महंगी दवा बेच रही हैं कंपनियां

बिलासपुर | जेके कर: जरूरत मंदो को महंगी दवा खरीदने के लिये मजबूर किया जा रहा है. इसे दूसरे शब्दों में कहें तो दवा कंपनियां कम कीमत वाली जीवन रक्षक तथा आवश्यक दवाओं के स्थान पर महंदी दवाओं से बाजार को भर रही है. इस कारण से मजबूरन चिकित्सकों को भी महंगी दवाओं के भरोसे ही मरीजो का इलाज करना पड़ रहा है. वास्तव में कम कीमत वाली दवाओं को दवा कपंनियों द्वारा धीरे-धीरे बनाना कम किया जा रहा है. जिससे चिकित्सा भी महंगी होती जा रही है.

इससे हमें उस समय रूबरू होना पड़ा जब हमने अपने पिता के लिये दमा की दवा हाल ही में खरीदी. हमारे फैमिली फीजिशियन तथा छत्तीसगढ़ के वरिष्ठतम फीजिशियनों में से एक बिलासपुर के सरोज तिवारी द्वारा हमारे पिता को कौम्बीमिस्ट रेस्प्यूल्स को नेबुलाइजर के द्वारा लेने की सलाह दी गई थी.


जब हमने दवा दुकानों की खाक छानी तो पता चला की अब यह दवा उपलब्ध नहीं है बल्कि इसके जगह पर कौम्बीमिस्ट-एल दवा आ गई है. पुराने कौंबीमिस्ट में दमा की दो दवा मिली हुई थी. पहला सालबुटामॉल तथा इप्राट्रोपियम, जबकि अब बाजार में उपलब्ध कौंबीमिस्ट में सालबुटामॉल के स्थान पर लीवो सालबुटामॉल मिला हुआ है. हमने जब हमारे फीजिशियन से बात की तो उन्होंने बताया कि इसे भी लिया जा सकता है. हालांकि उनका कहना था कि जब पुराने दवा से ही इलाज किया जा सकता है तो नई दवा की जरूरत नहीं है. उन्होंने फोन पर बताया कि इसमें केवल मालीक्यूल का स्ट्रकचर बदला हुआ है.

इससे पहले इस दवा के एक एम्पुल की कीमत 4.18 रुपये हुआ करती थी जबकि नई कौंबीमिस्ट-एल के एक एम्पुल की कीमत 15 रुपये है. अब चौंकने की बारी हमारी थी. जाहिर है कि पुरानी दवा के स्थान पर नई दवा प्रस्तुत करने के नेपथ्य में दवा कंपनियों का मुनाफा ही मुख्य भूमिका का निबाह कर रहा है. गौरतलब है कि भारत सरकार ने अपनी दवा नीति 2012 के आधार पर 15 मई 2013 को दवा मूल्य नियंत्रण आदेश जारी किया था जिसके तहत दमा की दवा सालबुटामॉल का मूल्य नियंत्रित कर दिया गया.

इसी वजह से दवा कंपनियों ने सालबुटामॉल के स्थान पर लीवो सालबुटामॉल जिस पर की मूल्य नियंत्रण लागू नहीं होता है बेचने में अपनी भलाई समझी. यह अलग बात है कि इससे मरीजों को ज्यादा मूल्य चुकाना पड़ रहा है.

मामला थोड़ा सा जटिल है तथा इसमें विशेषज्ञों की राय आवश्यक है. हमने इसके लिये सबसे पहले फीजिशियन सरोज तिवारी से बात की. उन्होंने बताया कि इसमें सालबुटामॉल के अणु से लीवो आइसोमर को अलग कर लिया गया है. वास्तव में इस लीवो आइसोमर में ही छाती की जकड़न को दूर करने का गुण है. सैद्धातिक तौर पर दावाव किया जाता है कि इससे साइड एफेक्ट कम होता है. उनका कहना है कि सालबुटामॉल का उत्पादन बंद नहीं किया जाना चाहिये. इतने दिनों तक तो उसी से दमा का इलाज किया जाता रहा है. सालबुटामॉल से कुछ लोगों के हृदय की धड़कन बढ़ जाती है. इसके बावजूद यह एक प्रभावकारी दवा है.

उनसे हमें जानकारी मिली कि आजकल कई दवा कंपनियां अन्य दवाओं के भी लीवो मालीक्यूल को लेकर आ गई है. दो कंपनियां तो अपने सारे दवा लीवो मालीक्यूल वाले ला रहीं हैं.

जब हमने इस विषय पर बिलासपुर के शिशु रोग विशेषज्ञ किरण देवरस से पूछा तो उन्होंने बताया कि आजकल सालबुटामॉल मिलता कहां हैं. लीवो सालबुटामॉल ज्यादा मितला है. किरण देवरस का कहना था कि दोनों में कुछ खास फर्क नहीं है केवल सालबुटामाल से हृदय की धड़कन बढ़ जाती है. हमने किरण देवरस की बात की जांच करने के लिये पास के ही दवा दुकान ईशान मेडिकल के संचालक संदीप काटोलकर से पूछा कि दमा रोगियों के द्वारा उपयोग में लाई जानी वाली एसथेलिन तथा वोन्टोरलिन इन्हेलर है क्या उनका जवाब था कि मेरे पास तो दोनों नहीं है. संदीप काटोलकर ने कहा कि उनके पास दमा का इन्हेलर लीवोलिन अवश्य 5-6 पीस है.

उल्लेखनीय है कि पहले की दोनों दवाओं में सालबुटामॉल है तथा लीवोलिन में लीवो सालबुटामॉल है. दोनों दवाओं के मूल्य में फर्क है. एस्थेलिन इन्हेलर जहां 95 रुपयों में मिलता है वहीं लीवोलिन इन्हेलर 120 रुपयें का आता है. गौरतलब है कि दोनों दवाएं एक ही कंपनी सिपला बनाती है.

हमने लीवो सालबुटामॉल पर दो अन्य शिशु रोग चिकित्सकों की राय ली. बिलासपुर के ही अरविंद शुक्ला ने बताया कि लीवो सालबुटामॉल में साइट एफेक्ट कम होता है. वहीं अभिजीत सेन ने बताया कि निश्चित तौर पर लीवो सालबुटामॉल बेहतर दवा है. इसके बाद हमने फिर से अपना रुख किया फीजिशियन सरोज तिवारी के क्लिनिक की ओर. जब हमने उनसे पूछा कि क्या लीवो मालीक्यूल में साइड एफेक्ट कम होता है तो उन्होंने फिर से कहा कि दावा तो दवा कंपनिया ऐसी ही करती है तथा सैद्धांतिक तौर पर यह सही भी है.

उन्होंने हमें याद दिलाया कि तुमको ही तो एक चिकित्सक ने उच्च रक्तचाप के लिये एमलोडिपीन दवा दी थी. जिससे तुम्हारे पैर में सूजन आ गई थी. जिस पर मैंने तुम्हे एस एमलोडिपीन की दवा दी थी लेकिन कुछ समय बाद उससे भी पैरों में सूजन आने लगी तब दूसरी दवा देनी पड़ी थी.

उल्लेखनीय है कि लीवो सालबुटामॉल की दवा का पेटेंट भारतीय दवा कंपनी सिपला के पास है. जिसका पेटेंट नंबर है us12/502,608. इस दवा के लिये सिपला कंपनी ने 14 जुलाई 2009 को पेंटेट के लिये अमरीका में आवेदन किया था तथा इसे 29 मार्च 2011 को प्रकाशित किया गया था. जाहिर है कि यह दवा लीवो सालबुटामॉल कुछ सालों पुरानी दवा है. इससे सवाल उठता है कि यदि यहीं दवा बेहतर है तो तभी से क्यों नहीं सालबुटामॉल को बंद करके इसी बाजार में लाया गया. अब जबकि 15 मई 2013 से सालबुटामॉल को मूल्य नियंत्रण को तहत लाया गया है तो लीवो सालबुटामॉल की याद दवा कंपनियों को आ रही है. हमने पहले ही शंका जाहिर की थी कि इसके नेपथ्य में मुनाफाखोरी ही मूल तत्व है.

ऐसा नहीं है कि सारा दोष केवल दवा कंपनियों के सिर पर मढ़ा जा सकता है. इसके लिये सरकार की नीतियां भी जिम्मेदार हैं जिसमें चोर दरवाजे दिये गये हैं. 2013 के दवा मूल्य आदेश को गहराई से देखने पर पता चलता है कि उसमें घोषित तौर पर दमा की केवल चार दवाओं को शामिल किया गया है. बीक्लोमेथासोन, हाइड्रोकार्टिसोन, सालबुटामाल तथा इप्राट्रोपियम. जिसमें से पहली दोनों स्टीरायड है जिनका उपयोग कम ही किया जाता है.

जबकि छाती की जकड़न को दूर करने वाली केवल दो ही दवाओं को मूल्य नियंत्रण आदेश के दायरे में लाया गया है. इसी कारण से जब किसी दवा को मूल्य नियंत्रण के तहत लाया जाता है तो दवा कंपनियां उसी समूह की दूसरी ऐसी दवाओं को बनाने तथा बेचने लग जाती हैं जो मूल्य नियंत्रण के तहत न हो. इस कौंमबीमिस्ट को साथ भी यही हुआ है.

जरूरत इस बात की है कि केन्द्र सरकार सभी आवश्यक तथा जीवन रक्षक दवाओं को मूल्य नियंत्रण के दायरे में लाये जिससे इसका लाभ मरीजों को मिल सके. लाख बंधन मुक्त होने के दावे किये जाने के बावजूद वास्तव में चिकित्सकों को बाजार में उपलब्ध दवाओं से ही मरीजों का उपचार करना पड़ता है. बाजार में दवा उपलब्ध तभी हो सकती हैं जब उन्हें दवा कंपनिया बनाये तथा मार्केटिंग करे. चूंकि, आज के तारीख में सरकारी दवा कंपनियों का अस्तित्व नहीं के बराबर है इसलिये निजी दवा कंपनियों को मनमानी करने की छूट मिली हुई है.

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