‘देवताओं’ को भी सजा सुनाते हैं भक्त

जगदलपुर । एजेंसी: सदियों से अपनी हर समस्या के निदान के लिए ग्राम देवताओं की चौखट पर मत्था टेकते आए छत्तीसगढ़ के बस्तर के लोग जनअपेक्षाओं की कसौटी पर खरे नहीं उतरने वाले देवताओं को भी दंडित करने का जज्बा रखते हैं.

दंड आर्थिक जुर्माने, अस्थायी निलंबन या फिर हमेशा के लिए देवलोक से देवी-देवताओं की विदाई के रूप में होता है और फैसला लेती है जनता की अदालत.


बस्तर जिले के केशकाल कस्बे में हर साल भादों जात्रा उत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता है. यहां की भंगाराम देवी 9 परगना के 55 राजस्व ग्रामों में रहने वाले लोगों और देवी-देवता का दर्जा प्राप्त मानवों की आराध्य देवी हैं. भंगाराम देवी के दर पर भादो मास के हर शनिवार को सभी भक्त उपस्थित होते हैं.

पुजारी सरजूराम गौर बताते हैं कि भादो में देवी भंगाराम की सेवा-पूजा लगातार छह शनिवार तक होती है.

इस वर्ष भादो जात्रा माह उत्सव 31 अगस्त को केशकाल में आयोजित हुआ. इसमें पधारे मानव रूपी देवी-देवताओं का परंपरानुसार स्वागत कर उन्हें पद और प्रतिष्ठा के अनुरूप स्थान दिया गया. इनके साथ प्रतिनिधि के रूप में पुजारी, गायता, सिरहा, ग्राम प्रमुख, मांझी, मुखिया और पटेल पहुंचे थे. पूजा सत्कार के बाद वर्ष भर प्रत्येक गांव में सुख-शांति, सबके स्वस्थ रहने, अच्छी उपज और किसी भी तरह की दैविक आपदा से हर जीव की रक्षा के लिए मनौती मांगी गई.

उन्होंने बताया कि देवी-देवताओं को खुश और शांत रखने के लिए उन्हें प्रथानुसार बलि और अन्य भेंट दी गई. बिना मान्यता के किसी भी नए देव की पूजा का प्रावधान यहां नहीं है. जरूरत के मुताबिक या ग्रामीणों की मांग पर नए देवताओं को यहां मान्यता दी जाती है. पूर्व सांसद और समिति के अध्यक्ष लंबोदर बलियार के मुताबिक दोषी पाए गए या ठहराए गए देवताओं को भी नाम मात्र का शुल्क अदा करना पड़ता है.

भादो जात्रा में सांप्रदायिक सौहाद्र्र की मिसाल भी मिलती है. भंगाराम देवी के मंदिर के समीप डाक्टर खान को देवता का दर्जा प्राप्त है. उन पर पूरे 9 परगना के लोगों को बीमारियों से बचाए रखने की जिम्मेदारी है.

जानकार बताते हैं कि वर्षो पहले क्षेत्र में कोई डाक्टर खान थे, जो बीमारों का इलाज पूरे सेवाभाव और नि:स्वार्थ रूप से किया करते थे. उनके न रहने पर उनकी सेवा भावना के कारण उन्हें यहां की जनता ने देव रूप में स्वीकार कर लिया और उनकी पूजा की जाने लगी.

जहां अन्य देवताओं को भेंट स्वरूप बलि दी जाती है, वहीं डाक्टर खान देव को अंडा और नींबू अर्पित किया जाता है. स्थानीय निवासी कृष्णदत्त उपाध्याय बताते हैं कि इलाके में बीमारी का प्रकोप होने पर सबसे पहले डाक्टर खान देव की ही पूजा होती है.

शनिवार की शाम शुरू हुई पूजा-अर्चना का दौर देर रात तक चलता रहा. रविवार की सुबह शुरू होगी वह प्रथा, जो पूरी दुनिया में अपनी विशिष्ट धार्मिक और कर्म प्रधान आदिवासी विरासत का अनूठा उदाहरण है.

बस्तर का आदिवासी समाज जागरूक है. वह आंख मूंदकर अपने पूजित देवी-देवताओं पर विश्वास करने के बजाय ठोंक बजाकर उन्हें जांचता-परखता है और समय-समय पर उनकी शक्ति का आकलन भी करता है. अकर्मण्य और गैरजिम्मेदार देवी-देवताओं को सफाई पेश करने का मौका देकर जनअदालत में उन्हें सजा भी सुनाता है. सजा देने वाले होते हैं भगवान के भक्त.

यह स्थिति तब निर्मित होती है, जब इलाके का जनमानस किसी भी वजह से दुखी और पीड़ित होता है. यहां यह उल्लेख करना प्रासंगिक है कि भंगाराम देवी इलाके की प्रमुख देवी हैं, फिर भी जात्रा में महिलाओं का प्रवेश और प्रसाद ग्रहण करना सर्वथा वर्जित है.

नारना गांव के सिरहा रूपसिंह मंडावी की मानें तो स्त्रियां भावुक होती हैं, ऐसे में देवताओं के खिलाफ जात्रा में लगने वाली जनअदालत में देवताओं के खिलाफ लिए गए फैसलों पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है. पूजित देवताओं के प्रति समर्पित भक्त का यदि अहित हो तो यह भक्त का अधिकार है कि वह अपने आराध्य को कटघरे में खड़ा करे.

शास्त्रों के अनुसार, भगवान भक्त के अधीन होते हैं. इसी के अनुरूप आदिम प्रजाति में इस परंपरा का प्रादुर्भाव हुआ होगा. बाहरी दुनिया की सभ्य संस्कृति के लोग भले ही ऐसा न कर सकें, लेकिन बस्तर के जनजातीय समुदाय के लोग जैसे पूरे देश में विरले ही होंगे, जो भगवान को भी जनअदालत के कटघरे में खड़ा कर उन्हें सजा भी सुनाते हों.

कोहकामेटा के सिरहा नाथूलाल ठाकुर कहते हैं कि सच्चाई यह भी है कि विकास और सुविधाओं के अभाव में यहां के आदिमजन अपनी समस्याओं को लेकर इन्हीं देवी-देवताओं की अलौकिक शक्तियों के सहारे आज तक जी रहे हैं, उनकी सोच काफी गहरी है.

भादो के आखिरी शनिवार को हर साल केशकाल में लगने वाली जनअदालत में जिन देवी-देवताओं को सजा सुनाई जाती है, उनकी वापसी का भी प्रावधान है, लेकिन उनके चरण तभी पखारे जा सकते हैं, जब वे अपनी गलतियों को सुधारते हुए भविष्य में लोककल्याण के कार्यों को प्राथमिकता से करने का वचन देते हैं. सजा पाए देवी-देवता संबंधित पुजारी को स्वप्न में वचन देते हैं.

केशकाल के रहने वाले बलराम गौर ने बताया कि देवी-देवताओं की वापसी की प्रक्रिया पूरी होने के बाद उनकी नई संरचना की जाती है. अर्थात देवता के प्रतीक चिह्नें को नया रूप देकर भंगाराम देवी और उनके दाहिने हाथ कुंअरपाट देव की सहमति के बाद मान्यता दी जाती है.

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