बस्तर में चुम्बक जैसा आकर्षण

जगदलपुर | संवाददाता: वरिष्ठ पत्रकार एवं राज्यसभा टीवी के संपादक राजेश बादल ने कहा कि बस्तर में चुम्बक जैसा गुण है, तथा यह सभी को खींच लाता है. उन्होंने यह भी कहा कि बस्तर में नियुक्ति की खबर सुनते ही परिवार में मायुसी छा जाती है, किन्तु बस्तर की संस्कृति और यहां का रहन-सहन लोगों को अपनी ओर खींचता है. श्री बादल ने कहा कि यहां आते समय चौड़ी सड़कें, गांव-गांव में बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं दिखाई दे रही हैं. इन्हीं के माध्यम से यहां भी विकास होगा.

उन्होंने कहा कि विकास या परिवर्तन आवश्यक है तथा इन्हें रोका नहीं जा सकता. श्री बादल ने कहा कि विकास के साथ ही यहां की संस्कृति, यहां का नृत्य और संगीत, यहां के वन, यहां की सादगी और भोलेपन को भी बचाए रखने की आवश्यकता है. जिले के चित्रकोट में प्रारंभ दो दिवसीय ‘बस्तर-कल, आज और कल’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में बस्तर में अपनी सेवायें दे चुके वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों ने बस्तर के अपने अनुभवों एवं बस्तर के विकास पर अपने विचारों को साझा किया.

वर्ष 1974 से 1977 के बीच अविभाजित बस्तर में कलेक्टर के रूप में अपनी सेवायें दे चुके प्रदीप बैजल ने कहा कि बस्तर एक एक ऐसा क्षेत्र है, जहां पर कृषि के अलावा डेजर्ट फारेस्ट की जमीन प्रचुर मात्रा में है, इस जमीन का सदुपयोग कर स्थानीय आदिवासियों के हित में योजनाएं बनाई जा सकती है. किरंदुल में एनएमडीसी के माध्यम से खनन होने से क्षेत्र के विकास में तेजी आई है और इस क्षेत्र के रहवासी बस्तर के दूसरे क्षेत्र के रहवासियों से बेहतर स्थिति में है. भविष्य में नगरनार स्टील प्लांट लगने के बाद निष्चित ही विकास में तेजी आएगी.

अविभाजित बस्तर में वर्ष 1986 से 1987 के बीच कलेक्टर के रूप में अपनी सेवायें देने वाले विल्फ्रेड लकड़ा ने अपने कार्यकाल में किए गए कार्यों को याद करते हुए कहा कि उन्होंने बस्तर जिले के भीतर विभिन्न ग्राम पंचायतों को सड़क मार्ग से जोड़ने के लिए योजना बनाई थी, इसके अलावा इस क्षेत्र में खेती की संभावनाओं को देखते हुए मांझियों के सहयोग से यहां कृषि कार्य का व्यापक प्रषिक्षण कार्य प्रारंभ किया गया था. उन्होंने कहा कि बस्तर के किसान को दूसरी फसल के रूप में मूंग की खेती करने के लिए तैयार किया. उन्होंने कहा यदि इस क्षेत्र में सभी को साथ लेकर और परिस्थितियों के अनुरूप योजना तैयार किया जाए तो निष्चित ही बस्तर क्षेत्र का व्यापक विकास होगा.

बस्तर जिले में 1986 से 1988 के मध्य कलेक्टर के तौर पर सेवा दे चुके एवं मध्यप्रदेश शासन में मुख्य सचिव के तौर पर सेवानिवृत्त भारतीय प्रशानिक सेवा के अधिकारी आर. परशुराम ने ‘बस्तर: कल, आज और कल‘ सम्मेलन में कहा कि बस्तर ने उनके कैरियर को संवारा है, इसलिए उनके दिल में बस्तर हमेशा रहेगा. उन्होंने कहा कि बस्तर कल भी था, आज भी है और हमेशा रहेगा.

उन्होंने कहा कि जब वे यहां कार्य कर रहे थे, तब बस्तर बहुत ही बड़ा जिला था तथा एक दिन दौरे में जब वे भोपालपट्टनम में थे, तब वहां पखांजूर में किसी घटना के संबंध में सूचना प्राप्त हुई. वे भोपालपट्टनम से पखांजूर बिना रुके गए, निश्चय ही एक लम्बी दूरी है. उन्होंने कहा कि आज ये स्थिति नहीं है और बस्तर सात जिलों में विभक्त हो चुका है. उन्होंने कहा कि इस लिहाज से यहां उपस्थित पांच उस दौर के पांच कलेक्टरों के पास 35 जिलों में कार्य करने का अनुभव है.

उन्होंने आगे कहा कि बस्तर जैसे बड़े जिले को बांटकर शासन द्वारा बहुत अच्छा कार्य किया गया है. इससे इस क्षेत्र का संतुलित विकास होगा. उन्होंने कहा कि बस्तर जिले ने उनके कैरियर को ऊंचाइयों तक पहुंचाने में बहुत बड़ा योगदान दिया था. वे जब नई दिल्ली में टेक्सटाईल मंत्रालय में उप सचिव थे तब कनाडा में कार्य करने के लिए उनका साक्षात्कार हुआ था. साक्षात्कारकर्ता ने श्री परशुराम के अनुभवों के विषय में पुछा. श्री परशुराम द्वारा बताए गए अन्य अनुभवों पर तो साक्षात्कारकर्ता द्वारा जरा भी रुचि नहीं ली गई, किन्तु बस्तर कलेक्टर के तौर पर करने के संबंध में उन्होंने बताया तो साक्षात्कारकर्ता ने न केवल पूरी रुचि ली बल्कि कनाडा में कार्य करने का अवसर भी दिया.

श्री परशुराम ने कहा कि जब वे बस्तर में कार्य कर रहे थे, तब परिस्थितियां अलग थीं. जब वे अबुझमाड़ के दौरे पर गए थे, तब वहां के लोगों ने नारायणपुर तक सड़क और हैण्डपम्प की मांग रखी थी. उस समय सड़क नहीं होने के कारण कैलिक्स मशीन से हैण्डपम्प की खुदाई की गई थी.

उन्होंने कहा कि बस्तर में कार्य करने का अनुभव उन्हें हर कदम पर सहयोग करता रहा है. अपने कार्यकाल में उन्होंने 4 करोड़़ रुपए की लागत से अबुझमाड़ में सड़कें बनवाई थी, मध्य प्रदेश में मुख्य सचिव के तौर पर कार्य करने के दौरान मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने सड़कों के निर्माण के लिए केन्द्र सरकार द्वारा प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अतिरिक्त कहीं भी राशि न होने की बात कही तब उन्होंने बस्तर के इन्हीं अनुभवों के आधार पर वहां मुख्यमंत्री ग्राम सड़क योजना प्रारंभ की और 15 हजार करोड़ रुपए की लागत से गांव-गांव को सड़कों से जोड़ा. उन्होंने कहा कि बस्तर में उद्यानिकी फसल के क्षेत्र में काफी संभावनाएं हैं, किन्तु इसके प्रोसेसिंग और मार्केटिंग पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है.

बस्तर में 1989 से 1991 के बीच कलेक्टर के तौर पर सेवा दे चुके भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी प्रभुदयाल मीणा ने बताया कि जब वे यहां पदस्थ हुए थे, तब यहां तेंदुपत्ता की खरीदी का भारी विरोध नक्सलियों द्वारा किया जा रहा था. उन्होंने कहा कि तेंदूपत्ता बस्तरवासियों के आजीविका का प्रमुख साधन है, किन्तु नक्सलियों के विरोध के चलते दक्षिण बस्तर में तेंदुपत्ता तुड़ाई की संभावना अत्यंत कम थी, ऐसी परिस्थितियों में उन्होंने यहां के युवा आईपीएस अधिकारियों की सहयोग से बड़ी संख्या मं तेंदूपत्ता की खरीदी की. उन्होंने बताया कि उस समय कम्प्यूटर और इंटरनेट जैसी तकनीकी सुविधाएं नहीं थीं, जिनके कारण कार्य आज की भांति सुगमतापूर्वक संभव नहीं था, किन्तु उस समय भी आवेदनकर्ताओं की बैठकें लेकर समस्याओं का निराकरण किया जाता था.

उन्होंने बताया कि उनके कार्यकाल के दौरान मलेरिया और उल्टी-दस्त से कुछ मौतें हुई थीं. इस समस्या के समाधान के लिए उन्होंने मलेरिया और उल्टीग्रस्त क्षेत्रों में शिविर लगवाए और गांवों में होने वाली मृत्यु की रिपोर्टिंग करने के निर्देश अधिकारियों को दिए. उस समय दुषित पेयजल तथा अन्य आदतों के चलते ऐसी कई घटनाएं गांवों में घटती रहती थीं, किन्तु रिर्पोटिंग के अभाव में यह जानकारी सामने नहीं आ पाती थीं. मैदानी कर्मचारियों द्वारा रिपोर्टिंग के पश्चात् ऐसी कई घटनाएं प्रकाश में आईं, जिसके बाद इन समस्याओं पर नियंत्रण भी प्राप्त किया गया.

श्री मीणा ने कहा कि आज रामकृष्ण मिशन आश्रम अबुझमाड़ के बच्चों का भविष्य संवार रहा है. इसी तरह श्री धर्मपाल सैनी द्वारा अनेक आश्रमों का संचालन किया जा रहा था. उन्होंने कहा कि बस्तर जैसे आदिवासी अंचल में आवासीय विद्यालय की प्रणाली ही अधिक उचित है. इससे बच्चों को शिक्षा के साथ-साथ आवास और भोजन की व्यवस्था भी आसानी से संभव होती है. उन्होंने यह भी कहा कि बस्तर में बहुत अच्छा कार्य हो रहा है, किन्तु बस्तर की छवि अभी भी वैसी नहीं है, जैसी होनी चाहिए.
बस्तर में 1989 से 1991 के बीच कलेक्टर के तौर पर सेवा दे चुके 1983 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी सुनील टंडन ने कहा कि बस्तर से उन्हें विशेष लगाव है. उनकी पहली नियुक्ति अबुझमाड़ विकास अधिकारी के तौर पर हुई थी, तब वे अपनी पत्नी और छः माह की बेटी के साथ यहां पहली बार आए थे. नारायणपुर स्थित उनके घर में जब पत्नी ने नल को देखा तो पानी नहीं थी और जब बटन को दबाया तो बिजली नहीं थी. उन्होंने बताया कि उस समय नारायणपुर में सिंगल फेस बिजली लाईन थी और गांव में नल तो था ही नहीं. उन्होंने उसी समय ठान लिया था, कि वे नारायणपुर में थ्री फेस कनेक्शन लाएंगे और यहां घर-घर तक नल लाईन लगवाएंगे. उन्होंने अपनी उस कल्पना को साकार भी किया.

उन्होने बताया कि वे अबुझमाड़ के जाटलूर गांव जाने का मन बनाया. लगभग 32 किलोमीटर पैदल चलकर वे जाटलूर पहुंचे. वहां उन्होंने देखा कि एक महिला जमीन से पानी खोदकर स्वयं पी रही है और अपनी बच्ची को पिला रही है. उन्होंने इससे प्रभावित होकर उस गांव में हैण्डपम्प लगाने का निर्णय लिया और कैलिक्स मशीन की मदद से वहां हैण्डपम्प खुदवाया, क्योंकि वहां बड़ी मशीन के जाने के लिए रास्ता ही नहीं था. उन्होंने बताया कि उस समय फोन जैसी सुविधा भी नहीं होने के कारण कार्य बहुत कठिन था, किन्तु आज बस्तर बदल चुका है और यहां भी अब सारी सुविधाएं दिखाई दे रही हैं. श्री टंडन ने यह भी कहा कि वे जब पखांजूर गए थे, तो उन्हें पता चला कि वहां की 80 फीसदी भूमि सिंचित है, जबकि पूरे संभाग में मात्र 2 फीसदी भूमि ही सिंचित थी. उन्होंने कहा कि यहां के स्थानीय आदिवासियों के हित में सिंचित रकबा को बढ़ाने की आवश्यकता है.

दंतेवाड़ा और कांकेर में बतौर कलेक्टर सेवा दे चुके तथा वर्तमान में राजस्व एवं आपदा राहत प्रबंधन विभाग के सचिव के आर पिस्दा ने कहा कि वे बस्तर क्षेत्र में दिए गए अपने सेवाकाल को सबसे अधिक संतुष्टिपूर्ण मानते हैं. उन्होंने कहा कि सलवा जूडूम के दौरान उन्हें दंतेवाड़ा में सेवा देने का अवसर प्राप्त हुआ. उन्होंने कहा कि कुछ लोग सलवा जुडूम को शासन द्वारा प्रायोजित मानते हैं, लेकिन बतौर कलेक्टर उन्हें कभी भी नहीं लगा कि यह सरकार द्वारा प्रायोजित है, बल्कि सरकार द्वारा नक्सल विरोधियों को मात्र समर्थन दिया गया था. उन्होंने कहा कि बस्तर के विकास में नक्सल समस्या सबसे बड़ी बाधा है, इसलिए यहां के लोग नक्सल समस्या के खात्मे के लिए व्याकुल हैं तथा इस अभियान में सभी वर्ग का सहयोग मिल रहा है.

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