छत्तीसगढ़ बजट यानी किसानों के लिये अप्रेल फूल

रायपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ के 2018-19 के बजट में एक बार फिर किसानों के साथ छलावा हुआ है. राज्य के मुखिया रमन सिंह भले इसे किसानों का बजट बता रहे हों लेकिन हकीकत ये है कि किसानों के हाथ इस बार भी कुछ नहीं लगने वाला है.

आंकड़ों को देखें तो कृषि बजट में ऊर्जा, सिंचाई, खाद्य और सहकारिता का समावेश करके कृषि बजट को 13480 करोड़ रुपए (29 प्रतिशत) वृद्धि बताया जा रहा है. लेकिन दिलचस्प ये है कि इसमें सरकार ने अगले साल दिया जाने वाला धान बोनस 2107 करोड़ रुपए जोड़ दिया है. पिछले साल कृषि बजट की राशि 10 हजार 433 करोड़ रुपए थी. इसमें धान बोनस की राशि नहीं जोड़ी गई थी. सरकार ने बाद में अनुपूरक बजट में 2087 करोड़ रुपए का प्रावधान किया. यानी धान बोनस को जोड़ दें तो पिछले साल 12 हजार 200 करोड़ तो कृषि बजट पिछले बार भी था. इसमें सूखा राहत के नाम पर मिलने वाले 546 करोड़ रुपए और धान ऊपार्जन हानि के 850 करोड़ रुपए को जोड़कर कृषि बजट में 29 प्रतिशत का इजाफा दिखाया गया है. जबकि वास्तविकता यह है कि कृषि बजट में इस बार कोई नई योजना नहीं है.


खेल बोनस का
सरकार ने दो साल तक धान बोनस नहीं दिया. अब बोनस नगद न देकर उधारी में अगले साल दिया जा रहा है. यह बजट 2018-19 के लिए है, लेकिन सरकार ने धान बोनस पिछली 2017-18 की खरीदी के लिए प्रावधान किया है. यह राशि एक साल बाद किसानों को मिलेगी. जब चुनाव हो रहे होंगे तब 2018-19 के लिए धान खरीदी शुरू होगी, जिसमें बोनस का कोई प्रावधान नहीं किया गया है. असली बजट तो तभी होता जब 2018-19 यानी आगामी खरीदी के लिए बजट का प्रावधान किया जाता.

90 प्रतिशत इजाफे का सच
कृषि और उद्यानिकी विभाग के बजट में 90 प्रतिशत का इजाफा केवल आंकड़ों की बाजीगरी है. वास्तविकता यह है कि कृषि विभाग को पिछले साल से भी कम बजट दिया गया है. इस साल कृषि और उद्यानिकी विभाग के लिए 4452 करोड़ रुपए का बजट दिखाया जा रहा है और कहा जा रहा है कि यह पिछले साल से 90 प्रतिशत अधिक है. जबकि ऐसा नहीं है. कृषि विभाग के इस बजट 4452 करोड़ में धान बोनस के 2107 करोड़ घटा दिए जाएं तो कृषि विभाग के पास महज 2345 करोड़ रुपए बचेंगे. जबकि पिछले साल कृषि विभाग को 2279 करोड़ रुपए मिले थे. बाद में सरकार ने धान बोनस 2087 रूपए की घोषणा की थी. यानी 2279 और 2087 करोड़ को जोड़ दें तो 4432 करोड़ रुपए पिछले बार कृषि विभाग का बजट था. यह आंकड़ों की बाजीगरी ही है.

कृषि पंपों पर सब्सिडी
कृषि पंपों पर सब्सिडी पांच साल में 458 करोड़ से बढ़कर तीन हजार करोड़ कैसे पहुंच गया, यह बड़ा सवाल है. राज्य सरकार ने इस साल कृषि पंपों पर दी जाने वाली सब्सिडी के नाम पर लगभग तीन हजार करोड़ रुपए का प्रावधान किया है, यह रकम कृषि पंपों के बिजली बिल की अदायगी में खर्च होगी. जबकि 2012-13 के बजट में कृषि पंपों पर सब्सिडी मात्र 337 करोड़ रुपए थी. तब भी किसानों को 6500 और 7500 यूनिट बिजली मुफ्त दी जाती थी. 2013-14 में कृषि पंप की सब्सिडी 387 करोड़ हुई, 2014-15 में 458 करोड़ हुई लेकिन 2015-16 में यह अचानक से बढ़कर 1415 करोड़ रुपए हो गई. तब सरकार ने कृषि पंपों के बिजली टैरिफ 200 गुना बढ़ा दिए थे. पिछले दो सालों से बजट में कृषि पंपों के नाम पर दी जाने वाली सब्सिडी का उल्लेख नहीं किया जा रहा है. इस साल कृषि पंपों पर सब्सिडी के नाम पर 2975 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है. यानी किसानों के नाम पर यह रकम जारी होगी और मिलेगी ऊर्जा विभाग को. पांच साल पहले कृषि पंपों की संख्या तीन लाख थी, वह अब बढ़कर साढ़े चार लाख ही पहुंची है, लेकिन सब्सिडी की रकम 10 गुना बढ़ गई है.

धान खरीदी और घोटाला
सरकार ने जनता की कमाई के धन से धान खरीदी के घोटाले की पूर्ति की है. धान खरीदी में सूखत, कमी और सड़ने के नाम पर 850 करोड़ रुपए का घाटा मार्कफेड (सहकारिता) के ऊपर लदा है. इसके लिए इस बार के बजट में 850 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है, जिसे धान उपार्जन की क्षतिपूर्ति के नाम पर दर्शाया गया है. 2013-14 के बजट में धान ऊपार्जन की क्षतिपूर्ति के लिए सरकार ने 400 करोड़ रुपए मार्कफेड को दिए थे. जबकि यह घाटा मार्कफेड के घोटाले के कारण हुआ है.

कृषि ऋण पर सब्सिडी में कटौती
राज्य सरकार किसानों को शून्य प्रतिशत ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराती है, लेकिन हर साल इसके लिए दी जाने वाली सब्सिडी की राशि में कटौती की जा रही है. 2016-17 के बजट में कृषि ऋण सब्सिडी के लिए 223 करोड़ रुपए दिए गए थे. 2016-17 में इसे घटाकर 197 करोड़ रुपए कर दिए गए. अब 2018-19 के बजट में 13 लाख किसानों को मिलने वाली ऋण सब्सिडी 184 करोड़ रूपए कर दी गई है. जबकि इसका लाभ केवल उन्हीं किसानों को मिलता है, जो जुलाई में कर्ज लेते हैं और धान खरीदी के समय अपना कर्ज लौटा देते हैं.

फ्लाप सब्जेक्ट एग्रीकल्चर की फिर से होगी पढ़ाई
मुख्यमंत्री ने अपने बजट भाषण में 100 स्कूलों में एग्रीकल्चर (कृषि) संकाय की पढ़ाई के लिए पांच करोड़ रुपए देने का प्रावधान किया है. यह संकाय प्रदेश के चुनिंदा स्कूलों में संचालित है, यह पूरी तरह फ्लाप है. इसका मुख्य कारण है कि 11वीं कक्षा में कृषि संकाय लेने के बाद वह छात्र साइंस और मैथ्स में जीरो हो जाता है, उसे कृषि विश्वविद्यालय में बीएससी की प्रवेश परीक्षा में कोई छूट नहीं मिलती. प्रवेश परीक्षा में साइंस और मैथ्स वाले छात्र बाजी मार जाते हैं. कृषि विवि की प्रवेश परीक्षा में कृषि संकाय वालों को प्राथमिकता नहीं मिलती, जैसे बायो संकाय वाला ही मेडिकल (पीएमटी) का टेस्ट दे सकता है, मैथ्स वाला ही इंजीनियरिंग (पीईटी) का टेस्ट दे सकता है. पर पीएटी का टेस्ट सभी दे सकते हैं. कृषि संकाय वाले न घर के होते हैं न घाट के. ऐसे में 100 स्कूलों में कृषि संकाय खोलने का फायदा तब तक नहीं मिलेगा, जब तक कृषि संकाय वालों को कृषि विवि में बीएससी के लिए प्राथमिकता न मिले.

पिछले पांच बजट की पांच अधूरी योजनाएं
2013- आलू अनुसंधान केंद्र मैनपाट, टिश्यू कल्चर लैब बिलासपुर, रायपुर अभी तक शुरू नहीं हुआ.
2014 – राजनांदगांव में खेल विश्वविद्यालय की घोषणा.
2015- पीडीएस में मेरी मर्जी योजना का प्रदेश में विस्तार की घोषणा (कहीं से भी अनाज लेने की आजादी नहीं).
2016- जैविक खेती के लिए प्रमाणीकरण केंद्र की स्थापना नहीं हुई. वैसे लगातार चार साल तक जैविक खेती मिशन की बात कही गई, लेकिन हुआ कुछ नहीं, इस बार के बजट में जैविक खेती गायब है
2017- पशुओं के दुर्घटना होने पर 108 संजीवनी की तर्ज पर पशु एंबुलेंस की घोषणा धरी रह गई, इस बार भी घोषणा.

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