छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में जैविक खेती

रायपुर | एजेंसी: केंद्र सरकार ने छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले को जैविक कृषि के लिए मॉडल के रूप में घोषित किया है. सभ्यता से लंबे समय तक छिटके रहे भूसारास, हीरानार और सूरनार जैसे दंतेवाड़ा जिले के गाँवों में ऐसे सफल प्रयोग हुए हैं जिन्होंने दो हजार साल से चल रही कृषि की दिशा एवं दशा को बदल दिया है. हाइब्रिड बीजों, फर्टिलाइजर, कीटनाशक और महंगे कृषि उपकरणों का इस्तेमाल किए बगैर अनोखे तरीके से की गई खेती से दंतेवाड़ा जिले के गाँवों के किसानों ने सामान्य से चार से पाँच गुना अधिक उत्पादन हासिल किया.

जैविक खेती के माध्यम से उपजाए धान को जिला प्रशासन ने वनोपज समिति के माध्यम से समर्थन मूल्य से अधिक दामों में खरीदा. 300 किसानों से शुरू हुए इस प्रयोग की सफलता ने जिले के अन्य किसानों में जैविक खेती का तीव्र आकर्षण पैदा कर दिया है. परिणाम से उत्साहित होकर जिला प्रशासन जैविक धान उपजाने वाले किसानों की कंपनी बनाने पर विचार कर रहा है ताकि किसान अपने उपजाये धान का मूल्य स्वयं तय कर सके बजाय बाजार की शक्तियों पर निर्भर रहने के.


कलेक्टर केसी देवसेनापति कहते हैं कि कृषि के क्षेत्र में छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में किए गए प्रयोगों का महत्व केवल इस बात में नहीं है कि किसान कम लागत में अधिक उत्पादन हासिल करें, यह उस क्रांति की दिशा में बढ़ाया गया कदम है जहाँ किसान परंपरागत साधनों का प्रयोग करते हुए बाजार पर निर्भर हुए बिना अपने खेतों की ऊर्वरा शक्ति बढ़ा सकते हैं और जल तथा जमीन को प्रदूषित होने से बचा सकते हैं.

इसके लिए किसानों को परंपरागत बीज छिड़काव पद्धति के बजाय श्री पद्धति से खेती करने कहा गया. जिला प्रशासन ने इसके लिए किसानों को नि:शुल्क वीडर भी दिए जिनसे बड़ी आसानी से खरपतवार निकाले जा सकते हैं.

सेनापति ने छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा के किसानों तथा ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारियों को प्रशिक्षित करने जैविक खेती के विशेषज्ञ अरुणाचलम एवं जैकब नेल्लीयम को विशेष रूप से आमंत्रित किया . विशेषज्ञों ने इन्हें पंचगव्य एवं जीवामृत जैसे विशेष जैविक खाद बनाने के लिए प्रशिक्षित किया. उन्होंने लोगों को पंचगव्य तथा जीवामृत बनाना सिखाया, पंचगव्य दूध, दही, गोबर, गोमूत्र से बना पदार्थ है इसके प्रयोग से पौधों की ग्रोथ तेजी से होती है. जीवामृत गोबर, गूड़, आटा व अन्य प्राकृतिक पदार्थों से बना जैविक खाद है इससे नाइट्रोजन स्थिरीकरण को बढ़ावा मिलता है.

इसके साथ ही अन्य जैविक खाद, वर्मीकम्पोस्ट एवं मछली खाद का प्रयोग भी किया गया. इस प्रकार आवश्यक पोषक तत्वों के साथ फसलचक्र के लाभ भी जमीन को मिल जाते हैं. फसल की कीटों से रक्षा के लिए रासायनिक कीटनाशक के बजाय जैविक कीटनाशक का प्रयोग किया गया. करंज, सीताफल, नीलगिरी, लहसुन, मिर्ची जैसे पौधों का उपयोग किया गया. इनकी कड़वाहट ने कीटों को फसल से दूर रखा और किसी भी प्रकार का दुष्प्रभाव पौधों पर नहीं पड़ा. हजारों साल से हो रही परंपरागत खेती की छिड़काव पद्धति की बजाय श्री पद्धति से व्यवस्थित तरीके से खेती करना सिखाया गया.

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