‘हुक्का-पानी बंद’ के खिलाफ अभियान

रायपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ में सामाजिक बहिष्कार के खिलाफ कड़ा कानून बनाने की मांग अंधश्रृद्धा निर्मूलन समिति ने की है. इस संस्था बकायदा इसके खिलाफ अभियान भी छेड़ रखा है. जिसके तहत रायपुर तथा बिलासपुर में प्रदर्शन किया गया. संस्था की छत्तीसगढ़ सरकार से मांग है कि राज्य में सामाजिक बहिष्कार को अपराध घोषित किया जाये तथा उसके खिलाफ कड़ा कानून बनाया जाये.

छत्तीसगढ़ के अंधश्रृद्धा निर्मूलन समिति के अध्यक्ष दिनेश मिश्र ने कहा कि हमने सामाजिक बहिष्कार निषेध कानून लागू करने और इस प्रथा के शिकार लोगों को न्याय दिलाना सुनिश्चित करने की मांग को लेकर राज्य के सभी 27 जिलों में धरना प्रदर्शन आयोजित करने की योजना बनाई है. उन्होंने कहा हम अभी तक राजधानी रायपुर और बिलासपुर जिला मुख्यालयों में ऐसा कर चुके हैं जहां बहुत से लोग इसके शिकार हुये हैं या हो रहे हैं. ऐसे सभी लोगों ने इस धरना प्रदर्शन में शिरकत की है.


समिति के अध्यक्ष दिनेश मिश्रा ने कहा कि राज्य में सामाजिक और जातिगत स्तर पर सक्रिय पंचायतों द्वारा सामाजिक बहिष्कार के मामले लगातार सामने आते रहते हैं. छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचल में ऐसे मामले ज्यादा होते हैं. राज्य में ऐसे मामले आते हैं जिसमें जाति या समाज से बाहर विवाह करने, समाज के मुखिया का कहना न मामने, पंचायतों के मनमाने फरमान और फैसलों को सिर झुकाकर पालन नहीं करने पर किसी व्यक्ति या उसके पूरे परिवार को समाज व जाति से बाहर कर दिया जाता है तथा समाज में उसका हुक्का पानी बंद कर दिया जाता है. समिति सामाजिक बहिष्कार के प्रभावितों को न्याय दिलाने और बहिष्कार के विरोध में प्रभावी कानून बनाने की मांग कर रही है.

छत्तीसगढ़ में सामाजिक बहिष्कार की घटनायें-
उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ में अगस्त 2016 में सतनामी समाज के पंचायत में एक 28 वर्षीय युवक अमरदास बंजारे को पीट-पीटकर इसलिये मार डाला गया था क्योंकि उसने समाज द्वारा बहिष्कृत किये गये परिवार के एक कार्यक्रम में भाग लिया था.

उससे महज दो दिन पहले छत्तीसगढ़ के कोरिया के सोनहत इलाके में रहने वाले दो दलितों भैय्यालाल तथा रामप्रसाद का वनविभाग के कहने पर मृत हाथी के पोस्टमार्टम में सहयोग करने के लिये समाज ने पांच हजार रुपयों का जुर्माना ठोंक दिया था. दोनों दलितों पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने ‘भगवान गणेश’ का पोस्टमार्टम किया था.

कोरबा में एक पंच ललिता प्रसाद पिछले 6 सालों से सामाजिक बहिष्कार का दंश झेल रहा है. उसका कुसूर सिर्फ इतना है की उसने दुष्कर्म पीड़िता का हाथ थामा था. बार-बार इसकी शिकायत प्रशासन से करने के बाद पीड़ित पंच ने कोई समाधान निकलता देख प्रशासन से जुलाई 2016 में इच्छा मृत्यु की मांग की.

इतना ही नहीं ललिता प्रसाद के मृत पिता के कब्र को भी उखड़वा दिया गया और उसकी विधवा मां का पेंशन भी नहीं दिया जाता है. इस सब की वजह है उसका एक रेप पीड़िता युवती से शादी करना जो अब समाज के दबाव में उसके पास रहती भी नहीं है. पंच होने के बावजूद पंचायत में उसकी कोई पूछ-परख नहीं है.

राज्य में नवंबर 2015 में एक पंचायत का तुगलकी फरमान सामने आया था. जब दिगर जाति में प्रेम विवाह करने के बाद आत्महत्या करने पर उसके अंतिम संस्कार में भाग लेने के लिये पंचायत ने 13 हजार रुपयों का जुर्माना अदा करने को कहा था. दरअसल, दूसरी जाति में प्रेम विवाह करने के कारण युवती तथा उसका परिवार सामाजिक बहिष्कार का दंश झेल रहा था. मामला जशपुर जिले का था.

गौरतलब है कि सामाजिक बहिष्कार की सभी घटनायें सतह पर नहीं आती है. इसके शिकार लोग व परिवार डर के मारे इनका विरोध नहीं करते हैं. ज्यादातर मामलें जो सामने आये हैं उनमें पानी हद से गुजर चुका था अन्यथा उनके बारे में भी किसी को जानकारी नहीं मिल पाती.

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