32 छत्तीसगढ़िया बंधक गुमला से मु्क्त

रांची | समाचार डेस्क: 32 छत्तीसगढ़ी बंधुवा मजदूर को झारखंड के गुमला से शनिवार को मुक्त कराया गया. स्थानीय समाचार पत्रों के अनुसार इनमें शामिल महिलाओँ तथा बच्चों का शारीरिक शोषण किया जा रहा था. छत्तीसगढ़ पुलिस की सूचना पर श्रम अधीक्षक चंद्र मोहन मिश्र ने पुलिस की मदद से इन 32 बंधुवा बनाये गये छत्तीसघड़ के मजदूरों को मुक्त कराया. इनमें 12 बच्चे भी शामिल हैं.

श्रम अधीक्षक चंद्र मोहन मिश्र ने बताया कि ईट भट्ठे के मालिक के खिलाफ प्रवासी मजदूर कर्मकार विनियम एवं सेवा शर्त अधिनियम 1979 के तहत मामला दर्ज कर कार्रवाई शुरु की जा रही है, साथ ही मुक्त कराये गये सभी मजदूरों को उनके घर भेजने की व्यवस्था की जा रही है.

उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ के बलौदा बाजार के टिटही पाली सरसींता गांव के खोज राम की शिकायत पर यह कार्यवाही की गई. खोज राम ने छत्तीसगढ़ पुलिस को शिकायत की थी कि उसके पत्नी पुनबाई, बेटी सरस्वती व जमुना कुमारी को गुमला के एक ईंट भट्ठा में बंधक बना लिया गया है.

छत्तीसगढ़ पुलिस ने इस शिकायत की एक प्रति झारखंड पुलिस को भेजी जिसके बाद यह कार्यवाही की गई. बंधउवा मजदूरों ने बताया कि उनको न तो पारिक्षमिक दिया जा रहा था और न ही उन्हें ठीक से खाना-कपड़ा दिया जा रहा था.

छत्तीसगढ़ से शिकायत मिलने के बाद गुमला सर्किल के इंस्पेक्टर तेज नारायण सिंह ने क्षम विभाग के साथ मिलकर इन बंधकों को बंगरू ईंट भट्ठा को मुक्त कराया. आरोपी ईंट भट्टे के मालिक का नाम राजेश्वर लाल है.

झारखंड के श्रम अधीक्षक चंद्र मोहन मिश्र ने दावा किया है कि, ” तीन महीने से सभी काम कर रहे है. ये सभी छत्तीसगढ़ राज्य के हैं. किसी के साथ मारपीट नहीं की गयी है. वे लोग अपने मन से काम करने आये थे. सप्ताह में सभी मजदूर को एक से दो हजार रुपये मजदूरी दिया जाता था. बच्चों को स्कूल भेजने के लिए कहने पर परिवार के लोग तैयार नहीं होते थे.”

वहीं, गुमला के भुनेश्वर सिंह, मुंशी, ईट भट्ठा ने कहा, ” बंगरू गांव के ईट भट्ठा से मजदूरों को मुक्त कराया गया है. सभी लोगों से पूछताछ की जा रही है. इसके बाद आगे की कार्रवाई की जायेगी. मजदूरों ने जितना दिन कामकिया है. उसकी पूरी मजदूरी मिलेगी.”

इन दावो, प्रति दावो तथा पुलिस की कार्यवाही के बाद भी सवाल उठता है कि आखिरकार छत्तीसगढ़ के मजदूर दिगर राज्यों के ईंट भट्टों में काम करने के लिये क्यों जाते हैं. उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ में अति सस्ते मूल्य पर गरीबों को चावल मुहैया करवाया जाता है. छत्तीसगढ़ राज्य का सकल घरेलू उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है. जाहिर है कि सरकार की योजनाओं का लाभ गांव के गरीबों तक नहीं पहुंच पा रहा है इसीलिये वे रोजगार की तलाश में दिगर राज्यों को प्रस्थान कर जाते हैं.

छत्तीसगढ़ में कम होते रोजगार के अवसर

इसके अलावा, छत्तीसगढ़ में रोजगार के अवसर भी घट रहें हैं जिससे रोजगार की तलाश में पलायन जारी है. गौरतलब है कि संसद में पेश किये गये आकड़ों के अनुसार वर्ष उत्पादन क्षेत्र में वर्ष 2009-10 में प्रति हजार में 59 रोजगार के अवसर दिये वहीं 2010-11 में इसकी संख्या घटकर 48 रह गई.

राष्ट्रीय स्तर पर 2009-10 में उत्पादन क्षेत्र में प्रति हजार में 110 रोजगार मिले जो 2010-11 में बढ़कर 126 का हो गया था. जाहिर है कि छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय स्तर के विपरीत उत्पादन क्षेत्र में रोजगार के अवसर कम हो रहें हैं. गौरतलब है कि इस बात की जानकारी वाणिज्य एवं उद्योग राज्य मंत्री निर्मला सीतारमण ने राज्यसभा में एक प्रश्न के लिखित जवाब में दी.

छत्तीसगढ़ की तुलना यदि साथ में अस्तित्व में आये राज्यों के साथ की जाये तो राज्सभा में पेश किये गये यही आकड़े बयां करते हैं कि झारखंड में 2009-10 तथा 2010-11 में 77 रोजगार मिले थे तथा उत्तराखंड में 2009-10 तथा 2010-11 में क्रमशः 66 तथा 93 रोजगार मिले थे. छत्तीसगढ़ के लिये यही आकड़ा चौंकाने वाला है जिसमें 1009-10 की तुलना में 2010-11 में रोजगार कम मिले थे जबकि झारखंड में रोजगार देने की संख्या स्थिर रही थी तथा उत्तराखंड में इसमें वृद्धि दर्ज की गई थी. यहां तक की जिस मध्य प्रदेश का वर्ष 2000 तक छत्तीसगढ़ हिस्सा रहा है वहां भी 2009-10 में 61 रोजगार दिये गये जो 2010-11 में बढ़कर 72 का हो गया.

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