयी हैं कि यहाँ भी यह उपस्थिति अनायास प्रतीत नहीं होती.

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