अब बस्तर बदल रहा है

सुरेश महापात्र
बस्तर में नक्सलियों के खिलाफ शनिवार को ललकार रैली निकाली गई. इसमें मध्य व दक्षिण—पश्चिम बस्तर संभाग के हजारों लोगों ने अपनी उपस्थिति दी. हाल ही में गठित एजीएनआई (अग्नि) जिसका पूरा नाम ‘एक्शन ग्रुप फार नेशनल ​इंटिग्रेटी’ है. इसके प्रमुख अधिवक्ता आनंद मोहन मिश्रा के नेतृत्व में नक्सलियों के खिलाफ जनप्रदर्शन हुआ. बस्तर में माओवाद को पैर पसारे करीब चार दशक का समय पूरा हो चुका है. बीते चार दशकों में नक्सलियों के खिलाफ पहली बार नब्बे के दशक में बस्तर के युवा आदिवासी नेता महेंद्र कर्मा ने 1991 में दक्षिण बस्तर में जनजागरण अभियान की शुरूवात की. इस अभियान को लोगों ने हाथों—हाथ लिया. पदयात्रा की शक्ल में गांव—गांव में रैली निकाली गई. लोगों को माओवादियों के खिलाफ जागरूक किया गया.

अभियान के शुरूवाती दिनों में माओवादियों पर जबरदस्त दबाव बढ़ा. पर कुछ ही समय बाद माओवादियों ने अपने संगठन को पहले से ज्यादा मजबूत करते हुए ताबड़—तोड़ हमले किए और जनजागरण में शामिल नेताओं की हत्या शुरू कर दी. जनजागरण अभियान के बाद से महेंद्र कर्मा माओवादियों के टारगेट में रहे 25 मई 2013 को दरभा झीरम घाट पर घात लगाकर उनकी भी हत्या नक्सलियों ने कर दी. यानी प्रथम जनजागरण अभियान के 23 बरस बाद माओवादी अपने संगठन को ललकारने वाले नेतृत्वकर्ता को निशाना बनाने में कामयाब हो सके. इन 23 बरसों में महेंद्र कर्मा कभी पीछे नहीं मुड़े, ना कभी माओवादियों के खिलाफ उनकी सोच में बदलाव आया. यही वजह था कि जब जून 2004 में बीजापुर जिले के अंबेली—करकेली गांवों से ग्रामीणों ने माओवादियों के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की तो एक बार फिर महेंद्र कर्मा ने कमान अपने हाथ में ले लिया. इसे ‘सलवा जुड़ूम’ नाम दिया गया. माओवादियों के खिलाफ यह दूसरा बड़ा अभियान रहा. बीजापुर इलाके से प्रारंभ होकर कोंटा इलाके तक इस अभियान का फैलाव हो सका.


इस अभियान के दौरान नब्बे के दशक में माओवादियों के खिलाफ चलाए गए जनजागरण अभियान की कमियों को दूर कर ज्यादा परिष्कृत रणनीति के साथ लोगों को जोड़ने का काम किया गया. काल्पनिक नेतृत्व सोढ़ी देवा, कलमू दारा और कोरसा मंगू को सौंपा गया. इसके पीछे महेंद्र कर्मा का तर्क यही था कि ‘अपने खिलाफ चलने वाले किसी भी अभियान को फेल करने के लिए माओवादी सबसे पहले नेतृत्वकर्ताओं को निशाना बनाते हैं.’ 2004 में अभियान शुरू हुआ और 2006 तक इसकी आवाज शांत होने लगी. हजारों आदिवासी परिवार अपना गांव छोड़कर कैंप में शरण लेने को बाध्य हो गए. ‘नक्सल समर्थक—नक्सल विरोधी’ के रूप में एक बारिक लकीर खींच दी गई जिसके परिणाम बेहद घातक हुए.

‘सलवा जुड़ूम’ के बाद माओवादियों ने दबाव बढ़ाने वही प्रक्रिया दोहराई जो उन्होंने जनजागरण के बाद किया था. वे ज्यादा बड़े हमले करते हुए पहले से ज्यादा मजबूत हुए. माओवादियों के खिलाफ संचालित होने वाले हर अभियान के बाद नक्सलियों का दायरा बढ़ता गया. हिंसक घटनाओं ने ‘सलवा जुड़ूम’ अभियान को बदनाम किया. हजारों की तादात में स्थानीय ग्रामीण युवा स्पेशल पुलिस आफिसर ‘एसपीओ’ नियुक्त किए गए.

माओवादियों ने इस पूरे अभियान को कठघरे में खड़ा किया और एसपीओ की ज्यादती को लेकर गंभीर आरोप लगाए. सुप्रीम कोर्ट ने ‘सलवा जुड़ूम’ को बंद करने का आदेश दिया. परिणाम फिर वही ‘ढाक के तीन पात’. मौतों के आंकड़े बढ़े. बस्तर राष्ट्रीय—अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में हिंसक घटनाओं के कारण बदनाम हुआ. नक्सलियों ने सुरक्षा जवानों के कैंपों में कई बड़े हमले किए. अभियान के चलते अंदरूनी गांवों से कैंपों में आकर गुजर—बसर कर रहे आदिवासियों के राहत शिविरों में हमले किए. दहशत ने फिर पैर पसारा.

|| दोनों अभियानों के दौर में यह आवाज भी उठती रही कि माओवादियों के खिलाफ अभियान की आड़ में केवल आदिवासियों को झोंका जा रहा है. आम शहरी इसमें शामिल नहीं होकर स्वयं को सुरक्षित करता रहा है.||

बस्तर रेंज में आईजी के रूप में एसआरपी कल्लूरी की पदस्थापना के बाद बस्तर एक बार फिर चर्चा में है. कल्लूरी सरगुजा क्षेत्र के बलरामपुर एसपी रहते हुए माओवादियों के खिलाफ अभियान चलाने में सफल रहे. आज भी इस बात का जिक्र होता रहता है. बस्तर में आईजी के रूप में पदस्थापना से पहले वे डीआईजी दंतेवाड़ा फिर एसएसपी दंतेवाड़ा के रूप में पदस्थ हुए. उनके ​डीआईजी दंतेवाड़ा रहते 6 अप्रेल 2010 को अब सुकमा जिले के ताड़मेटला में माओवादियों ने सीआरपीएफ की एक कंपनी को खत्म कर दिया. माओवादियों के इस हमले में 76 जवान शहीद हुए. छत्तीसगढ़ सरकार की बेहद किरकिरी हुई और जवानों का मनोबल भी बहुत हद तक गिरा. केंद्रीय गृहमंत्रालय ने इसके बाद ईएन राममोहन की एक सदस्यीय कमेटी बनाई. जिसने अपनी जांच रिपोर्ट में लीडरशिप फेल होने और रणनीति में चूक को जिम्मेदार बताया.

ताड़मेटला इलाके में सर्चिंग आपरेशन के दौरान सीआरपीएफ के डीआईजी नलिन प्रभात थे. दंतेवाड़ा के तत्कालीन डीआईजी एसआरपी कल्लूरी और एसपी अमरेश मिश्रा थे. इस हमले के बाद अमरेश मिश्रा का तबादला कर दिया गया और एसआरपी कल्लूरी एसएसपी पोस्ट किए गए. यानी नक्सल मोर्चे पर कल्लूरी लगातार बने रहे. उनके ही कार्यकाल में ताड़मेटला में कथित तौर पर 300 आदिवासियों के घरों में आगजनी का आरोप लगा. तब कलेक्टर आर प्रसन्ना और एसएसपी कल्लूरी के बीच टकराव की स्थिति निर्मित हुई. परिणाम स्वरूप राज्य सरकार ने दोनों का यहां से तबादला करते हुए संतुलन बिठाने की कोशिश की.

इस तरह से बस्तर में आईजी के रूप में एसआरपी कल्लूरी अपनी ​तीसरी पारी संभाल रहे हैं. इस बार वे अपनी पदस्थापना के बाद से ही चर्चा में हैं. यह माना जा रहा है कि राज्य सरकार ने भी उन्हें फ्री हैंड दिया है. परिणाम स्वरूप उनके पसंद के एसपी और जिलों में पुलिस की ​टीम है. बड़ी बात यह है कि पहली बार नक्सल मोर्चे पर नक्सली वास्तव में मात खाते दिख रहे हैं.

केंद्र में पूर्ण बहुमत के साथ आक्रामक नरेंद्र मोदी की सरकार और प्रदेश में तीसरी पारी संभाल रहे बस्तर के चप्पे—चप्पे से वाकिफ डा. रमन सिंह. प्रदेश में रमन सिंह ही नक्सल मामलों में सीधा संवाद कर रहे हैं. वे अंदरूनी इलाकों के विकास के साथ—साथ पुलिसिंग पर भी सीधा फोकस बनाने में कामयाब होते दिख रहे हैं. बस्तर में ऐन चुनाव से पहले 25 मई 2013 को दरभा—झीरम घाट पर कांग्रेस के काफिले में हुए हमले ने सरकार को हिला दिया. जिसका परिणाम ही है कि अब राज्य सरकार सीधे फ्रंट फुट पर दिख रही है. बस्तर में नक्सल मोर्चे पर कई बड़े नीतिगत फैसले लिए गए. आत्म समर्पण की नीति को ज्यादा प्रभावी बनाया गया.

बड़ी संख्या में आत्मसमर्पण के द्वारा बस्तर में एक बार फिर पुलिस अपना नेटवर्क स्थापित करने में कामयाब हुई. इसी नेटवर्क के बूते बड़े नक्सली लीडर समर्पण के लिए तैयार हुए. नक्सलियों संगठन में अफरा—तफरी का माहौल बना. अविश्वास के चलते नक्सलियों ने अपने ही संगठन के संदिग्ध लीडरों को सजा देना शुरू किया. इधर पुलिस ऐसे पीड़ित नक्सलियों की भी सुध लेती रही. पहले सामाजिक एकता मंच के बैनर तले एक नक्सली जोड़े की शादी करवाकर वाह वाही लूटी. इसके बाद नक्सल संगठन में अपना जीवन साथी चुनने के बाद आम पारिवारिक जीवन जीने के लिए तैयार कई जोड़े सामने आए.

हाल ही में एक और नक्सली जोड़े का झीरम घाट में विवाह करवाकर पुलिस ने संगठन को चुनौती दी. आत्मसमर्पित नक्सलियों को अपने शरण में लेकर पुलिस ने खुद को मजबूत किया. जिसके चलते सैकड़ों की तादात में बारूदी सुरंग निष्क्रिय किए गए. पुलिस का दावा है कि उसने पुख्ता सूचनाओं के आधार पर सीधे मुठभेड़ में कई वर्दीधारी नक्सलियों को मारने में सफलता हासिल की है. मुठभेड़ों के बाद बड़े हथियार भी बरामद किए गए. मुठभेड़ के कुछ मामलों में पुलिस पर आरोप भी लगे हैं. बावजूद इसके पुलिस पहले से ज्यादा मजबूत स्थिति में खड़ी दिख रही है.

नक्सल मोर्चे पर पहली बार पुलिस और प्रशासन एक साथ कई मंचों में खड़े होकर विकास व आम लोगों तक योजनाओं की पहुंच की प्राथमिकता पर फोकस किया है. सामाजिक संगठनों और शहरी लोगों को माओवादियों के खिलाफ वैचारिक रूप से खड़ा करने में कामयाबी हासिल की.

‘अग्नि’ द्वारा आयोजित रैली में उपस्थित हजारों की भीड़ इसी बात का संकेत है कि कल्लूरी अपने मिशन में सफलता हासिल कर रहे हैं. कल तक जो आदिवासी नेतृत्व माओवादियों के विरोध में खड़ा होता था उसके स्थान पर एक सामाजिक मंच को खड़ा करने और उसे मजबूत करना भी बड़ी बात है. एक बार एसआरपी कल्लूरी से मेरी चर्चा हुई थी तब वे डीआईजी दंतेवाड़ा थे. उन्होंने कहा कि ‘नक्सलवाद धोखे की लड़ाई है जो बड़ा धोखेबाज होगा वही जितेगा!’ उनकी दूसरी लाइन भी गौर करने लायक है ‘मेरे लिए केवल आगे का ही रास्ता है, पीछे लौटने के लिए कोई दरवाजा नहीं है’ यानी नक्सलमोर्चे पर कल्लूरी रिवर्ट होने वाले अफसर कतई नहीं हैं.

पहली बार छत्तीसगढ़ में तेलंगाना से बेहर प्लानिंग और मुव्हमेंट के साथ नक्सलमोर्चे पर सरकार खड़ी दिख रही है. विकास, विचार और विकल्प के साथ पुलिसिंग का फार्मुला क्रियान्वित हो रहा है. बस्तर के अंदरूनी इलाकों में विकास के प्रयास तेज हुए हैं. माओवाद के खिलाफ विचारों को तेजी से फैलाया जा रहा है. प्रदेश और देश की राजधानी के साथ—साथ सोशल मीडिया में भी माओवाद के खिलाफ जमकर विचारों की प्रस्तुति हो रही है. कई अनचिन्हें चेहरे वाट्सएप पर सक्रिय हैं. जो प्रो माओवादी विचारों का प्रो राष्ट्रवादी बनकर जवाब भी दे रहे हैं. जेएनयू के प्रोफेसर हों या कोई और किसी भी तरह आरोपों की घेराबंदी कर बस्तर को नई दिशा में खड़ा करने की कोशिश हो रही है.

पहली बार मीडिया को भी पुलिस अपने पक्ष में खड़ा करने में सफलता हासिल की है. इसी विचार का नतीजा है कि माओवादी और मीडिया के बीच बाहरी और स्थानीय की लकीर भी खींच दी गई है. यानी बस्तर में नक्सल मोर्चे पर अब केवल आदिवासी ही नहीं बल्कि वे सारे लोग हैं जो स्वयं को ऐसे किसी भी अभियान से अलग रखने के पक्षधर रहे. ‘अब बस्तर बदल रहा है’ यही ललकार है, माओवादियों के खिलाफ…!

लेखक दंतेवाड़ा से प्रकाशित बस्तर इंपैक्ट के प्रधान संपादक हैं.

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