मासूम के रेपिस्ट को फांसी की सजा

रायगढ़ | समाचार डेस्क: तीन साल के मासूम की रेप के बाद हत्या करने वाले को फांसी की सजी सुनाई गई. रायगढञ में इसी साल 25 फरवरी को रेप करने के बाद उसकी हत्या करने वाले आरोपी लोचन श्रीवास्तव को फास्ट ट्रैक कोर्ट के न्यायाधीश योगेश पारिख ने फांसी की सजा का ऐलान शुक्रवार को किया है. रायगढ़ की फास्ट ट्रैक कोर्ट ने रेप तथा हत्या के बाद 3 माह 22 दिनों में यह फैसला सुनाया है.

कोर्ट ने पीड़ित परिवार की कमजोर आर्थिक हालत के देखते हुये 5 लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने का भी निर्णय दिया है.


उल्लेखनीय है कि 25 फरवरी 2016 के दिन आरोपी लोचन श्रीवास्तव ने तीन साल की मासूम की रेप के बाद गला दबाकर हत्या कर दी थी. लोचन श्रीवास्तव ने हत्या करने के बाद मासूम की लाश को बोरे में भर कर झाड़ियों में फेंक दिया था.

इस नृशंस हत्या तथा रेप के विरोध में रायगढ़ के नागरिकों ने एक दिन का बंद किया था तथा अधिवक्ताओँ ने इस केस की आरोपी के तरफ से पैरवी करने से भी मना कर दिया था.

हाई कोर्ट कन्फर्म करता है फांसी की सजा
हत्या, देशद्रोह सहित अन्य अत्यंत संगीन मामलों में जब मामला रेयरेस्ट ऑफ रेयर का हो तो फांसी की सजा सुनाई जाती है. निचली अदालत से फांसी की सजा सुनाये जाने के बाद मामले में फांसी की सजा को कन्फर्म करने के लिए हाई कोर्ट को भेजा जाता है. हाई कोर्ट में अपील के लिए मुजरिम को दो महीने का वक्त दिया जाता है. इस दौरान, निचली अदालत से सजा कन्फर्म करने के लिए फाइल हाई कोर्ट भेजी जाती है. हाई कोर्ट में अपील और सजा कन्फर्मेशन दोनों ही मुद्दों पर सुनवाई होती है. हाई कोर्ट से अगर फांसी की सजा कन्फर्म हो जाये, उसके बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल करने का प्रावधान है.

सुप्रीम कोर्ट के लिए 3 महीने का टाइम
सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल करने के लिए मुजरिम को 3 महीने का वक्त दिया जाता है इस दौरान मुजरिम फांसी की सजा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल कर सकता है. सुप्रीम कोर्ट से भी अगर फांसी की सजा बरकरार रखी जाये, उसके बाद मुजरिम चाहे तो रिव्यू पिटिशन दायर कर सकता है. रिव्यू पिटिशन उसी बेंच के सामने दायर की जाती है, जिसने फैसला दिया है. रिव्यू पिटिशन में मुजरिम फैसले को बदलने के लिए दलील दे सकता है. रिव्यू पिटिशन भी अगर खारिज हो जाए तो मुजरिम क्यूरेटिव पिटिशन दाखिल कर सकता है.

क्यूरेटिव पिटिशन
क्यूरेटिव पिटिशन में जजमेंट में तकनीकी तौर पर सवाल उठाया जा सकता है. जजमेंट के कानूनी पहलू को देखा जाता है और अगर किसी पहलू को नहीं देखा गया है तो उस मुद्दे को क्यूरेटिव पिटिशन में उठाया जाता है. क्यूरेटिव पिटिशन और रिव्यू पिटिशन पर आमतौर पर इन चैंबर ही कार्रवाई होती है. लेकिन किसी मामले में कोर्ट को लगे कि वह क्यूरेटिव या फिर रिव्यू पिटिशन की सुनवाई ओपन कोर्ट में हो सकती है तब कोर्ट ओपन कोर्ट में सुनवाई करती है. लेकिन रिव्यू के बाद अगर क्यूरेटिव पिटिशन भी खारिज हो जाये तो उसके बाद मुजरिम को दया याचिका दायर करने का अधिकार है. संविधान के अनुच्छेद-72 के तहत राष्ट्रपति के पास जबकि अनुच्छेद-161 के तहत राज्यपाल को अधिकार है कि वह दया याचिका को देखते हैं और चाहें तो मुजरिम की फांसी की सजा उम्रकैद में या फिर माफ भी कर सकते हैं. इसके लिए राष्ट्रपति, होम मिनिस्ट्री से रिपोर्ट मांगते हैं और केंद्र सरकार की राय के आधार पर फैसला लेते हैं.

फांसी सजा के बाद पेन की निब तोड़ी जाती है
जब भी न्यायाधीश फांसी की सजा सुनाने के बाद उस निर्णय पर हस्ताक्षर करते हैं तो उस पेन की निब को तोड़ देते हैं. फांसी की सजा सबसे बड़ी सजा होती है तथा जघन्यतम अपराध के लिये यह सजा सुनाई जाती है. न्यायाधीश द्वारा पेन की निब इस लिये तोड़ने की परंपरा है कि भविष्य में ऐसा जघन्यतम अपराध न हो तथा इस पेन का दुबारा उपयोग न किया जाये. फांसी का अर्थ इंसान की जिंदगी की जिंदगी को खत्म करने के लिये दी जाती है. ऐसा भई माना जाता है कि इसीलिये पेन की निब को तोड़ दिया जाता है.

सिर्फ सुबह के वक्त ही फांसी दी जाती है
जेल मैन्युअल के अनुसार फांसी सूर्योदय से पहले के समय दी जाती है क्योकि जेल के अन्य कार्य सूर्योदय के बाद शुरू हो जाते है. अन्य कार्य प्रभावित न हो इसलिए सुबह फांसी दी जाती है.

कितनी देर के लिए फांसी में लटकाया जाता है
इसका कोई एक निर्धारित समय नही है, लेकिन दस मिनट बाद डाक्टर का पैनल फांसी के फंदे में ही चेकअप कर बताता है कि वह मृत है कि नहीं उसी के बाद मृत शरीर को फांसी के फंदे से उतारा जाता है.

फांसी देते वक्त यह लोग रहते है मौजूद
फांसी देते वक्त वहां पर जेल अधीक्षक, एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट और जल्लाद मौजूद रहते है. इनके बिना फांसी नही दी जा सकती.

फांसी देने से पहले जल्लाद क्या बोलता है
जल्लाद फांसी देने से पहले बोलता है कि मुझे माफ कर दो. हिंदू भाईयों को राम-राम, मुस्लिम को सलाम, हम क्या कर सकते है हम तो हुकुम के गुलाम है.

आखिरी ख्वाहिश की मांग में जेल प्रशासन क्या दे सकता है?
जेल प्रशासन फांसी से पहले आखिरी ख्वाहिश पूछता है जो जेल के अंदर और जेल मैन्युअल के तहत होता है इसमें वो अपने परिजन से मिलने, कोई खास डिश खाने के लिए या फिर कोई धर्म ग्रंथ पढ़ने की इच्छा करता है अगर यह इच्छाएं जेल प्रशासन के मैन्युअल में है तो वो पूरी करता है.

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