स्मार्ट फोन का चुनावी दांव

दिवाकर मुक्तिबोध
छत्तीसगढ़ के अगले चार महीने राजनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण होंगे. नवंबर-दिसंबर में तय हो जाएगा राज्य की रमन सिंह सरकार कितने पानी में है. भाजपा, मुख्यमंत्री रमन सिंह के नेतृत्व में लगातार चौथी बार हर सूरत में विधान सभा चुनाव जीतना चाहती हैं क्योंकि उसे अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव के संदर्भ में प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी को जवाब देना है.

पिछले लोकसभा चुनाव में प्रदेश भाजपा ने रमन सिंह के ही नेतृत्व में राज्य की 11 में से 10 सीटें जीती थीं लेकिन तब नरेन्द्र मोदी प्रधान मंत्री नहीं, प्रधान मंत्री पद के एकमात्र दावेदार थे और भाजपा ने उन्हीं पर दाँव खेलकर चुनाव जीता था. लेकिन तब के नरेन्द्र मोदी और आज के नरेन्द्र मोदी में बड़ा अंतर आया है.


आज के नरेन्द्र मोदी आम कार्यकर्ताओं के बीच आम कार्यकर्ता नहीं है. अब उनके पास फटकने से ही प्रादेशिक नेताओं व कार्यकर्ताओं की रूह काँपती है. वे और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ही सब कुछ है जिनकी हल्की सी वक्र दृष्टि भी किसी को भी किनारे लगा सकती है, राजनीति में उसका काम तमाम कर सकती है. रमन सिंह को इसी की चिंता है. यदि राज्य विधान सभा का चुनाव न जीत पाए तो लोकसभा के चुनाव का क्या होगा? उस चुनाव का जिसमें मोदी की प्रतिष्ठा, उनकी तथाकथित लोकप्रियता, कर्मठता, वैचारिकता और देश में सब कुछ बदल देने की अटूट लालसा दाँव पर लगी हुई है. ऐसे में उन राज्यों में जहां भाजपा की सरकार हैं और जहाँ विधान सभा के चुनाव नज़दीक हैं, के दिग्गज नेताओं के लिए यह जीवन-मरण का प्रश्न है.

ज़ाहिर है ये दोनों चुनाव मुख्यमंत्री रमन सिंह के लिए भी किसी अग्नि-परीक्षा से कम नहीं. उनका अब तक उज्ज्वल रहा राजनीतिक क़द और उसका भविष्य किस ओर मुड़ेगा, यह अगले 4-6 महीनों में तय हो जाएगा. भविष्य की इसी चिंता के वशीभूत रमन सिंह चुनाव में एक बार पुन: कांग्रेस को पटखनी देने के लिए हर तरह के तरीक़े आज़मा रहे हैं. जनता का विश्वास जीतने के उनके अभियान में बला की तेज़ी आयी है.

वे गत पन्द्रह सालों से भरी गर्मी में गाँवों में जन-सम्पर्क यात्राएं करते रहे हैं. उनकी ग्राम सुराज-लोक सुराज यात्रा यानी जनता की शिकायतें सुनने के लिए उनसे सीधा संवाद कार्यक्रम तो अपनी जगह है ही, इसके अलावा चुनाव की दृष्टि से इस बार पुन:-पुन: जनता के दरबार में जाने और उन्हें भावनात्मक रूप से जोडऩे का उनका संकल्प है जिसे विकास यात्रा का नाम दिया गया है. विकास यात्रा का एक चरण पूरा हो चुका है, जिसमे सरकार द्वारा किये जा रहे हज़ारों करोड़ों के विकास कार्यों का ढोल पिटा गया एवम घोषणाओं की झंडी लगाई गई.

पिछले कऱीब दो वर्षों में तो प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी व राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह सहित अनेक केन्द्रीय मंत्री एक से अधिक बार छत्तीसगढ़ आए तथा सरकार की पीठ थपथपाकर चले गए. विकास यात्रा का दूसरा और अन्तिम चरण इसी अगस्त के अंतिम सप्ताह से शुरू होगा जो सितंबर तक चलेगा जिसमें गऱीब परिवारों में प्रमुखत: मोबाइल फोन व टिफिन बाँटे जाएंगे.

चुनाव नवंबर-दिसम्बर में होंगे अत: आदर्श आचार संहिता संभवत: अक्टूबर के पहले पखवाड़े में लागू कर दी जाएगी यानी अगस्त -सितंबर, सरकार के ये दो महीने पूर्णत: जनता को समर्पित रहेंगे. वोटरों को भाजपा की घुट्टी पिलाने की तमाम कोशिशों के बावजूद संगठन के नेता सशंकित हैं क्योंकि इस बार लड़ाई पूर्व की तुलना में ज़्यादा काँटेदार है लिहाजा अभी यह कहना नामुमकिन-सा है कि गऱीब आदिवासियों, हरिजनों व अति पिछड़ों के तथाकथित उत्थान व विकास का रमन-जादू इस बार भी चल पाएगा.

कई कारण हैं, जिनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि राज्य में गत 15 वर्षों से सत्तारूढ़ भाजपा सरकार लाख कोशिशों के बावजूद, संभावना और विश्वास के आधार पर पहले व दूसरे कार्यकाल में गढ़ी गई अपनी पूर्व जैसी छवि क़ायम नहीं रख पायी है.

वर्ष 2013 – 2018 का कार्यकाल जो अभी चल रहा है, पहले की तुलना में एकदम उलट रहा है. वह तेज़ी से अलोकप्रियता की ओर बढ़ी है हालाँकि तरह-तरह की योजनाओं के माध्यम से उसने जनता को यह संदेश देने की भरसक चेष्टा की है कि उनका भला केवल भाजपा ही कर सकती है, कांग्रेस नही. लेकिन इसके लिए बीच-बीच में जो तरीक़े अख्तियार किए जाते रहे हैं, वे उसके झूठ को बेनक़ाब करते हैं.

ऋणग्रस्त किसानों की आत्महत्या के सैकड़ों उदाहरण मौजूद हैं जो राज्य में खेती, खेतिहर मज़दूर व सीमांत कृषकों की दारूण स्थिति को बयान करते हैं लेकिन आश्चर्य है, राज्य सरकार को अब तक आधा दर्जन से अधिक कृषि के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं. लिहाजा संशय स्वाभाविक है. लोगों की आय नि:संदेह बढ़ी है लेकिन किनकी? भीषण महँगाई ने हिसाब बराबर कर दिया है. गऱीब जहाँ के तहां है. प्रत्येक बीपीएल परिवार को सरकारी योजनाओं का समुचित लाभ नहीं मिला है. अमल के स्तर पर और भ्रष्टाचार की वजह से योजनाएं अपना लक्ष्य खो बैठी हैं.

यह कितनी विचित्र बात है कि गरीबी की मार झेलते गऱीबों से यह कहलवाया जाता है कि उनकी आमदनी बढ़ी है. मिसाल के तौर पर कांकेर जिले के कन्हारपुरी गाँव की चन्द्रमणि कौशिक के मामले को लें, एक राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल ने सरकारी लफ्फ़़ाज़ी का पोस्टमार्टम किया था. 20 जून को वीडियो कान्फ्रेसिंग के ज़रिए सीधी बातचीत के क्रम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस ग्रामीण महिला से खेती किसानी व आय के संबंध में पूछा था. चन्द्रमणि ने जवाब दिया, उसकी आय दुगुनी हो गयी है. लेकिन सच यह था कि आय धान की पैदावार से नहीं, अन्य स्तोत्रों की वजह से बढी.

दरअसल मोदी सरकार ने साल 2022 तक देश के किसानों की आय दुगुनी कर देने का बीड़ा उठाया हुआ है. कहा जाता है कि केन्द्र के अफ़सरों ने अपने नंबर बढ़ाने के लिए ऐसा उपक्रम किया. हालाँकि राज्य शासन की तरफ़ से बाद में यह ज़रूर कहा गया कि सीताफलों की वजह से दो एकड़ की भूस्वामिनी चन्द्रमणि की आय बढ़ी.

बहरहाल इस तरह दिखावे की राजनीति का कोई ओर-छोर नहीं है. मुख्यमंत्री अंबिकापुर में व राष्ट्रपति दंतेवाड़ा जिले के एक गाँव टेकनार में उस ई-रिक्शा पर सवारी गाँठते हैं जिसकी चालक स्वसहायता समूह की महिलाएँ हैं. दोनों से उनकी आय के बारे में पूछा जाता है, जवाब सकारात्मक मिलता है, यानी आय में इज़ाफ़ा.

मतलब साफ़ है. आम जनता के लिए संदेश है कि सरकार के लोककल्याणकारी कार्यों की वजह से ग्रामीण महिलाएँ स्वावलंबी बन रही हैं तथा परिवार गरीबी रेखा से उपर उठ रहे हैं. यह संदेश कई माध्यमों व उपक्रमों के ज़रिए पहुँचाया जा रहा है. ग्रामीणों को हाई-टेक बनाने के नाम पर कऱीब 50 लाख शहरी व ग्रामीण महिलाओं तथा कॉलेज छात्रों को मुफ़्त स्मार्ट फ़ोन उपलब्ध कराना इसका ताज़ातरीन उदाहरण है. प्रदेश कांग्रेस ने लगभग 2200 करोड़ की इस योजना में भारी भ्रष्टाचार की आशंका व्यक्त की है.

दरअसल सरकार और पार्टी ने कऱीब एक करोड़ इक्यासी लाख मतदाताओं को रिझाने के लिए एक तरह से सरकारी खज़़ाने का मुँह खोल दिया है. विकास कार्यों की घोषणाएँ तो ख़ैर अपनी जगह तो है ही, वस्तु-भेंट पर भी विचार होता रहा है. यानी जनता को आकर्षित करने, कथित राहत पहुँचाने हर स्तर पर घनघोर प्रयत्न.

राज्य में विधान सभा की कुल 90 सीटें हैं और इस बार पार्टी का मिशन है-65 प्लस. यानी पिछली संख्या के मुक़ाबले 16 सीटें अधिक जीतने का लक्ष्य. इस अत्यधिक कठिन चुनौती को पूरा करना और वह तब जब कांग्रेस पूर्व की तुलना में ज़्यादा संगठित, ज़्यादा लोक केन्द्रित व ज़्यादा आक्रामक है, लगभग असंभव है.

हालाँकि तगड़ा बूथ मैनेजमेंट, गाँव-गाँव, शहर-शहर, घर-घर दस्तक, असीमित संसाधन, बेशुमार पार्टी-फ़ंड तथा लोक-जीवन को सुगम, सरल व उन्नत बनाने-दिखाने के लिए तरह-तरह के सरकारी उपायों व उपहारों के दम पर पार्टी यह मान बैठी है कि चौथी बार भी उसकी सरकार बनने वाली है. पर जनता क्या सोचती है, पार्टी को इसका भान नहीं है. किंचित है भी तो उसका खय़ाल है कि यदि शहरी मतदाताओं ने साथ नहीं दिया तो ग्रामीण क्षेत्रों से इसकी भरपाई कर ली जाएगी. इसीलिए पार्टी ने बस्तर, सरगुजा व बिलासपुर संभाग में ज़बरदस्त ज़ोर लगा रखा है.

सरकार को अपने मोबाइल अभियान पर भी पूरा भरोसा है. संचार क्रान्ति योजना के तहत कऱीब 50 लाख 4 जी मोबाइल सेट महिलाओं व कालेज छात्रों को मुफ़्त में देने का काम शुरू हो चुका है. इस योजना का भारी प्रचार-प्रसार हुआ. योजना को राज्य के डिजिटल युग में प्रवेश का देश का सबसे बड़ा अभियान निरूपित किया जा रहा है. मुख्यमंत्री खुद जगह-जगह कार्यक्रम कर रहे हैं तथा कुछ महिलाओं को तीजा-त्योहार पर भाई की ओर से बहनों को मोबाइल का उपहार बताते हुए करोड़ों के नये विकास कार्यों की घोषणाएँ कर रहे हैं. सरकार इस अभियान पर भारी भरकम राशि ख़र्च कर रही है.

मुख्यमंत्री कहते हैं- छत्तीसगढ़ में मोबाइल क्रान्ति आ गई है. वह सूचना व संचार के नये युग में प्रवेश कर रहा है. मोबाइल के एक क्लिक पर सभी सरकारी योजनाओं, जीवन से जुड़ी सार्वजनिक सुविधाओं व अन्य जानकारियाँ रमन-मोदी एप पर हैं. इस फ़ोन को चालू रखने के लिए 1600 नये टावर खड़े किये जाएँगे तथा 4 हजार नये गाँव मोबाइल नेटवर्क के दायरे में आ जाएँगे. कुल 40 लाख महिला मतदाताओं व 15 लाख नये युवा छात्र मतदाताओं को लुभाने पार्टी इसे नायाब अस्त्र मान रही हैं.

लेकिन मन को जीतने की यह कोशिश कितनी कामयाब होगी, इसमें शंका ही शंकाएँ हैं क्योंकि गाँव-देहातों के रहवासियों की प्राथमिकता मोबाइल नहीं, स्वच्छ पेयजल, समुचित स्वास्थ्य सुविधा, बेहतर शिक्षा, सहज सड़क संपर्क व रोजग़ार है जिसकी भारी कमी है.

मिसाल के तौर पर स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता का हाल यह है कि राजधानी से लगभग 90 किलोमीटर दूर गरियाबंद जिले के ग्राम सुपाबेडा में किडनी की बीमारी से अब तक 66 से अधिक मौतें हो चुकी हैं तथा 200 से अधिक इस बीमारी से जूझ रहे हैं. अधिकृत रूप से यह कहा गया कि यहाँ पानी में फ्लोराइड की मात्रा मानक स्तर से 500 गुना अधिक है. यह है गांवों में पेयजल की उपलब्धता व शुद्धता का हाल.

वन ग्रामों में स्थिति तो और भी भयावह है. बस्तर-सरगुजा में प्रति वर्ष दूषित पानी की वजह से डायरिया से होने वाली मौतों पर अभी भी पूर्ण विराम नहीं लगा है. अब सवाल है, सरकार की प्राथमिकताओं का. ज़ाहिर है, चुनावी वर्ष में प्राथमिकता चुनाव जीतना है. सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा व स्वास्थ्य जैसी प्राथमिक जनसुविधाएं तो सतत चलने वाली समस्याएँ हैं. ये प्राथमिकता की सबसे निचली पायदान पर हैं अन्यथा पिछले पन्द्रह सालों इस मोर्चे पर स्थिति कुछ तो बेहतर हो सकती थी, जबकि सरकार नई राजधानी जिसमे बसाहट नहीं के बराबर है, तथा अन्य भौतिक संरचनाओं के विकास पर अब तक अरबों रूपये ख़र्च कर चुकी है.

बहरहाल सरकार पूर्णत: चुनावी मोड़ में आ गई है. मोबाइल के अलावा मुफ़्त बाँटने के अभियान में सरकार इसी माह से एक और अस्त्र चलाने वाली है. यह टिफिऩ के रूप मे है. कऱीब 11 लाख मनरेगा श्रमिकों को तीन डिब्बे वाला टिफिऩ बांटा जाएगा ताकि काम पर जाते हुए वे अपना भोजन सलीक़े से ले जा सके. श्रमिक मतदाताओं को लुभाने की यह कोशिश रंग ला पाएगी, कहना मुश्किल है पर सरकार ऐसा कोई घर ख़ाली नहीं छोडऩा नहीं चाहती जहाँ उसे शिकस्त मिले. लेकिन यदि व्यवस्था के ख़िलाफ़ जन-असंतोष तीव्र हो तो उसे रोक पाना किसी भी सरकार के लिए मुश्किल होता है और छत्तीसगढ़ में मौजूदा भाजपा सरकार के प्रति यह कम नहीं है.

15 साल, एक लंबी अवधि होती है जो यह तय करती है कि शासन का कामकाज सही ढंग से चल रहा है अथवा नहीं और यदि वह व्यवस्थित व जन-केन्द्रित नहीं है तो असंतोष का लावा खदबदाने के साथ ही विस्फोट के रूप मे बाहर पडऩे को आतुर रहता है. प्रदेश व राजधानी में एक-डेढ़ साल से राजनीतिक व ग़ैरराजनीतिक आंदोलनों से इसे महसूस किया जा सकता है जिसमें से कुछ में सरकार को बैकफ़ुट में आना पड़ा है. सरकार अभी भी सरकारी कर्मचारियों के आंदोलनों से जूझती नजऱ आ रही है.

राज्य में तथाकथित मोबाइल क्रांन्ति का यह हाल है कि राजधानी से सटे इलाक़े नेटवर्क की समस्या से दो-चार हो रहे हैं. इससे अंदाज लगाया जा सकता है कि दूरस्थ क्षेत्रों में स्थिति क्या होगी. हाथ में मोबाइल होगा पर नेटवर्क नहीं मिलेगा. प्रदेश मे फि़लहाल इसकी केवल 29 प्रतिशत कनेक्टिविटी है. ज़ाहिर बिना नेटवर्क के ये स्मार्ट फोन किसी काम के नहीं. इनका हाल वैसा ही होना है जो उज्ज्वला गैस योजना का है. गऱीब परिवार सिलेंडर रिफिलिंग के लिए पैसा कहां से लाए ?

राज्य से रोज़ाना पीएमओ पहुँचने वाली 50 से 70 शिकायतों मे अधिकांश उज्ज्वला योजना, शौचालय व प्रधानमंत्री आवास से संबंधित है. भ्रष्टाचार का दंश इस क़दर है कि जन-कल्याणकारी योजनाएँ माक़ूल निगरानी के अभाव में दम तोड़ रही है. स्पष्ट है सरकार को केवल अपनी सत्ता को क़ायम रखने की फि़कर है.

लगभग मुफ़्त चावल, मुफ्त तीर्थ यात्रा, प्रदेश की कऱीब 10 हजार नागरिक निकायों तथा ग्राम पंचायतों के सदस्यों को मुफ़्त राजधानी दर्शन और अब मुफ़्त मोबाइल व मुफ़्त टिफिऩ मतदाताओं को नैतिक रूप से बंधक बनाने की रणनीतिक कोशिश है. ऐसी कोशिशों से मतदाताओं का मन कितना बदल पाएगा, सरकार व पार्टी पर विश्वास क़ायम रह पाएगा या मुफ़्त सुविधाओं का भोग लगा लेने के बावजूद वे खिलाफ़ वोट करेंगे, इस बारे में अभी अनुमान लगाना बड़ा मुश्किल है. लेकिन यह तय है कि सत्ता विरोधी लहर एक बड़े कारक के रूप में सारी संभावनाओं को ध्वस्त कर देती है. छत्तीसगढ़ में इसका अक्स दिखने लगा है.
* लेखक हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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