छग ने सुप्रीम कोर्ट को किया गुमराह

रायपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ का वन विभाग सुप्रीम कोर्ट को भी गुमराह कर रहा है. 2012 का यह मामला सामने आने के बाद राज्य सरकार के अधिकारी परेशान हैं और इससे बचाव का रास्ता तलाश रहे हैं. हालांकि अभी तक यह तय नहीं हो पाया है कि आखिर किन अधिकारियों के कारण ऐसी स्थिति बनी और सुप्रीम कोर्ट को भी छत्तीसगढ़ सरकार ने गुमराह कर दिया.

मामला इंद्रावती टाइगर रिजर्व के बफर ज़ोन की अधिसूचना से जुड़ा हुआ है. 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने देश भर के टाइगर रिजर्व को उनका बफर ज़ोन अधिसूचित करने का निर्देश दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को 3 माह के भीतर इसकी जानकारी सुप्रीम कोर्ट को भी देने के निर्देश दिये थे. लेकिन छत्तीसगढ़ के वन विभाग ने 6 मार्च 2009 के छत्तीसगढ़ राजपत्र में प्रकाशित एक ऐसी ग़ैरक़ानूनी अधिसूचना को सुप्रीम कोर्ट में पेश कर के छुट्टी पा ली, जिस पर कई सवाल खड़े हो गये हैं.


वन विभाग की इस अधिसूचना के अनुसार इंद्रावती टाइगर रिजर्व के बफर इलाके की सीमा उत्तर में इंद्रावती नदी एवं ग्राम जारागुंडम, ग्राम सेंड्रा, ग्राम चेरपल्ली की सीमा होते हुये अलग-अलग कक्ष क्रमांक और इंद्रावती नदी होते हुये कक्ष क्रमांक पी 1321 की सीमा पर खत्म होती है. वहीं पूर्व में कक्ष क्रमांक पी 1321 से शुरु हो कर बेरुदी नदी से नेशनल हाइवे नैमेड़ रोड होते हुये बीजापुर तक यह सीमा बताई गई है.

दक्षिण में इंद्रावती नदी और तिमेड़ ग्राम, भोपालपटनम, नेशनल हाइवे रोड समेत कई कक्षों को मिलाकर बीजापुर तक बफर ज़ोन की सीमा बताई गई है. इसी तरह पश्चिम में जारागुंडम से होते हुये इंद्रावती के कई कक्षों को मिलाते हुये मट्टीमारका गांव और इंद्रावती नदी होते हुये ग्राम तीमेड़ तक बफर ज़ोन बताया गया है. इस तरह से बफर एरिया का कुल क्षेत्रफल 1540.70 वर्ग किलोमीटर होता है.

ज़ाहिर है, राष्ट्रीय राजमार्ग को बफर ज़ोन में शामिल करके जारी अधिसूचना अपने आप में हास्यास्पद है. 2006 के बाद से इस इलाके में वनजीवों की कोई गणना नहीं हुई है. ऐसे में 2009 में इस इलाके को बफर ज़ोन बताने को लेकर भी कई सवाल हैं. छत्तीसगढ़ के ही अचानकमार टाइगर रिजर्व से लगी हुई रतनपुर-पेंड्रा रोड के संरक्षित क्षेत्र में होने के कारण कई सालों से अपूर्ण है. इस सड़क के निर्माण को लेकर केंद्रीय वन मंत्रालय से अनुमति नहीं दी गई है. लेकिन यहां इंद्रावती टाइगर रिजर्व में राष्ट्रीय राजमार्ग को संरक्षित कौन कहे, बफर ज़ोन में शामिल कर दिया गया है.

हद ये है कि सुप्रीम कोर्ट, नेशनल टाइगर कंजरवेशन अथारिटी और 2006 के वनप्राणी संरक्षण अधिनियम के संशोधन को ताक पर छत्तीसगढ़ के वन विभाग ने इंद्रावती टाइगर रिजर्व के बफर ज़ोन को लेकर जारी इस अधिसूचना से पहले न तो कोई ग्राम सभा की और नियमानुसार न ही विषय विशेषज्ञों की कमेटी बना कर इस इलाके का कोई वैज्ञानिक अध्ययन किया. मतलब साफ है कि बफर ज़ोन को अधिसूचित करने की पूरी प्रक्रिया वन विभाग के अमले ने अपने कमरे में ही कर ली और मनगढ़ंत तरीके से अपनी रिपोर्ट भी सुप्रीम कोर्ट में सौंप दी.

अब कहीं जा कर वन विभाग की इस पूरी गड़बड़ी की जानकारी सरकार में बैठे उच्च अधिकारियों को लगी है और वे इस माथा पच्ची में जुटे हैं कि सुप्रीम कोर्ट को दी गई आधारहीन, झूठी और ग़ैरक़ानूनी जानकारी के मसले से कैसे निपटा जाये.

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