छत्तीसगढ़ में किसानों को राहत, ‘सूखा’

रायपुर | जेके कर: छत्तीसगढ़ में किसानों को सूखा राहत के नाम पर ‘सूखा हुआ राहत’ दिया जा रहा है. छत्तीसगढ़ में बारिश कम होने के कारण 117 तहसीलों को सूखा घोषित किया गया है. जहां पर प्रति किसान को औसतन 1900, 2 हजार, 3 हजार, 4 हजार, 6 हजार तथा कुछ स्थानों में 9 हजार रुपया सरकार की तरफ से सूखा राहत के तौर पर मिला है.

सूखा राहत पर चर्चा करने से छत्तीसगढ़ के कृषि मामलों के जानकार नंदकुमार कश्यप ने सीजी खबर से कहा हमारे राज्य में औसतन किसानों के पास तीन से पांच एकड़ तक की जमीन है. किसान एक एकड़ जमीन से 15-20 क्विंटल तक धान की पैदावार करता है. प्रति क्विंटल धान का उन्हें सरकार से 1,470 रुपया मिलता है. इस तरह से औसतन एक एकड़ से किसान को 22 हजार से 29 हजार तक मिल जाता है.

उन्होंने कहा इस तरह से छत्तीसगढ़ के किसान को औसतन धान का 66 हजार रुपये से लेकर 87 हजार रुपये तक मिल जाता है. किसान धान के बाद सब्जी की भी खेती कर लेता है. कई तो तीन फसल तक ले लेते हैं.

जाहिर है कि सूखा न पड़ने से तथा फसल होने से छत्तीसगढ़ के किसान धान की पैदावार से ही 66 हजार से लेकर 87 हजार रुपया पा जाते हैं. इसमें से उन्हें धान के बीज, खाद तथा बिजली आदि का खर्च भी निकालना पड़ता है. उसके बाद जो बचता है उससे उसके परिवार का भरण-पोषण होता है.

सूखा राहत
आइये, अब देखते हैं कि इस बार सूखा पड़ने के कारण छत्तीसगढ़ के किसानों को सूखा राहत के नाम पर कितनी रकम मिली है. सरकारी तौर पर उपलब्ध करवाये गये आकड़ों के अनुसार डौंडीलोहारा विधानसभा में 2015-16 में कुल 37,937 किसानों को 18,34,29,447 का मुआवजा दिया गया. इस तरह से औसतन इस विधानसभा क्षेत्र के किसानों को 4,835 रुपयों का मुआवजा मिला.

इसी तरह से केशकाल विधानसभा क्षेत्र में केशकाल तहसील में 15 जून 2016 की स्थिति में 10,822 को 5,57,58,933 रुपये, बड़ेराजा तहसील में 8,867 किसानों को 3,43,40,538 तथा फरसगांव तहसील के 10,429 किसानों को 6,66,03,645 रुपया सूखा राहत के तौर पर भुगतान किया गया.

इस तरह से केशकाल तहसील में किसानों को 5,152 रुपया, बड़ेराजा तहसील में 6,386 रुपया तथा फऱसगांव तहसील में भी 6,386 रुपया सूखा के तौर पर वितरित किया गया.

मुंगेली तथा बिलासपुर जिलों का हाल भी इसी तरह का रहा है. मुंगेली तहसील के 1,783 किसानों को 46,60,472 रुपये याने 2,613 रुपया, लोरमी तहसील के 131 किसानों को 3,94,300 रुपये याने 3,009 रुपया, बिलासपुर तहसील के 3,245 किसानों को 1,03,22,832 को प्रति किसान औसतन 4,402 रुपया, बिल्हा तहसील के 4,355 किसानों को 85,73,800 रुपया याने औसतन 1,968 रुपया, मस्तूरी तहसील के 1,560 किसानों को 99,18,711 रुपया याने औसतन हर किसान को 6,358 रुपया, कोटा तहसील के 112 किसानों को 4,46,673 रुपया याने 3,988 रुपया, पेण्ड्रारोड तहसील के 16,561 किसानों को 6,70,00,000 रुपया याने प्रति किसान औसतन 4,045 रुपया, पेण्ड्रा के 2,475 किसानों को 1,26,40,887 रुपया याने प्रति किसान 5,107 रुपया तथा मरवाही तहसील के 14,982 किसानों को 13,76,96,645 रुपया याने 9,190 रुपया औसतन दिया गया है.

इसी तरह से रायगढ़ जिले में 2015-16 में केवल बरमकेला विकासखण्ड के 4 ग्रामों के कुल 158 किसानों को 11,24,556 रुपया सूखा राहत के तौर पर दिया गया. यहां भी औसतन प्रति किसान को 7,117 रुपया ही मिला.

बस्तर विधानसभा के बस्तर विकासखण्ड तथा बकावण्ड विकासखण्ड के 21,912 किसानों को 12,47,58,360 का राहत भुगतान किया गया. यहां पर प्रति किसान को औसतन 5,693 रुपया मिल सका

कहां तो धान की फसल होने पर किसानों को 66 हजार से लेकर 87 हजार रुपया तक मिल जाता है और वहां पर उन्हें महज औसतन 1900, 2 हजार, 3 हजार, 4 हजार, 6 हजार तथा कुछ स्थानों में 9 हजार रुपया सरकार की तरफ से सूखा राहत के तौर पर मिला है. जाहिर है कि किसानों को 60 हजार रुपये से लेकर 80 हजार रुपये तक का घाटा उठाना पड़ा है. फिर ऐसा सूखा राहत किस काम कि जिससे बीज या खाद तक की लागत भी न निकल सके.

फसल बीमा
जहां तक फसल बीमा का सवाल है इसके लिये एक उदाहरण ही काफी है. छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के खल्लारी विधानसभा क्षेत्र के बागबहरा, पिथौरा तथा महासमुंद के 50,525 किसानों में से 28,506 किसानों को 33,14,76,699 रुपये दिये गये. इस तरह से प्रति किसान औसतन 11,628 रुपया दिया गया.

यदि बीमा की राशि को भी सूखा राहत के साथ जोड़ा जाये तो मुश्किल से ही बीज तथा खाद की लागत निकल पाती है. यह दिगर बात है कि फसल बीमा की जमीनी हकीकत सरकारी आकड़ों से अलग है. छत्तीसगढ़ के कटघोरा के रंगबेल गांव के किसान दिलराज सिंह को 5 हेक्टेयर से ज्यादा की जमीन होने के बावजूद बीमा कंपनी ने मात्र 40 पैसे मुआवजे का भुगतान किया है. वहीं कटघोरा के खैरभवना के एक किसान को ढ़ाई एकड़ भूमि में फसल बर्बाद होने का मुआवजा 18 रुपये दिया गया है.

बीबीसी की खबर के अनुसार कोरिया जिले में किसानों को 5 रुपया से 25 रुपया तक का मुआवजा मिलने की खबर आई थी. जाहिर है कि सरकारी दावे तथा जमीनी हकीकत में जमीन-आसमान का फर्क है.

इसी तरह से कोरिया जिले में केवल छींदडांड़, धौराटिकरा, पटना और कंचनपुर गाँवों के आंकड़ों को देखें तो इन गाँवों के 3,429 किसानों को 25 रुपए प्रति हेक्टेयर की दर से 1 लाख़ 27 हज़ार 336 रुपए 75 पैसे का भुगतान किया गया.

नंदकुमार कश्यप ने कहा किसानों को बीमा कंपनियां प्रीमियम के आधार पर मुआवजा दे रही है जबकि इसी फसल से किसान की आजीविका जुड़ी हुई है. किसानों को जीवित रखने के लिये मुआवजा उसकी जरूरतों के आधार पर तय करना चाहिये. बीमा कंपनियां तो औद्योगिक हिसाब से मुआवजा देती है. जहां, उद्योग के बंद हो जाने पर उद्योगपति को कोई फर्क नहीं पड़ता है परन्तु किसान तो फसल खराब होने पर तबाह हो जाता है.

एक दूसरे किसान नेता आनंद मिश्रा का कहना है कि राज्य बनने के बाद से ही फ़सल बीमा के नाम पर अंधाधुंध लूट मची हुई है. मिश्रा का दावा है कि अगर पिछले 16 सालों में लागू इस तरह की फ़सल बीमा योजनाओं की जाँच करवा ली जाए तो कई अरब रुपए का घोटाला सामने आयेगा.

ऋण माफी
सूखाग्रस्त तहसीलों में किसानों को ऋण माफ किया जा रहा है. यहां पर सूखा राहत योजना के अंतर्गत 75% राशि जमा करने पर 25% दिया जाता है. उदाहरण के तौर पर बरमकेला के 4 गांव के कुल 7 किसानों को 42,00,011 रुपये ऋण माफी का लाभ दिया गया है.

अब बताइये जहां सूखा पड़ा हो वहां किसान बैंक से लिये गये ऋण का 75% कहां से जमा करवायेगा.

जाहिर है कि सूखा पड़ने के कारण छत्तीसगढ़ में किसानों की आत्महत्या की घटनायें बढ़ गई है. खुद सरकारी आकड़ों के अनुसार साल 2013-14 से इस साल 15 जून तक केवल राजनांदगांव में ही 15 किसानों ने आत्महत्या कर ली है. पूरे राज्य में किसानों की आत्महत्या की संख्या पर गौर करे तो छत्तीसगढ़ सरकार के ही आकड़ों के अनुसार 7 माह में 70 किसानों ने आत्महत्या की है. छत्तीसगढ़ में सितंबर 2015 से लेकर 12 फरवरी 2016 के मध्य कुल 70 किसानों ने आत्महत्या की है.

हमारा देश एक कृषि प्रधान देश है. यदि इसी देश में किसानों को मुनाफा तो छोड़िये सूखा पड़ने पर माकुल राहत तक नहीं दी जा सकती है तो हमारा देश कैसे आगे बढ़ेगा. यह कहना गलत न होगा कि यह कृषि संकट एक दिन देश के सामने खाद्य संकट के रूप में आ खड़ा होगा.

दूसरी तरफ, इसी देश के बैंकों का 9 हजार करोड़ रुपये डकार कर विजय माल्या जैसे उद्योगपति हवाई जहाज से फुर्र हो जाते हैं. अब देश का कानून भी बेबस है और माल्या लंदन में ऐश कर रहा है.


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